अर्थ — कबीर कहते हैं कि मन तो पंछी बन गया है; जहाँ उसका जी चाहता है, वहीं उड़ जाता है। और जो जैसी संगति करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है।
पंछी का चित्र दो बातें एक साथ कह देता है। पहली — पंछी को कोई दीवार नहीं रोकती; उसे बाँधा नहीं जा सकता, केवल दिशा दी जा सकती है। मन भी ऐसा ही बेरोक है। दूसरी — पंछी जिस पेड़ पर बैठता है, उसी पेड़ का फल खाता है। इसीलिए अगली पंक्ति में ‘फल’ शब्द आता है। ‘संगति का फल’ कोई अलग मुहावरा नहीं, वह उसी पंछी-पेड़ के चित्र का स्वाभाविक अगला कदम है। यही कबीर की कारीगरी है — दोनों पंक्तियाँ एक ही चित्र के भीतर रहती हैं।
जीवन से जोड़कर — मन को रोकना कठिन है, इसलिए कबीर उसे रोकने को नहीं कहते। वे कहते हैं कि पेड़ चुन लीजिए — यानी संगति चुन लीजिए। संगति ही तय कर देगी कि मन कहाँ बैठेगा और कौन-सा फल खाएगा। पढ़ाई में मन न लगने की शिकायत करने वाला विद्यार्थी अक्सर यह नहीं देखता कि वह किन साथियों के बीच बैठता है।