मल्हार अध्याय 5 वाद-विवाद

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
“अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप। अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥” (क) इस दोहे का आज के समय में क्या महत्व है? इसके बारे में कक्षा में एक वाद-विवाद गतिविधि का आयोजन कीजिए। एक समूह के साथी इसके पक्ष में अपने विचार प्रस्तुत करेंगे और दूसरे समूह के साथी इसके विपक्ष में बोलेंगे। एक तीसरा समूह निर्णायक बन सकता है।
उत्तर

आज के समय में महत्व — यह दोहा आज पहले से अधिक काम का है, क्योंकि आज ‘अति’ के अवसर पहले से कहीं ज़्यादा हैं।

  • सूचना की अति: मोबाइल पर दिन भर आती ख़बरें और वीडियो — न सब देखना ठीक, न सबसे कटकर रहना ठीक।
  • बोलने की अति: सोशल मीडिया पर हर विषय पर तुरंत राय दे देना, बिना जाने।
  • चुप्पी की अति: गलत होते देखकर भी कुछ न कहना।
  • उपभोग की अति: ज़रूरत से ज़्यादा खरीदना और फेंकना; और प्रकृति की ओर लौटें तो — अति वर्षा से बाढ़, अति गरमी से सूखा। जलवायु परिवर्तन कबीर के दूसरे चरण को अक्षरशः सच कर रहा है।
आयोजन का तरीका: विषय स्पष्ट लिखिए — “हर स्थिति में संतुलन ही सही रास्ता है।” तीन समूह बनाइए (पक्ष, विपक्ष, निर्णायक)। हर वक्ता को 2 मिनट दीजिए। निर्णायक समूह तीन बातें देखे — तर्क में प्रमाण है या नहीं, उदाहरण ठोस है या नहीं, और वक्ता ने दूसरे पक्ष की बात का उत्तर दिया या नहीं।
प्र2.
(ख) पक्ष और विपक्ष के समूह अपने-अपने मत के लिए तर्क प्रस्तुत करेंगे, जैसे— • पक्ष – वाणी पर संयम रखना आवश्यक है। • विपक्ष – अत्यधिक चुप रहना भी उचित नहीं है।
उत्तर
पक्ष — वाणी पर संयम आवश्यक हैविपक्ष — अत्यधिक चुप रहना भी उचित नहीं
बिना सोचे कही बात वापस नहीं ली जा सकती; तीर और बोल दोनों लौटते नहीं।अन्याय के समय चुप्पी अन्याय करने वाले का साथ देती है।
कम बोलने वाले की बात का वज़न अधिक होता है; लोग ध्यान से सुनते हैं।जो अपनी बात नहीं कहता, उसकी परेशानी किसी को पता नहीं चलती और समाधान भी नहीं मिलता।
संयम से बोलने पर झगड़े टलते हैं और सोचने का समय मिल जाता है।चुप्पी को कई बार सहमति मान लिया जाता है, जिससे गलतफ़हमी बढ़ती है।
‘ऐसी बानी बोलिए’ वाला दोहा भी यही कहता है — शब्द दूसरों को और स्वयं को शीतल करें।बहुत चुप रहने वाले में आत्मविश्वास और बोलने का अभ्यास दोनों घट जाते हैं।
निष्कर्ष कहाँ निकलता है: ध्यान दीजिए, दोनों पक्ष सही हैं — और यही दोहे का असली संदेश है। कबीर बोलने के पक्ष में नहीं हैं, चुप्पी के पक्ष में भी नहीं; वे ‘अति’ के विपक्ष में हैं। इसलिए अच्छे वाद-विवाद का अंत ‘कौन जीता’ पर नहीं, इस समझ पर होना चाहिए कि कब बोलना है और कब रुकना है।
प्र3.
(ग) पक्ष और विपक्ष में प्रस्तुत तर्कों की सूची अपनी लेखन-पुस्तिका में लिख लीजिए।
उत्तर

सूची को उपयोगी बनाने के लिए इसे केवल वाक्यों की कतार मत बनाइए। चार खानों की तालिका बनाइए —

क्रमतर्कपक्ष / विपक्षउसका प्रमाण या उदाहरण
1बिना सोचे कही बात लौटती नहींपक्षगुस्से में कहा गया एक वाक्य वर्षों की मित्रता तोड़ देता है
2अन्याय पर चुप्पी अन्याय बढ़ाती हैविपक्षकक्षा में किसी को चिढ़ाया जा रहा हो और कोई न बोले

इसी ढाँचे में शेष तर्क भरते जाइए। अंत में दो पंक्तियों का अपना निष्कर्ष ज़रूर लिखिए — किस तर्क ने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया और क्यों।

क्यों उपयोगी: तर्क के साथ प्रमाण लिखने की आदत ही आगे चलकर निबंध और उत्तर-लेखन को मज़बूत बनाती है। बिना उदाहरण का तर्क केवल राय है।
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