मल्हार अध्याय 4 पंक्तियों पर चर्चा

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
पाठ से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यानपूर्वक पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार अपने समूह में साझा कीजिए और लिखिए। (क) “यहाँ की कुशा सबसे विलक्षण होती है जिसमें से दालचीनी, जावित्री इत्यादि की अच्छी सुगंध आती है। मानो यह प्रत्यक्ष प्रगट होता है कि यह ऐसी पुण्यभूमि है कि यहाँ की घास भी ऐसी सुगंधमय है।”
उत्तर

सीधा अर्थ: हरिद्वार की कुशा (पूजा में काम आने वाली घास) असाधारण होती है — उसमें से दालचीनी और जावित्री जैसे मसालों की सुगंध आती है। लेखक कहते हैं कि यह सुगंध ही आँखों के सामने यह बात सिद्ध कर देती है कि यह भूमि पवित्र है, क्योंकि जहाँ की घास तक सुगंधित हो, वह भूमि साधारण कैसे हो सकती है।

लेखक यहाँ कर क्या रहे हैं — यह देखना अधिक जरूरी है। उनका तर्क सबसे छोटी चीज से शुरू होकर सबसे बड़े निष्कर्ष तक जाता है —

घास — भूमि की सबसे छोटी और सबसे साधारण चीज
यह घास भी सुगंधित है
→ तो यहाँ का सबसे मामूली अंश भी असाधारण है
निष्कर्ष: पूरी भूमि पुण्यभूमि है
क्यों यह तर्क असरदार है: यदि लेखक मंदिर या गंगा की पवित्रता का प्रमाण देते तो बात साधारण होती — मंदिर तो पवित्र होते ही हैं। पर वे प्रमाण घास से लेते हैं, जिसे कोई गिनता ही नहीं। इससे पाठक को लगता है कि पवित्रता किसी एक स्थान में नहीं, पूरी मिट्टी में घुली हुई है। यही इस पंक्ति की खूबी है।
शब्द: विलक्षण = अनोखा, असाधारण। प्रगट = प्रकट (पुरानी वर्तनी)। जावित्री = जायफल के ऊपर लिपटा सुगंधित मसाला। प्रत्यक्ष = आँखों के सामने, साफ-साफ।
प्र2.
(ख) “अहा! इनके जन्म भी धन्य हैं जिनसे अर्थी विमुख जाते ही नहीं। फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़; यहाँ तक कि जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोरथ पूर्ण करते हैं।”
उत्तर

सीधा अर्थ: लेखक वृक्षों के जन्म को धन्य कहते हैं, क्योंकि उनके पास से कोई माँगने वाला (अर्थी) खाली हाथ नहीं लौटता। वृक्ष अपना सब कुछ देता है — फल, फूल, सुगंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़ तक। और सबसे बड़ी बात यह कि जल जाने के बाद भी वह कोयले और राख के रूप में लोगों के काम आता है।

वाक्य की रचना ही उसका अर्थ है। देखिए —

फल → फूल → गंध → छाया → पत्ते → छाल → बीज → लकड़ी → जड़
(ऊपर से नीचे तक, बाहर से भीतर तक — पूरा वृक्ष चुक जाता है)
और फिर भी…
यहाँ तक कि जले पर भी” → कोयला और राख
अर्थ: देना वृक्ष का काम नहीं, स्वभाव है — जलने के बाद भी नहीं छूटता।
‘अहा!’ यहाँ क्यों है: यह विस्मयादिबोधक शब्द लेखक की प्रशंसा और कृतज्ञता दोनों दिखाता है। इसे हटा दीजिए तो वाक्य केवल सूचना रह जाता है; इसके साथ वाक्य एक भाव बन जाता है। सूची का लंबा होना भी जान-बूझकर है — नौ चीजें एक साथ गिनाकर लेखक पाठक के मन में ‘और भी… और भी…’ का भाव भर देते हैं।

भाव: यह पंक्ति परोपकार का आदर्श रखती है — सच्चा दान वह है जिसमें देने वाला अपने लिए कुछ बचाकर न रखे। आगे इसी विचार को लेखक एक और वाक्य में समेट देते हैं — “सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं।”

शब्द: अर्थी = जिसे कोई प्रयोजन (अर्थ) हो, माँगने वाला, याचक। विमुख = मुँह मोड़े हुए, निराश। धन्य = सराहनीय, सफल।
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