मल्हार अध्याय 5 अनुमान और कल्पना से

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
अपने समूह में मिलकर चर्चा कीजिए— (क) “गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागौं पाँय।” • यदि आपके सामने यह स्थिति होती तो आप क्या निर्णय लेते और क्यों? • यदि संसार में कोई गुरु या शिक्षक न होता तो क्या होता?
उत्तर

• यदि यह स्थिति होती — मैं भी पहले गुरु के चरण छूता। कारण कबीर का ही है: गोविंद तक पहुँचने की समझ मुझे गुरु ने दी। जो व्यक्ति मुझे किसी बड़ी चीज़ तक ले जाता है, कृतज्ञता में पहला नमन उसी का बनता है। यह गोविंद का अपमान नहीं — गुरु के चरण छूना असल में उस ज्ञान का आदर है जिसने गोविंद को पहचानने योग्य बनाया।

• यदि संसार में कोई गुरु या शिक्षक न होता — हर पीढ़ी को सब कुछ शून्य से शुरू करना पड़ता।

  • भाषा, लिपि और गिनती एक पीढ़ी से दूसरी तक न पहुँचतीं; ज्ञान इकट्ठा ही नहीं हो पाता।
  • बीज बोने से लेकर बीमारी की दवा तक — हर खोज हर बार नए सिरे से करनी पड़ती, और अधिकांश लोग उसे कर ही नहीं पाते।
  • सीखना केवल अपनी गलतियों से होता, जो बहुत धीमा और कभी-कभी खतरनाक रास्ता है। शिक्षक का काम ही यह है कि हमें दूसरों की गलतियों से सीखने का मौका मिल जाए।
चर्चा का सुझाव: ‘गुरु’ को केवल विद्यालय तक सीमित मत रखिए। खाना बनाना, साइकिल चलाना, कोई खेल — इनमें से हर एक किसी न किसी ने सिखाया है। समूह में सब अपने-अपने ‘गुरु’ गिनाएँ; सूची लंबी निकलेगी।
प्र2.
(ख) “अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।” • यदि कोई व्यक्ति बहुत अधिक बोलता है या बहुत चुप रहता है तो उसके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ सकता है? • यदि वर्षा आवश्यकता से अधिक या कम हो तो क्या परिणाम हो सकते हैं? • आवश्यकता से अधिक मोबाइल या मल्टीमीडिया का प्रयोग करने से क्या परिणाम हो सकते हैं?
उत्तर

• बहुत बोलने या बहुत चुप रहने का असर —

अतिक्या होता है
बहुत अधिक बोलनाबात का वज़न घट जाता है; लोग सुनना बंद कर देते हैं; बिना सोचे बोलने से भेद खुल जाते हैं और संबंध बिगड़ते हैं; सुनने की आदत ही नहीं बन पाती।
बहुत अधिक चुप रहनाज़रूरी बात समय पर नहीं कह पाते; अपने अधिकार और अपनी परेशानी दोनों अनकही रह जाती हैं; लोग गलतफ़हमी पाल लेते हैं; भीतर घुटन जमा होती जाती है।

• वर्षा की अति — आवश्यकता से अधिक वर्षा में बाढ़ आती है, खेत की मिट्टी बह जाती है, फ़सल गल जाती है और घर-रास्ते डूब जाते हैं। आवश्यकता से कम वर्षा में सूखा पड़ता है, कुएँ-तालाब सूख जाते हैं, बुआई नहीं हो पाती और चारे के अभाव में पशु मरते हैं। दोनों का नतीजा एक ही है — फ़सल का नाश। यही कबीर का तर्क है।

• मोबाइल या मल्टीमीडिया की अति —

  • आँखों में जलन, सिरदर्द और देर रात तक जागने से नींद पूरी न होना।
  • ध्यान टुकड़ों में बँट जाता है — लंबा पाठ पढ़ना या एक काम देर तक करना कठिन हो जाता है।
  • घर के लोगों और मित्रों से आमने-सामने की बातचीत घट जाती है; खेल का समय खत्म हो जाता है।
  • बिना जाँचे सूचना पर भरोसा करने की आदत पड़ जाती है।
पर ध्यान रहे: कबीर मोबाइल छोड़ देने को नहीं कहेंगे — वे ‘बोलना बंद कर दो’ भी नहीं कहते। उनका उत्तर मात्रा तय करना है। दिन में एक निश्चित समय, एक निश्चित काम — यही ‘अति’ से बचाव है।
प्र3.
(ग) “साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।” • झूठ बोलने पर आपके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ सकता है? • कल्पना कीजिए कि आपके शिक्षक ने आपके किसी गलत उत्तर के लिए अंक दे दिए हैं, ऐसी परिस्थिति में आप क्या करेंगे?
उत्तर

