• यदि यह स्थिति होती — मैं भी पहले गुरु के चरण छूता। कारण कबीर का ही है: गोविंद तक पहुँचने की समझ मुझे गुरु ने दी। जो व्यक्ति मुझे किसी बड़ी चीज़ तक ले जाता है, कृतज्ञता में पहला नमन उसी का बनता है। यह गोविंद का अपमान नहीं — गुरु के चरण छूना असल में उस ज्ञान का आदर है जिसने गोविंद को पहचानने योग्य बनाया।
• यदि संसार में कोई गुरु या शिक्षक न होता — हर पीढ़ी को सब कुछ शून्य से शुरू करना पड़ता।
- भाषा, लिपि और गिनती एक पीढ़ी से दूसरी तक न पहुँचतीं; ज्ञान इकट्ठा ही नहीं हो पाता।
- बीज बोने से लेकर बीमारी की दवा तक — हर खोज हर बार नए सिरे से करनी पड़ती, और अधिकांश लोग उसे कर ही नहीं पाते।
- सीखना केवल अपनी गलतियों से होता, जो बहुत धीमा और कभी-कभी खतरनाक रास्ता है। शिक्षक का काम ही यह है कि हमें दूसरों की गलतियों से सीखने का मौका मिल जाए।