मल्हार अध्याय 5 दोहे की रचना

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) दोहों की उन पंक्तियों को चुनकर लिखिए जिनमें— (1) एक ही अक्षर से प्रारंभ होने वाले (जैसे— राजा, रस्सी, रात) दो या दो से अधिक शब्द एक साथ आए हैं।
उत्तर

पाठ में ऐसी कई पंक्तियाँ हैं —

  • गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।”
  • “बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥”
  • निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।”
  • बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय॥”
  • साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूसुभाय।”
  • सासार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय॥”
  • जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय॥”
यह क्या है: एक ही वर्ण की बार-बार आवृत्ति को अनुप्रास अलंकार कहते हैं। इसका काम केवल सजावट नहीं है — दोहराई गई ध्वनि पंक्ति को गाने लायक बना देती है। कबीर के दोहे लिखकर नहीं, गा-गाकर फैले थे; ‘निंदक नियरे’ या ‘सार सार’ जैसी ध्वनियाँ ही उन्हें कान में टिकाए रखती हैं।
प्र2.
(2) एक शब्द एक साथ दो बार आया है। (जैसे— बार-बार)
उत्तर

सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय॥”

यह क्यों दोहराया गया: ‘सार सार’ का अर्थ केवल ‘सार’ नहीं, ‘जो-जो सार है, वह सब’ है। शब्द को दो बार रखने से मात्रा बढ़ जाती है — यानी विवेकी व्यक्ति एक-दो अच्छी बातें नहीं छाँटता, हर अच्छी बात छाँट लेता है। इस दोहराव को पुनरुक्ति कहते हैं।
निकट का उदाहरण: ‘अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।’ में ‘अति का भला न’ पूरा वाक्यांश दोहराया गया है, पर वह लगातार नहीं आया — इसलिए वह इस कोटि में नहीं आएगा।
प्र3.
(3) लगभग एक जैसे शब्द, जिनमें केवल एक मात्रा भर का अंतर है (जैसे— जल, जाल) एक ही पंक्ति में आए हैं।
उत्तर
  • बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय॥” — बिन / बिना (केवल ‘आ’ की मात्रा का अंतर)
  • “अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥” — का / की और भला / भली
इससे क्या बनता है: दो लगभग एक-से शब्द पास-पास आने पर पंक्ति में एक हल्का झूला-सा बन जाता है — सुनने वाले को लगता है वही शब्द लौट आया, पर वह ज़रा बदला हुआ है। ‘भला/भली’ में तो अंतर व्याकरण का है (पुल्लिंग/स्त्रीलिंग), फिर भी कान को वह लय जैसा लगता है।
प्र4.
(4) एक ही पंक्ति में विपरीतार्थक शब्दों (जैसे— अच्छा-बुरा) का प्रयोग किया गया है।
उत्तर
  • साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।” — साँच × झूठ
  • “अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।” — बोलना × चुप रहना
  • “अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥” — वर्षा × धूप
  • सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय॥” — सार × थोथा, और पकड़ना × उड़ा देना
कबीर यह क्यों करते हैं: दोहे में केवल चार चरण होते हैं — समझाने की जगह नहीं होती। विलोम शब्द जोड़ी बनाकर दोनों छोर एक साथ दिखा देते हैं, और बीच का रास्ता पाठक स्वयं निकाल लेता है। ‘सार × थोथा’ में तो पूरा दोहा ही दो शब्दों में सिमट आता है।
प्र5.
(5) किसी की तुलना किसी अन्य से की गई है। (जैसे— दूध जैसा सफेद)
उत्तर
  • “बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।” — बड़े आदमी की तुलना खजूर के पेड़ से
  • “साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।” — साधु के स्वभाव की तुलना सूप से
  • “साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।” — सत्य की तुलना तप से, झूठ की पाप से
  • जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय॥” — संगति और फल की तुलना
यह उपमा अलंकार है। पहचान का सूत्र — जहाँ ‘जैसे’, ‘जैसा’, ‘सम’, ‘बराबर’ जैसा वाचक शब्द मौजूद हो और दो अलग चीज़ों में कोई एक साझा गुण दिखाया जा रहा हो, वहाँ उपमा होती है। जैसे खजूर और अहंकारी धनी में साझा गुण है — ऊँचाई तो है, काम आना नहीं।
प्र6.
(6) किसी को कोई अन्य नाम दे दिया गया है। (जैसे— मुख चंद्र है)
उत्तर

“कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।”