• झूठ का असर — एक झूठ अकेला नहीं रहता। उसे बचाने के लिए दूसरा झूठ बोलना पड़ता है, फिर तीसरा; धीरे-धीरे याद रखना पड़ता है कि किससे क्या कहा था। इससे तीन नुकसान होते हैं —

  • विश्वास टूटता है — और एक बार टूटा विश्वास लौटने में वर्षों लगते हैं। सच बोलने वाले की एक बात मान ली जाती है, झूठे की सच्ची बात भी जाँची जाती है।
  • भीतर बेचैनी रहती है — पकड़े जाने का डर मन को ठहरने नहीं देता।
  • सुधार का रास्ता बंद हो जाता है — जो गलती छिपा ली गई, वह ठीक भी नहीं हो पाती।

• गलत उत्तर पर अंक मिल जाएँ तो — मैं स्वयं जाकर शिक्षक को बताऊँगा कि यह उत्तर गलत है और ये अंक मेरे नहीं हैं।

यही ‘तप’ है: यहाँ चुप रह जाना बहुत आसान है — किसी को पता भी नहीं चलेगा, और अंक भी बढ़े रहेंगे। बताने में सीधा नुकसान है। कबीर सत्य को तप इसीलिए कहते हैं — तप वही है जिसमें कष्ट उठाना पड़े। और लाभ भी असली है: जो उत्तर गलत था, वह अब सही सीखने को मिलेगा, और अपने सामने अपनी नज़र नहीं झुकेगी। ‘जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप’ का यही अर्थ है।
प्र4.
(घ) “ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।” • यदि सभी मनुष्य अपनी वाणी को मधुर और शांति देने वाली बना लें तो लोगों में क्या परिवर्तन आ सकते हैं? • क्या कोई ऐसी परिस्थिति हो सकती है जहाँ कटु वचन बोलना आवश्यक हो? अनुमान लगाइए।
उत्तर

• सबकी वाणी मधुर हो जाए तो — झगड़ों की संख्या घट जाएगी, क्योंकि अधिकतर झगड़े बात से नहीं, बात कहने के ढंग से शुरू होते हैं। घर और कक्षा में लोग एक-दूसरे की बात पूरी सुनेंगे; डर के कारण छिपाई जाने वाली बातें खुलकर कही जा सकेंगी; और सबसे बड़ी बात — बोलने वालों को भी शांति मिलेगी, क्योंकि ‘आपहुँ सीतल होय’।

• क्या कटु वचन कभी आवश्यक हैं — मधुर वाणी का अर्थ ‘हर बात में हाँ’ नहीं है। कुछ स्थितियों में कठोर या स्पष्ट स्वर ज़रूरी हो जाता है —

  • जब किसी के साथ अन्याय हो रहा हो और चुप्पी अन्याय करने वाले की मदद बन जाए।
  • जब कोई तुरंत खतरे में हो — तेज़ आवाज़ में रोकना ही उसे बचाता है।
  • जब बार-बार नरमी से समझाने पर भी कोई अपनी गलत आदत न छोड़े।
पर अंतर समझिए: कठोर होना और अपमानजनक होना एक बात नहीं। ‘तुमने गलत किया’ कठोर है; ‘तुम बेकार हो’ अपमानजनक। कबीर की शर्त ‘मन का आपा खोय’ दोनों जगह लागू रहती है — कठोर बात भी तब ठीक है जब उसके पीछे अहंकार नहीं, सुधार की इच्छा हो।
प्र5.
(ङ) “बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।” • यदि कोई व्यक्ति अपने बड़े होने का अहंकार रखता हो तो आप इस दोहे का उपयोग करते हुए उसे ‘बड़े होने या संपन्न होने’ का क्या अर्थ बताएँगे या समझाएँगे? • खजूर, नारियल आदि ऊँचे वृक्ष अनुपयोगी नहीं होते हैं। वे किस प्रकार से उपयोगी हो सकते हैं? बताइए। • आप अपनी कक्षा का कक्षा नायक या नायिका (मॉनीटर) चुनने के लिए किसी विद्यार्थी की किन-किन विशेषताओं पर ध्यान देंगे?
उत्तर

