मल्हार अध्याय 4 लिखें संवाद

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) “मेरे संग कल्लू जी मित्र भी परमानंदी थे।” लेखक और कल्लू जी के बीच हरिद्वार यात्रा पर एक काल्पनिक संवाद लिखिए।
उत्तर

संवाद लिखने के नियम: बोलने वाले का नाम बाईं ओर, उसके बाद निशान (:), फिर उसकी बात। हर वक्ता की बात नई पंक्ति से। बातचीत छोटी-छोटी हो, भाषण न बने। और यहाँ एक बात और — संवाद में पाठ की सामग्री आनी चाहिए, तभी वह इसी पाठ का संवाद लगेगा।

नमूना उत्तर

भारतेंदु: कल्लू जी, आज सवेरे घाट पर आपको देखा नहीं। कहाँ रह गए थे?

कल्लू जी: मैं नील धारा की ओर निकल गया था। सोचिए तो — एक ही गंगा जी यहाँ दो धाराओं में बँट जाती हैं, और बीच में एक नीचा-सा हरा पर्वत खड़ा है।

भारतेंदु: मैंने भी वही देखा। और उस छोटे चुटीला पर्वत के शिखर पर चण्डिका देवी की मूर्ति है, यह आपने देखी?

कल्लू जी: देखी। पर मुझे सबसे विचित्र यह लगा कि इतने बड़े तीर्थ में देवता केवल गंगा जी ही हैं, दूसरा कोई नहीं।

भारतेंदु: यही तो इसकी विशेषता है। और यहाँ के लोग देखिए — पंडे तक एक पैसे को लाख करके मान लेते हैं। इतना संतोष मैंने कहीं नहीं देखा।

कल्लू जी: सच कहा। कल आपने तट पर पत्थर पर बैठकर जो भोजन कराया था, वह स्वाद अब तक याद है। जल के ठंडे छींटे बार-बार मुँह पर आ रहे थे।

भारतेंदु: मुझे भी लगा कि सोने की थाल में खाया हुआ भोजन भी उस सुख के आगे फीका है।

कल्लू जी: तो अब क्या सोचा है? कब तक ठहरेंगे?

भारतेंदु: लौटना तो पड़ेगा, कल्लू जी। पर सच पूछिए तो चित्त से मैं यहीं रह जाऊँगा। संपादक महोदय को यही सब लिखकर भेजूँगा।

कल्लू जी: अवश्य लिखिए। जो लोग यहाँ नहीं आ सकते, वे आपके पत्र से ही यह आनंद पा लेंगे।

Tip: संवाद में आठ से बारह पंक्तियाँ पर्याप्त होती हैं। अंत ऐसा रखिए जो आगे की ओर खुलता हो — जैसे यहाँ पत्र लिखने की बात पर बातचीत समाप्त होती है।
प्र2.
(ख) “यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है।” लेखक और प्रकृति के बीच एक कल्पनात्मक संवाद तैयार कीजिए— जैसे पर्वत बोल रहे हों।
उत्तर

यहाँ पर्वत को बोलने वाला बनाना है — निर्जीव को मनुष्य की तरह बोलता दिखाना मानवीकरण कहलाता है। यह वही युक्ति है जो लेखक ने वृक्षों को ‘सज्जन’ और ‘तपस्वी’ कहकर स्वयं अपनाई है।

नमूना उत्तर

पर्वत: रुको, यात्री! इतनी दूर से आए हो, थोड़ी देर मेरी छाया में बैठ जाओ।

भारतेंदु: आप बोलते भी हैं? मैं तो अब तक आपको केवल देख रहा था।

पर्वत: देखने वाले बहुत आते हैं, सुनने वाले कम। मैं तीन ओर से इस भूमि को घेरे खड़ा हूँ — यही मेरा काम है। हवा को छानकर भेजता हूँ, इसीलिए यहाँ की पवन इतनी शीतल लगती है।

भारतेंदु: और आप पर फैली ये हरी-भरी वल्ली?

पर्वत: वे मेरी नहीं, तुम्हारी हैं। जैसे सज्जनों के शुभ मनोरथ फैलते चले जाते हैं, वैसे ही ये लताएँ फैलती हैं — बिना यह पूछे कि लाभ किसे मिलेगा।

भारतेंदु: ये बड़े-बड़े वृक्ष तो जैसे तपस्या में खड़े हों।

पर्वत: ठीक पहचाना। घाम सहते हैं, ओस सहते हैं, वर्षा सहते हैं — और उफ तक नहीं करते। पक्षी उन पर घर बनाते हैं और निडर होकर कल्लोल करते हैं, क्योंकि यहाँ उन्हें कोई बधिक नहीं मिलता।

भारतेंदु: मैं यह सब अपने पत्र में लिखूँगा। आप कुछ कहना चाहेंगे मेरे पाठकों से?

पर्वत: बस इतना — जो लोग मुझे देखने आएँ, वे मुझे मुझसे थोड़ा बेहतर छोड़कर जाएँ। तीर्थ केवल जल से पवित्र नहीं होता, आने वालों के व्यवहार से भी होता है।

भारतेंदु: यह बात मैं पत्र के अंत में अवश्य लिखूँगा। प्रणाम!

यह संवाद अच्छा क्यों है: इसमें पर्वत केवल सुंदर बातें नहीं करता — वह पाठ की ही सामग्री (शीतल पवन, वल्ली, तपस्वी वृक्ष, निडर पक्षी, बधिक) दोहराता है और अंत में एक विचार देता है। बिना विचार के संवाद केवल बातचीत रह जाता है।
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