मल्हार अध्याय 5 पंक्तियों पर चर्चा

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) “कबिरा मन पंछी भया भावै तहवाँ जाय। जो जैसी संगति करै सो तैसा फल पाय”
उत्तर

अर्थ — कबीर कहते हैं कि मन तो पंछी बन गया है; जहाँ उसका जी चाहता है, वहीं उड़ जाता है। और जो जैसी संगति करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है।

रूपक कैसे काम करता है: यहाँ ‘मन पंछी के समान है’ नहीं कहा गया — कहा गया है ‘मन पंछी भया’, यानी मन पंछी ही बन गया। जब उपमेय (मन) और उपमान (पंछी) में भेद ही मिटा दिया जाए, तो वह रूपक होता है।
पंछी का चित्र दो बातें एक साथ कह देता है। पहली — पंछी को कोई दीवार नहीं रोकती; उसे बाँधा नहीं जा सकता, केवल दिशा दी जा सकती है। मन भी ऐसा ही बेरोक है। दूसरी — पंछी जिस पेड़ पर बैठता है, उसी पेड़ का फल खाता है। इसीलिए अगली पंक्ति में ‘फल’ शब्द आता है। ‘संगति का फल’ कोई अलग मुहावरा नहीं, वह उसी पंछी-पेड़ के चित्र का स्वाभाविक अगला कदम है। यही कबीर की कारीगरी है — दोनों पंक्तियाँ एक ही चित्र के भीतर रहती हैं।

जीवन से जोड़कर — मन को रोकना कठिन है, इसलिए कबीर उसे रोकने को नहीं कहते। वे कहते हैं कि पेड़ चुन लीजिए — यानी संगति चुन लीजिए। संगति ही तय कर देगी कि मन कहाँ बैठेगा और कौन-सा फल खाएगा। पढ़ाई में मन न लगने की शिकायत करने वाला विद्यार्थी अक्सर यह नहीं देखता कि वह किन साथियों के बीच बैठता है।

ध्यान दीजिए: इस दोहे की दूसरी पंक्ति इतनी लोकप्रिय हुई कि वह कहावत बन गई — ‘जैसा संग वैसा रंग’
प्र2.
(ख) “साँच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप। जाके हिरदे साँच है ता हिरदे गुरु आप॥”
उत्तर

अर्थ — सत्य के बराबर कोई तपस्या नहीं है और झूठ के बराबर कोई पाप नहीं। जिसके हृदय में सत्य बसा है, उसी के हृदय में गुरु स्वयं विराजमान हैं।

बनावट कैसे काम करती है: पहली पंक्ति में दो तराज़ू हैं और दोनों में ‘बराबर’ शब्द तौल का काम करता है। एक ओर सारे तप रख दीजिए — सत्य उनके बराबर उतरता है। दूसरी ओर सारे पाप रख दीजिए — झूठ उनके बराबर उतरता है। दोनों वाक्य आमने-सामने रखे गए हैं, इसलिए सत्य की ऊँचाई और झूठ की गिरावट दोनों एक साथ दिखती हैं।
सत्य को तप कहना बहुत सोचकर चुना गया है। तप का अर्थ है कष्ट सहकर की गई साधना। सच बोलने में भी नुकसान उठाना पड़ता है — डाँट, हार, अकेलापन। इसीलिए वह मामूली अच्छाई नहीं, तपस्या है।

दूसरी पंक्ति में कबीर कदम और आगे बढ़ाते हैं। मंदिर, तीर्थ या बाहरी आडंबर की जगह वे हृदय को गुरु का निवास बना देते हैं। यानी जो भीतर से सच्चा है, उसे सही रास्ता बताने वाला कोई बाहर से नहीं चाहिए — उसकी सच्चाई ही उसका गुरु है। पहली पंक्ति सत्य का मूल्य बताती है, दूसरी उसका पुरस्कार।

भाषा: ‘साँच’ (सत्य), ‘हिरदे’ (हृदय), ‘जाके’ (जिसके), ‘ता’ (उसी) — ये ब्रज रूप हैं। इनसे पंक्ति छोटी और लयदार बनी रहती है।
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