यह रूपक अलंकार है। यहाँ ‘मन पंछी के समान है’ नहीं कहा गया — कहा गया ‘मन पंछी बन गया’। जब उपमेय (मन) पर उपमान (पंछी) को इस तरह चढ़ा दिया जाए कि दोनों का भेद ही मिट जाए, तब उपमा नहीं, रूपक होता है। इसीलिए अगली पंक्ति में ‘फल’ शब्द भी सहज लगता है — पंछी पेड़ पर बैठता है और उसी का फल खाता है।
एक और, छिपा हुआ: ‘निंदक… बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय’ में निंदक को कहीं ‘धोबी’ कहा नहीं गया, पर पानी और साबुन का उल्लेख उसे धोने वाला बना ही देता है — यह नाम दिए बिना दिया गया रूपक है।
प्र7.
(7) किसी शब्द की वर्तनी थोड़ी अलग है। (जैसे— ‘चुप’ के स्थान पर ‘चूप’)
उत्तर
दोहे का शब्दआज की हिंदी मेंपंक्ति
चूपचुपअति का भला न चूप।
साँचसच / सत्यसाँच बराबर तप नहीं
हिरदेहृदयजाके हिरदे साँच है
दोऊदोनोंगुरु गोविंद दोऊ खड़े
पाँयपाँव / चरणकाके लागौं पाँय।
सीतलशीतलऔरन को सीतल करै
आपहुँस्वयं भीआपहुँ सीतल होय॥
नियरेनिकटनिंदक नियरे राखिए
सुभायस्वभावनिर्मल करै सुभाय॥
तहवाँवहींभावै तहवाँ जाय।
कबिराकबीरकबिरा मन पंछी भया
वर्तनी क्यों बदली: कबीर की भाषा को सधुक्कड़ी कहा जाता है — उसमें ब्रज, अवधी, राजस्थानी और खड़ी बोली के शब्द घुले-मिले हैं। ये बदले हुए रूप गलती नहीं हैं; दो कारणों से हैं — (1) उस समय की बोली में शब्द ऐसे ही बोले जाते थे, और (2) दोहे की मात्रा और तुक बनी रहती है। ‘चुप’ लिख देते तो ‘धूप’ के साथ तुक नहीं मिलती; ‘चूप’ से मिल जाती है।
प्र8.
(8) उदाहरण द्वारा कही गई बात को समझाया गया है।
उत्तर
  • “बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर॥” — बड़प्पन की बात खजूर के पेड़ के उदाहरण से।
  • “साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय। सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय॥” — विवेक की बात सूप से अनाज फटकने के उदाहरण से।
  • “अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥” — संतुलन की बात वर्षा और धूप के उदाहरण से।
  • “निंदक नियरे राखिए… बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय॥” — आलोचना का लाभ बिना साबुन-पानी कपड़ा साफ़ होने के उदाहरण से।
यह दृष्टांत अलंकार है — जहाँ कही गई बात को समझाने के लिए उसके समान कोई दूसरा उदाहरण रख दिया जाए। कबीर पढ़े-लिखे श्रोताओं के लिए नहीं लिखते थे; वे किसान, बुनकर और राहगीर से बात कर रहे थे। इसीलिए उनके सारे उदाहरण रोज़ की आँखों-देखी चीज़ों से आते हैं — खेत, सूप, खजूर, धुलता कपड़ा, उड़ता पंछी। जो चीज़ पहले से देखी हुई है, उससे जोड़ी गई बात कभी भूलती नहीं।
प्र9.
(ख) अपने समूह की सूची को कक्षा में सबके साथ साझा कीजिए।
उत्तर

यह गतिविधि है। सूची इस तरह बनाइए कि साझा करते समय हर बात का प्रमाण साथ हो।

विशेषतापाठ से उदाहरणक्या नाम है
एक ही अक्षर से शुरू होते शब्दनिंदक नियरे; सार सार; गुरु गोविंदअनुप्रास
शब्द का दोहरावसार सारपुनरुक्ति
विलोम शब्द एक पंक्ति मेंसाँच × झूठ; बोलना × चूपविरोध का प्रयोग
तुलनाजैसे पेड़ खजूर; जैसा सूप सुभायउपमा
दूसरा नाम दे देनामन पंछी भयारूपक
उदाहरण से समझानाबिन पानी साबुन बिना…दृष्टांत
तुकपाँय–बताय, चूप–धूप, खोय–होयतुकांत
एक-सी लयहर पंक्ति बोलने में लगभग बराबर समयमात्रा का संतुलन
प्रस्तुति का सुझाव: हर समूह अपनी सूची में से केवल दो विशेषताएँ चुनकर बोले और उन्हें पंक्ति गाकर दिखाए — तब पूरी कक्षा को आठों विशेषताएँ सुनने को मिलेंगी और समय भी नहीं लगेगा।
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