कक्षा ८ हिंदी अध्याय 5 कबीर के दोहे के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-19
इस अध्याय के बारे में
पाठ में कबीर के आठ दोहे हैं — साँच बराबर तप नहीं; बड़ा हुआ तो क्या हुआ; गुरु गोविंद दोऊ खड़े; अति का भला न बोलना; ऐसी बानी बोलिए; निंदक नियरे राखिए; साधू ऐसा चाहिए; कबिरा मन पंछी भया। दोहा दो पंक्तियों का छंद है और हर पंक्ति के दो-दो भाग (चरण) होते हैं। हर पंक्ति को बोलने में लगभग एक-सा समय लगता है — यही उसकी लय है। कबीर की भाषा सधुक्कड़ी है — ब्रज, अवधी और खड़ी बोली के शब्द मिले-जुले हैं: साँच, हिरदे, दोऊ, लागौं, पाँय, सीतल, नियरे, तहवाँ, थोथा। कबीर बात सीधे नहीं कहते, चित्र बनाकर कहते हैं — बड़प्पन के लिए खजूर का पेड़, विवेक के लिए सूप, आलोचक के लिए बिना पानी-साबुन धोने वाला धोबी, चंचल मन के लिए पंछी। पाठ के अभ्यास दोहों को आज के जीवन से जोड़ते हैं — इंटरनेट पर सूचना छाँटना, मोबाइल का अति-प्रयोग, आलोचना को सकारात्मक लेना, कक्षा-नायक का चुनाव। कवि परिचय के अनुसार कबीर का जन्म चौदहवीं शताब
त्वरित पुनरावृत्ति
| दोहा (पहली पंक्ति) | केंद्रीय भाव | किस युक्ति से कहा | कठिन शब्द |
|---|---|---|---|
| साँच बराबर तप नहीं | सत्य सबसे बड़ी साधना है; सच्चे हृदय में गुरु स्वयं बसते हैं | तुलना — ‘बराबर’ शब्द से सत्य को तप के और झूठ को पाप के बराबर रखा | साँच = सत्य; हिरदे = हृदय; ता = उसी |
| बड़ा हुआ तो क्या हुआ | केवल बड़ा या संपन्न होना व्यर्थ है, यदि उससे किसी का भला न हो | उपमा — ‘जैसे पेड़ खजूर’ | पंथी = राही; लागै = लगते हैं; अति दूर = बहुत ऊँचाई पर |
| गुरु गोविंद दोऊ खड़े | गुरु का स्थान पहले, क्योंकि ईश्वर तक का रास्ता उन्होंने ही बताया | नाटकीय स्थिति — असमंजस का एक क्षण खड़ा कर दिया | दोऊ = दोनों; काके = किसके; लागौं पाँय = चरण छुऊँ; बलिहारी = न्योछावर |
| अति का भला न बोलना | हर बात में संतुलन आवश्यक है — न अति बोलना, न अति चुप्पी | दृष्टांत — मनुष्य के व्यवहार को वर्षा और धूप की अति से समझाया | अति = हद से ज़्यादा; चूप = चुप |
| ऐसी बानी बोलिए | अहंकार छोड़कर बोला गया मीठा वचन दूसरों को भी शांति देता है और स्वयं को भी | रूपक-सा प्रयोग — मीठे बोल को ‘शीतलता’ बना दिया | बानी = वाणी; आपा = अहंकार; सीतल = शीतल; आपहुँ = स्वयं भी |
| निंदक नियरे राखिए | आलोचक को पास रखिए, वह हमारे दोष मुफ़्त में दिखा देता है | रूपक — निंदक बिना पानी-साबुन के धोने वाला धोबी | नियरे = निकट; कुटी छवाय = झोंपड़ी छवा दीजिए; सुभाय = स्वभाव |
| साधू ऐसा चाहिए | अच्छे व्यक्ति में सार ग्रहण करने और निस्सार छोड़ने का विवेक हो | उपमा — ‘जैसा सूप सुभाय’; सूप विवेक का प्रतीक | सूप = अनाज फटकने का छाज; गहि रहै = पकड़ रखता है; थोथा = खोखला भूसा; देइ उड़ाय = उड़ा देता है |
| कबिरा मन पंछी भया | मन चंचल है और जैसी संगति में जाता है, वैसा ही फल पाता है | रूपक — ‘मन पंछी भया’; और फल का चित्र उसी पेड़-पंछी से जुड़ा | भावै = मन चाहे; तहवाँ = वहीं; तैसा = वैसा ही |
अभ्यास
- मेरी समझ से
- मिलकर करें मिलान
- पंक्तियों पर चर्चा
- सोच-विचार के लिए
- दोहे की रचना
- अनुमान और कल्पना से
- वाद-विवाद
- शब्द से जुड़े शब्द
- दोहे और कहावतें
- सबकी प्रस्तुति
- आपकी बात
- सृजन
- कबीर हमारे समय में
- साइबर सुरक्षा और दोहे
- आज के समय में
- खोजबीन के लिए