प्र1.
“अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप। अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥”
(क) इस दोहे का आज के समय में क्या महत्व है? इसके बारे में कक्षा में एक वाद-विवाद गतिविधि का आयोजन कीजिए। एक समूह के साथी इसके पक्ष में अपने विचार प्रस्तुत करेंगे और दूसरे समूह के साथी इसके विपक्ष में बोलेंगे। एक तीसरा समूह निर्णायक बन सकता है।
उत्तर
आज के समय में महत्व — यह दोहा आज पहले से अधिक काम का है, क्योंकि आज ‘अति’ के अवसर पहले से कहीं ज़्यादा हैं।
- सूचना की अति: मोबाइल पर दिन भर आती ख़बरें और वीडियो — न सब देखना ठीक, न सबसे कटकर रहना ठीक।
- बोलने की अति: सोशल मीडिया पर हर विषय पर तुरंत राय दे देना, बिना जाने।
- चुप्पी की अति: गलत होते देखकर भी कुछ न कहना।
- उपभोग की अति: ज़रूरत से ज़्यादा खरीदना और फेंकना; और प्रकृति की ओर लौटें तो — अति वर्षा से बाढ़, अति गरमी से सूखा। जलवायु परिवर्तन कबीर के दूसरे चरण को अक्षरशः सच कर रहा है।
आयोजन का तरीका: विषय स्पष्ट लिखिए — “हर स्थिति में संतुलन ही सही रास्ता है।” तीन समूह बनाइए (पक्ष, विपक्ष, निर्णायक)। हर वक्ता को 2 मिनट दीजिए। निर्णायक समूह तीन बातें देखे — तर्क में प्रमाण है या नहीं, उदाहरण ठोस है या नहीं, और वक्ता ने दूसरे पक्ष की बात का उत्तर दिया या नहीं।