हाँ, मैं सहमत हूँ — पर एक स्पष्टीकरण के साथ। कबीर गुरु को ईश्वर से बड़ा नहीं कह रहे; वे गुरु को पहला कह रहे हैं। क्रम की बात है, आकार की नहीं।
तर्क सीधा है। शिष्य ईश्वर को पहचानता ही तब है जब गुरु उसे बताते हैं — ‘गोविंद दियो बताय’। जो हाथ आपको किसी तक पहुँचाता है, कृतज्ञता में पहला नमन उसी को जाता है। ठीक वैसे ही जैसे किसी अनजान शहर में रास्ता बताने वाले को हम पहले धन्यवाद कहते हैं, फिर मंज़िल पर पहुँचते हैं।
आज के संदर्भ में — गुरु केवल विद्यालय के शिक्षक नहीं। जिसने भी आपको कुछ सिखाया — माता-पिता, बड़ा भाई-बहन, कोई कारीगर, कोई पुस्तक — वह उस बात का गुरु है। कबीर का दोहा उन सबके प्रति आभार सिखाता है।