• अहंकारी व्यक्ति को कैसे समझाएँगे — मैं उससे कहूँगा: “ऊँचाई नापने का पैमाना अपना कद नहीं, दूसरों को मिली छाया है। खजूर सबसे ऊँचे पेड़ों में है, फिर भी थका राही उसके नीचे नहीं बैठता — क्योंकि छाया नहीं मिलती और फल हाथ नहीं आते। बरगद उससे नीचा है, पर पूरा गाँव उसी के नीचे बैठता है। इसलिए बड़ा होना यह नहीं कि आपके पास कितना है; बड़ा होना यह है कि आपके पास से कितनों का काम बनता है।”

• खजूर और नारियल क्या सचमुच अनुपयोगी हैं — बिलकुल नहीं। कबीर ने केवल एक बात (छाया न देना) उठाई है, पूरा फ़ैसला नहीं सुनाया।

  • खजूर — खजूर और छुहारा खाए जाते हैं; उसके रस से गुड़ बनता है; पत्तों से चटाई, झाड़ू, टोकरी और छप्पर बनते हैं; तना लकड़ी देता है; और रेगिस्तान में यह पेड़ मिट्टी को बहने से रोकता है।
  • नारियल — पानी और गिरी भोजन हैं; तेल निकलता है; जटा से रस्सी, चटाई और गद्दे बनते हैं; खोल से बर्तन और कलाकृतियाँ; पत्तों से छप्पर; और समुद्र-तट पर यह पेड़ हवा और कटाव दोनों रोकता है।
इससे सीख: किसी को उसके एक गुण या एक कमी से पूरा नहीं आँकना चाहिए। दोहा खजूर की निंदा नहीं करता — वह खजूर को एक उदाहरण की तरह उधार लेता है। यही दृष्टांत की सीमा भी है, और यह पहचानना कक्षा 8 के पाठक का काम है।

• कक्षा नायक/नायिका चुनते समय — मैं इन बातों पर ध्यान दूँगा: (1) सबकी बात सुनने का धैर्य, (2) पक्षपात न करना — मित्र और अन्य विद्यार्थी दोनों के लिए एक नियम, (3) अपनी गलती मान लेने का साहस, (4) समय पर काम करने की आदत, (5) कमज़ोर साथी की मदद करने का स्वभाव, (6) शांत स्वर में बात कहने की क्षमता। ध्यान दीजिए, इनमें ‘सबसे अधिक अंक लाना’ नहीं है — वह खजूर की ऊँचाई है, बरगद की छाया नहीं।

प्र6.
(च) “निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।” • यदि कोई आपकी गलतियों को बताता रहे तो आपको उससे क्या लाभ होगा? • यदि समाज में कोई भी एक-दूसरे की गलतियाँ न बताए तो क्या होगा?
उत्तर

• गलतियाँ बताने वाले से लाभ —

  • गलती जल्दी पकड़ में आ जाती है, इसलिए उसे सुधारना आसान और सस्ता रहता है। जो गलती महीनों चलती रहे, वह आदत बन जाती है।
  • अपनी कमियाँ हमें स्वयं दिखाई नहीं देतीं — जैसे अपनी पीठ। दूसरा ही वह दर्पण है।
  • आलोचना सुनने का अभ्यास हो जाने पर आत्मविश्वास घटता नहीं, बढ़ता है — क्योंकि डर खत्म हो जाता है।

• यदि कोई किसी की गलती न बताए — गलतियाँ चुपचाप दोहराई जाती रहेंगी और बड़ी होती जाएँगी। लोग एक-दूसरे के मुँह पर प्रशंसा और पीठ पीछे निंदा करने लगेंगे, जिससे रिश्तों में बनावट आ जाएगी। सुधार रुक जाएगा — न विद्यार्थी की कॉपी सुधरेगी, न कारीगर का काम, न व्यवस्था की खामियाँ। समाज वहीं का वहीं खड़ा रह जाएगा।

