प्र1.
नीचे कुछ पंक्तियाँ दी गई हैं। सोचिए कि इनमें कौन-सा भाव प्रकट हो रहा है? पहचानिए और चुनकर लिखिए—
(दिए गए भाव — प्रेम, संतोष, भक्ति, श्रद्धा, वैराग्य, आश्चर्य, करुणा, हास्य, शांति, परोपकार, दया, दुख)
1. उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।
2. चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था।
3. पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं।
4. हर तरफ पवित्रता और प्रसन्नता बिखरी हुई थी।
5. सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं।
उत्तर
सही भाव और उनका कारण —
| क्रम | पंक्ति का संकेत-शब्द | भाव | क्यों |
|---|---|---|---|
| 1. | “सोने की थाल से कहीं बढ़ के था” | संतोष | जो मिला, उसी में पूरा सुख मिल गया — किसी बेहतर वस्तु की चाह ही नहीं बची। यही संतोष है। |
| 2. | “वैराग्य और भक्ति का उदय” | भक्ति (और वैराग्य) | यहाँ भाव के नाम वाक्य में ही मौजूद हैं। मन का ईश्वर की ओर मुड़ना = भक्ति; संसार से हटना = वैराग्य। दोनों लिखे जा सकते हैं। |
| 3. | “बड़े विलक्षण संतोषी हैं” | संतोष (साथ में आश्चर्य) | पंडों का भाव संतोष है। पर ‘विलक्षण’ शब्द लेखक का अपना भाव भी बता देता है — उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ। दोनों लिखिए तो कारण अवश्य दीजिए। |
| 4. | “पवित्रता और प्रसन्नता बिखरी हुई थी” | शांति | न कोई हलचल, न कोई कमी — केवल एक ठहरा हुआ, स्वच्छ वातावरण। इसी पंक्ति के आसपास लेखक लिखते हैं “झगड़े-लड़ाई का कहीं नाम भी नहीं था।” |
| 5. | “पत्थर मारने से फल देते हैं” | परोपकार | बुराई के बदले भी भलाई करना — देना ही जिसका स्वभाव हो। यह दया नहीं है; दया में ऊपर-नीचे का भाव होता है, परोपकार में नहीं। |
भाव पहचानने का तरीका: पहले वाक्य का मुख्य शब्द ढूँढ़िए (सुख, वैराग्य, संतोषी, प्रसन्नता, फल देते हैं)। फिर पूछिए — यह किसकी अवस्था बता रहा है, कहने वाले की या जिसके बारे में कहा जा रहा है उसकी? वाक्य 3 में दोनों हैं, इसीलिए उसमें दो भाव निकल आते हैं।
दया और करुणा में अंतर: दया में देने वाला स्वयं को बड़ा मानता है; करुणा में दूसरे का दुख अपना-सा लगता है; परोपकार में बिना किसी भाव के, स्वभाववश उपकार होता है। इस पाठ के वृक्ष तीसरी श्रेणी के हैं।