सीधा अर्थ: लेखक वृक्षों के जन्म को धन्य कहते हैं, क्योंकि उनके पास से कोई माँगने वाला (अर्थी) खाली हाथ नहीं लौटता। वृक्ष अपना सब कुछ देता है — फल, फूल, सुगंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़ तक। और सबसे बड़ी बात यह कि जल जाने के बाद भी वह कोयले और राख के रूप में लोगों के काम आता है।
वाक्य की रचना ही उसका अर्थ है। देखिए —
फल → फूल → गंध → छाया → पत्ते → छाल → बीज → लकड़ी → जड़
(ऊपर से नीचे तक, बाहर से भीतर तक — पूरा वृक्ष चुक जाता है)
और फिर भी…
“यहाँ तक कि जले पर भी” → कोयला और राख
अर्थ: देना वृक्ष का काम नहीं, स्वभाव है — जलने के बाद भी नहीं छूटता।
‘अहा!’ यहाँ क्यों है: यह विस्मयादिबोधक शब्द लेखक की प्रशंसा और कृतज्ञता दोनों दिखाता है। इसे हटा दीजिए तो वाक्य केवल सूचना रह जाता है; इसके साथ वाक्य एक भाव बन जाता है। सूची का लंबा होना भी जान-बूझकर है — नौ चीजें एक साथ गिनाकर लेखक पाठक के मन में ‘और भी… और भी…’ का भाव भर देते हैं।
भाव: यह पंक्ति परोपकार का आदर्श रखती है — सच्चा दान वह है जिसमें देने वाला अपने लिए कुछ बचाकर न रखे। आगे इसी विचार को लेखक एक और वाक्य में समेट देते हैं — “सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं।”
शब्द: अर्थी = जिसे कोई प्रयोजन (अर्थ) हो, माँगने वाला, याचक। विमुख = मुँह मोड़े हुए, निराश। धन्य = सराहनीय, सफल।