प्र1.
इन वाक्यों में रेखांकित शब्दों के प्रयोग पर ध्यान दीजिए—
• विशेष आश्चर्य का विषय यह है कि यहाँ केवल गंगा जी ही देवता हैं, दूसरा देवता नहीं।
• यों तो वैरागियों ने मठ मंदिर कई बना लिए हैं।
आप जानते ही हैं कि एकवचन संज्ञा शब्दों के साथ ‘है’ का प्रयोग किया जाता है और बहुवचन संज्ञा शब्दों के साथ ‘हैं’ का। सोचिए, ‘गंगा’ शब्द एकवचन है, फिर भी इसके साथ ‘हैं’ क्यों लिखा गया है?
उत्तर
क्योंकि यहाँ ‘हैं’ बहुवचन नहीं, आदर बता रहा है। इसे आदरार्थ बहुवचन कहते हैं — जब हम किसी एक व्यक्ति या पूज्य वस्तु का आदर करना चाहते हैं, तब उसे एकवचन होते हुए भी बहुवचन की तरह लिखते-बोलते हैं।
| वाक्य | संज्ञा | क्रिया | ‘हैं’ क्यों |
|---|---|---|---|
| यहाँ केवल गंगा जी ही देवता हैं | गंगा (एकवचन) | हैं | आदरार्थ बहुवचन — गंगा को देवी/माता मानकर आदर दिया गया |
| वैरागियों ने मठ मंदिर कई बना लिए हैं | मठ मंदिर (कई) | हैं | यह सचमुच का बहुवचन है — गिनती में एक से अधिक |
दोनों ‘हैं’ एक जैसे दिखते हैं, पर कारण अलग हैं। पहले में ‘हैं’ का कारण आदर है, दूसरे में संख्या। यही इस गतिविधि की मूल बात है — क्रिया देखकर यह मत मान लीजिए कि संज्ञा एक से अधिक है; पहले देखिए कि वह संज्ञा आदरणीय तो नहीं।
पहचानने के दो सहारे —
- ‘जी’, ‘श्री’, ‘साहब’, ‘महाशय’, ‘महोदय’ जैसा कोई आदर-सूचक शब्द साथ लगा हो, तो प्रायः आदरार्थ बहुवचन होता है — “श्री गंगा जी”, “डाकिया जी”, “डॉक्टर साहब”।
- संज्ञा के साथ आने वाले सर्वनाम भी बदल जाते हैं — वह → वे, उसका → उनका, उससे → उनसे। जैसे — “पिता जी सो रहे हैं, उन्हें मत जगाओ।”
पुस्तक के अपने उदाहरण — “मेरे पिता जी सो रहे हैं।”, “भारत के प्रधानमंत्री भाषण दे रहे हैं।” दोनों में व्यक्ति एक ही है, फिर भी क्रिया बहुवचन में है।