मल्हार अध्याय 5 मिलकर करें मिलान

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) पाठ से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे स्तंभ 1 में दी गई हैं। अपने समूह में इन पर चर्चा कीजिए और इन्हें स्तंभ 2 में दिए गए इनके सही अर्थ या संदर्भ से मिलाइए। इसके लिए आप शब्दकोश, इंटरनेट या अपने शिक्षकों की सहायता ले सकते हैं।
उत्तर
स्तंभ 1 (पंक्ति)स्तंभ 2 (सही अर्थ)क्यों
1. गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।3. गुरु शिष्य का मार्गदर्शन करते हैं और शिष्य गुरु का आदर करते हैं।शिष्य पहले गुरु के चरण छूता है, क्योंकि गोविंद तक का रास्ता गुरु ने बताया।
2. अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।5. जीवन में संतुलन महत्वपूर्ण है।दोनों अतियाँ — बहुत बोलना और बिलकुल चुप रहना — समान रूप से हानिकारक हैं।
3. ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।6. हमें मधुर वाणी बोलनी चाहिए जिससे मन को शांति प्राप्त हो सके।‘सीतल’ शब्द ही शांति की ओर संकेत करता है — दूसरों की भी, अपनी भी।
4. निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।8. आलोचकों को अपने पास रखना चाहिए। वे हमें हमारी गलतियाँ बताते हैं।‘नियरे’ का अर्थ ही निकट है; ‘कुटी छवाय’ उसे स्थायी रूप से पास बसाना है।
5. साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।7. विवेकशील व्यक्ति को अच्छे और बुरे की पहचान होती है।सूप सार रखता है और थोथा उड़ाता है — यही पहचानने की शक्ति विवेक है।
6. कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।4. मन को नियंत्रित करना और सही दिशा में ले जाना महत्वपूर्ण है।पंछी की तरह मन जहाँ चाहे उड़ जाता है, इसीलिए उसे दिशा देनी पड़ती है।
7. साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।1. सत्य का पालन कठिन है और झूठ पाप के समान है।सत्य को ‘तप’ कहना ही बताता है कि उसका पालन आसान नहीं।
8. बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।2. बड़ा होने के साथ व्यक्ति को उदार भी होना चाहिए।खजूर ऊँचा है पर छाया और फल किसी को नहीं देता — ऊँचाई बिना उदारता व्यर्थ है।
तरीका: मिलान में पहले वह पंक्ति उठाइए जिसका कोई एक शब्द ही अर्थ खोल देता है — जैसे ‘नियरे’ (निकट) या ‘अति’। ऐसी दो-तीन जोड़ियाँ बन जाने पर बाकी अपने आप छँट जाती हैं।
प्र2.
(ख) नीचे स्तंभ 1 में दी गई दोहों की पंक्तियों को स्तंभ 2 में दी गई उपयुक्त पंक्तियों से जोड़िए—
उत्तर

हर दोहे की दूसरी पंक्ति पहली पंक्ति का कारण या परिणाम बताती है — इसी सूत्र से जोड़ी बनती है।

स्तंभ 1 (पहली पंक्ति)स्तंभ 2 (दूसरी पंक्ति)
1. गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।8. बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥
2. अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।6. अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥
3. ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।2. औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय॥
4. निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।1. बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय॥
5. साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।4. सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय॥
6. कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।7. जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय॥
7. बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।5. पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर॥
8. साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।3. जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप॥
जोड़ने की दो कुंजियाँ: (1) तुक — दोहे की दोनों पंक्तियों का अंत एक-सी ध्वनि पर होता है: पाँय–बताय, चूप–धूप, खोय–होय, छवाय–सुभाय, सुभाय–उड़ाय, जाय–पाय, खजूर–दूर, पाप–आप। (2) अर्थ की लड़ी — पहली पंक्ति सवाल या दावा रखती है, दूसरी उसका उत्तर देती है। ‘काके लागौं पाँय?’ पूछने के बाद ‘बलिहारी गुरु आपने’ ही आ सकता है।
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