मल्हार अध्याय 4 पत्र

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
आपने जो यात्रा-वर्णन पढ़ा है, इसे भारतेंदु हरिश्चंद्र ने एक संपादक को पत्र के रूप में लिखकर भेजा था। आप भी अपनी किसी यात्रा के विषय में अपने किसी परिचित को पत्र लिखकर बताइए।
उत्तर

पत्र में ये अंग अवश्य आने चाहिए — भेजने वाले का पता और दिनांक, संबोधन, अभिवादन, कुशल-क्षेम, मुख्य विषय (यात्रा का वर्णन), उपसंहार, और अंत में स्वनिर्देश तथा नाम।

वर्णन को अच्छा बनाने के तीन सूत्र (तीनों इसी पाठ से सीखे जा सकते हैं) —

  1. देखी हुई एक ठोस चीज लिखिए, सामान्य बात नहीं। भारतेंदु ‘बहुत सुंदर पर्वत थे’ नहीं लिखते; वे लिखते हैं कि पर्वत तीन ओर हैं और उन पर वल्ली फैली है।
  2. तुलना का प्रयोग कीजिए — “मानो…”, “की भाँति…”, “-सी”। इसी से चित्र बनता है।
  3. अंत में अपना भाव लिखिए — यात्रा ने आपको क्या दिया।

नमूना उत्तर

14, शिवाजी नगर
भोपाल (म.प्र.)
दिनांक: 12 अक्टूबर 20XX

पूज्य मामा जी,
सादर प्रणाम।

आशा है आप सब सकुशल होंगे। मैं भी यहाँ ठीक हूँ। पिछले सप्ताह हमारे विद्यालय की ओर से हम भीमबेटका की गुफाओं को देखने गए थे। उसी यात्रा का हाल आपको सुनाना चाहता हूँ।

हम सवेरे छह बजे बस से निकले। रास्ते में दोनों ओर बरसात के बाद की ऐसी हरियाली थी मानो किसी ने धरती पर हरी चादर बिछा दी हो। पहाड़ी पर चढ़ते ही बड़े-बड़े पत्थर दिखाई देने लगे — कुछ इस तरह टिके हुए कि लगता था अभी लुढ़क पड़ेंगे, पर वे हजारों वर्षों से वैसे ही खड़े हैं। गुफाओं की दीवारों पर लाल और सफेद रंग से बने चित्र देखकर मैं देर तक चुप खड़ा रहा — हिरन, बैल, नाचते हुए लोग, शिकार करते हुए लोग। सोचिए, जिन हाथों ने ये चित्र बनाए, वे हजारों वर्ष पहले मिट चुके हैं, पर उनकी बनाई रेखाएँ आज भी हमसे बात कर रही हैं।

दोपहर में हम एक चट्टान की छाया में बैठकर घर से लाया भोजन साथ मिलकर खाया। पत्तों में परोसा गया वह सादा भोजन मुझे किसी भी होटल के खाने से अच्छा लगा। लौटते समय मैंने अपनी डायरी में लिखा — जो चीज सबसे पुरानी है, वही सबसे नई लगी।

मामी जी को प्रणाम और छोटी बहन को स्नेह। उत्तर अवश्य दीजिएगा।

आपका भांजा
अनुराग

Tip: पत्र में तीन से चार अनुच्छेद पर्याप्त हैं — एक कुशल-क्षेम का, दो वर्णन के, एक समापन का। पूरे पत्र में एक ही काल बनाए रखिए (यात्रा हो चुकी है, इसलिए भूतकाल)।
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