दोहे की शर्त: कबीर निंदक को ‘सुन लीजिए’ नहीं कहते, ‘आँगन में कुटी छवाकर बसा लीजिए’ कहते हैं — यानी आलोचना को कभी-कभार सहना नहीं, उसे अपने रोज़ के जीवन में जगह देना है। साथ ही याद रखिए कि हर आलोचना सही नहीं होती; उसे भी ‘सूप’ से फटकना पड़ता है — सार रखिए, थोथा उड़ा दीजिए।
प्र7.
(छ) “साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।” • कल्पना कीजिए कि आपके पास ‘सूप’ जैसी विशेषता है तो आपके जीवन में कौन-कौन से परिवर्तन आएँगे? • यदि हम बिना सोचे-समझे हर बात को स्वीकार कर लें तो उसका हमारे जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर

• ‘सूप’ जैसा स्वभाव हो तो —

  • पढ़ते समय मैं मुख्य बात और भरती अलग कर पाऊँगा; नोट्स छोटे और काम के बनेंगे।
  • किसी के कहे में से सुधार की बात रख लूँगा और अपमान की बात छोड़ दूँगा — इससे आलोचना चुभेगी नहीं।
  • इंटरनेट पर मिली सूचना में से जाँची हुई बात रखूँगा, अफ़वाह उड़ा दूँगा।
  • मित्रों की सलाह में से अच्छी सलाह मानूँगा, केवल इसलिए नहीं मानूँगा कि सब मान रहे हैं।
  • मन हल्का रहेगा, क्योंकि हर बात ढोनी नहीं पड़ेगी।

• बिना सोचे हर बात मान लेने का असर — निर्णय हमारे नहीं रह जाएँगे; जो जिस समय समझा देगा, हम उसी दिशा में मुड़ जाएँगे। अफ़वाहें और गलत सूचनाएँ आसानी से भीतर घर कर लेंगी, और उन्हें हम आगे भी फैलाएँगे। बार-बार गलत रास्ते पर जाने से आत्मविश्वास टूटेगा और लोग हमारा लाभ उठाने लगेंगे।

सूप कैसे छाँटता है: सूप ज़ोर नहीं लगाता — वह बस हिलता है, और भारीपन तथा हल्कापन अपना काम कर देते हैं। विवेक भी ऐसा ही है: वह हर बात से बहस नहीं करता, बस जाँचता है कि बात में वज़न है या नहीं — प्रमाण क्या है, कहने वाला कौन है, कहने से किसे लाभ है।
प्र8.
(ज) “कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।” • यदि मन एक पंछी की तरह उड़ सकता तो आप उसे कहाँ ले जाना चाहते और क्यों? • संगति का हमारे जीवन पर क्या-क्या प्रभाव पड़ सकता है?
उत्तर

• मन उड़ सकता तो कहाँ — यह कल्पना का प्रश्न है, इसमें अपनी बात लिखिए और कारण ज़रूर दीजिए, क्योंकि उत्तर की जान कारण में है।

नमूना उत्तर: “मैं अपने मन को हिमालय के किसी शांत गाँव में ले जाना चाहूँगा, जहाँ शोर न हो। कारण यह है कि शहर में मेरा मन दिन भर हज़ार दिशाओं में दौड़ता रहता है; मैं देखना चाहता हूँ कि जब बाहर शांति हो तो भीतर क्या सुनाई देता है। उसके बाद मैं उसे अपने विद्यालय की पुस्तकालय की खिड़की पर बिठाना चाहूँगा — क्योंकि कबीर के अनुसार पंछी जिस पेड़ पर बैठता है, वही फल पाता है।”

• संगति का प्रभाव —

  • आदतों पर: उठने-सोने का समय, पढ़ने का समय, खेलने की आदत — सब साथियों जैसी हो जाती है।
  • भाषा और व्यवहार पर: जिनके बीच रहते हैं, उनके शब्द और शिष्टाचार अनजाने में उतर आते हैं।
  • लक्ष्य पर: जो समूह आगे पढ़ने की बात करता है, उसमें बैठा विद्यार्थी भी आगे पढ़ने की सोचने लगता है।
  • सही-गलत की सीमा पर: यह सबसे गहरा असर है — बुरी संगति गलत काम को ‘सब करते हैं’ कहकर साधारण बना देती है।
ध्यान दीजिए: कबीर मन को बाँधने को नहीं कहते — पंछी बाँधा नहीं जाता। वे चुपचाप पेड़ चुनने की बात कर देते हैं। संगति चुनना ही मन को दिशा देने का व्यावहारिक तरीका है।
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