प्र1.
नीचे इस पत्र की कुछ विशेषताएँ दी गई हैं। अपने समूह के साथ मिलकर इन विशेषताओं से जुड़े वाक्यों से इनका मिलान कीजिए—
पत्र की विशेषताएँ — 1. व्यक्तिपरकता— पत्र लेखन में लेखक के विचार, अनुभव और भावनाएँ प्रमुख होते हैं। 2. संवादात्मकता— पत्र संवाद का रूप है; पाठक से सीधा संवाद होता है। 3. स्वाभाविक शैली— भाषा कृत्रिम नहीं होती; भावनाओं के अनुरूप होती है। 4. व्यक्तिगत अनुभवों का वर्णन— जहाँ लेखक अपने वास्तविक अनुभव को साझा करता है। 5. अभिवादन या संबोधन— पत्र का आरंभ, जिसमें संबोधित व्यक्ति को आदरपूर्वक संबोधित किया जाता है। 6. हस्ताक्षर— लेखक अपने नाम या संबंध से पत्र को समाप्त करता है। 7. उपसंहार और निवेदन— लेखक पत्र समाप्त करता है और अपनी इच्छा या निवेदन प्रकट करता है। 8. मुख्य विषय-वस्तु
पत्र से उदाहरण — “ग्रहण में बड़े आनंदपूर्वक स्नान किया… · श्रीमान कविवचन सुधा संपादक महामहिम मित्रवरेषु! · आपका मित्र — यात्री · मुझे हरिद्वार का समाचार लिखने में बड़ा आनंद होता है… · हरिद्वार की प्राकृतिक सुंदरता, धार्मिकता, साधु-संन्यासियों का जीवन, नदी, पर्वत, जल, गंगा स्नान आदि का अत्यंत विस्तार से वर्णन। जैसे— “यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है…” · और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ… निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा। · एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके… · और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ…”
आप एक विशेषता को एक से अधिक वाक्यों से भी जोड़ सकते हैं।
उत्तर
एक उपयुक्त मिलान इस प्रकार बनता है —
| क्रम | पत्र की विशेषता | पत्र से उदाहरण | यही क्यों |
|---|---|---|---|
| 1. | व्यक्तिपरकता | “मुझे हरिद्वार का समाचार लिखने में बड़ा आनंद होता है…” | वाक्य का केंद्र ‘मुझे’ है — विषय हरिद्वार है, पर बात लेखक के अपने आनंद की हो रही है। |
| 2. | संवादात्मकता | “और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ…” | बीच वर्णन में अचानक ‘संपादक महाशय’ कहकर पाठक की ओर मुड़ना — मानो सामने बैठकर बात हो रही हो। |
| 3. | स्वाभाविक शैली | “ग्रहण में बड़े आनंदपूर्वक स्नान किया…” | न कोई सजावट, न बड़े-बड़े शब्द — जो किया, वैसा ही सीधे कह दिया। |
| 4. | व्यक्तिगत अनुभवों का वर्णन | “एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके…” | यह लेखक का अपना, एक विशेष दिन का अनुभव है — सामान्य जानकारी नहीं। |
| 5. | अभिवादन या संबोधन | “श्रीमान कविवचन सुधा संपादक महामहिम मित्रवरेषु!” | पत्र की पहली पंक्ति, जिसमें आदरपूर्वक संबोधन है। ‘मित्रवरेषु’ = श्रेष्ठ मित्र के प्रति। |
| 6. | हस्ताक्षर | “आपका मित्र — यात्री” | पत्र का अंतिम भाग, जहाँ लेखक अपना संबंध और पहचान लिखता है। |
| 7. | उपसंहार और निवेदन | “और संपादक महाशय, … निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।” | यह समापन भी है और निवेदन भी — पत्र छापने की प्रार्थना। |
| 8. | मुख्य विषय-वस्तु | हरिद्वार की प्राकृतिक सुंदरता, धार्मिकता, साधु-संन्यासियों का जीवन, नदी, पर्वत, जल, गंगा स्नान आदि का विस्तार से वर्णन — जैसे “यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है…” | यह किसी एक पंक्ति की नहीं, पूरे पत्र की सामग्री की बात है — यही उसका विषय है। |
पहचानने का सूत्र: पत्र के स्थान से विशेषता पहचानी जा सकती है — सबसे ऊपर आया वाक्य संबोधन है, सबसे नीचे का हस्ताक्षर, उससे ठीक पहले वाला उपसंहार और निवेदन। बीच का पूरा भाग विषय-वस्तु है, और उसी में जगह-जगह व्यक्तिपरकता, संवादात्मकता और अनुभव-वर्णन बिखरे रहते हैं।
पुस्तक कहती है कि एक विशेषता को एक से अधिक वाक्यों से भी जोड़ा जा सकता है। जैसे — “मुझे हरिद्वार का समाचार लिखने में बड़ा आनंद होता है…” को व्यक्तिपरकता के साथ-साथ स्वाभाविक शैली से भी जोड़ा जा सकता है, और “और संपादक महाशय…” वाला वाक्य संवादात्मकता तथा उपसंहार दोनों का उदाहरण है। बस, हर जोड़ के साथ कारण लिखिए।