मल्हार अध्याय 5 मेरी समझ से

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा (★) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं। (1) “गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागौं पाँय। बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय॥” इस दोहे में किसके विषय में बताया गया है? • श्रम का महत्व • गुरु का महत्व • ज्ञान का महत्व • भक्ति का महत्व
उत्तर

★ गुरु का महत्व — यही मुख्य उत्तर है। ★ ज्ञान का महत्व भी लिया जा सकता है, क्योंकि गुरु का बड़प्पन उनके दिए ज्ञान से ही बनता है।

“गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥”

भाव — शिष्य के सामने एक ही समय गुरु और गोविंद (ईश्वर) दोनों खड़े हैं। वह उलझन में है — पहले किसके चरण छुए? वह गुरु को चुनता है और कहता है, ‘मैं अपने गुरु पर न्योछावर हूँ, क्योंकि गोविंद का पता तो उन्होंने ही बताया।’

युक्ति कैसे काम करती है: कबीर यहाँ कोई उपदेश नहीं देते। वे एक दृश्य खड़ा कर देते हैं — दो लोग, एक क्षण, एक निर्णय। उत्तर उसी दृश्य के भीतर छिपा है, इसलिए वह याद रह जाता है। ‘बलिहारी’ (बलि जाना, न्योछावर होना) शब्द बताता है कि यह तर्क नहीं, कृतज्ञता है।

‘श्रम का महत्व’ और ‘भक्ति का महत्व’ ठीक नहीं हैं। दोहे में परिश्रम की चर्चा है ही नहीं, और भक्ति यहाँ विषय नहीं — विषय यह है कि भक्ति तक पहुँचाने वाला कौन है।

प्र2.
(2) “अति का भला न बोलना अति का भला न चूप। अति का भला न बरसना अति की भली न धूप॥” इस दोहे का मूल संदेश क्या है? • हमेशा चुप रहने में ही हमारी भलाई है • बारिश और धूप से बचना चाहिए • हर परिस्थिति में संतुलन होना आवश्यक है • हमेशा मधुर वाणी बोलनी चाहिए
उत्तर

★ हर परिस्थिति में संतुलन होना आवश्यक है।

“अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥”

भाव — किसी भी बात की हद पार कर जाना नुकसान करता है। बहुत बोलना भी ठीक नहीं, बिलकुल चुप रह जाना भी ठीक नहीं।

दृष्टांत कैसे काम करता है: दोहे के चारों भाग ‘अति’ से शुरू होते हैं। पहली पंक्ति में मनुष्य के व्यवहार की दो अतियाँ हैं — बोलना और चुप्पी। दूसरी पंक्ति में प्रकृति की दो अतियाँ हैं — वर्षा और धूप। किसान जानता है कि लगातार बरसात में फ़सल गल जाती है और लगातार धूप में सूख जाती है; दोनों अतियों का नतीजा एक ही है — नुकसान। कबीर इसी जानी-पहचानी बात को उठाकर व्यवहार पर रख देते हैं। यही दृष्टांत अलंकार है — उदाहरण देकर बात समझाना।
ध्यान दीजिए: ‘हमेशा मधुर वाणी बोलनी चाहिए’ दूसरे दोहे (‘ऐसी बानी बोलिए’) का संदेश है, इसका नहीं। और ‘बारिश और धूप से बचना चाहिए’ दोहे को अक्षरशः पढ़ लेना है — वर्षा और धूप यहाँ उदाहरण हैं, विषय नहीं।
प्र3.
(3) “बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं फल लागै अति दूर॥” यह दोहा किस जीवन कौशल को विकसित करने पर बल देता है? • समय का सदुपयोग करना • दूसरों के काम आना • परिश्रम और लगन से काम करना • सभी के प्रति उदार रहना
उत्तर

★ दूसरों के काम आना — यह मुख्य उत्तर है। ★ सभी के प्रति उदार रहना भी सही है; पाठ की मिलान-तालिका में इसी दोहे का अर्थ दिया गया है — ‘बड़ा होने के साथ व्यक्ति को उदार भी होना चाहिए।’

“बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर॥”

भाव — केवल ऊँचा या संपन्न हो जाना कोई बड़ी बात नहीं, यदि उस बड़प्पन से किसी दूसरे को कुछ न मिले।

उपमा कैसे काम करती है: ‘जैसे’ वाचक शब्द से व्यक्ति की तुलना खजूर के पेड़ से की गई है। अब देखिए कि तुलना कितनी सटीक है — खजूर सबसे ऊँचे पेड़ों में है, पर उसके पत्ते इतने पतले और ऊपर होते हैं कि नीचे छाया नहीं बनती, और उसके फल इतनी ऊँचाई पर लगते हैं कि थका हुआ राही उन तक पहुँच नहीं सकता। यानी पेड़ के पास देने को दोनों चीज़ें हैं — छाया और फल — पर दोनों किसी के काम नहीं आतीं। ऊँचाई है, उपयोगिता नहीं। जिसके पास पद और धन है पर जिससे किसी को लाभ नहीं, वह ऐसा ही खजूर है।
तुलना कीजिए: बरगद या नीम खजूर से नीचे होते हैं, पर राही उन्हीं के नीचे बैठता है। कबीर बड़ाई को ऊँचाई से नहीं, काम आने से नापते हैं।
प्र4.
(4) “ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोय। औरन को सीतल करै आपहुँ सीतल होय॥” इस दोहे के अनुसार मधुर वाणी बोलने का सबसे बड़ा लाभ क्या है? • लोग हमारी प्रशंसा और सम्मान करने लगते हैं • दूसरों और स्वयं को मानसिक शांति मिलती है • किसी से विवाद होने पर उसमें जीत हासिल होती है • सुनने वालों का मन इधर-उधर भटकने लगता है
उत्तर

★ दूसरों और स्वयं को मानसिक शांति मिलती है।

“ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय॥”

भाव — ऐसी वाणी बोलिए जिसमें से अपना अहंकार निकल चुका हो। वह वाणी सुनने वाले को भी ठंडक देती है और बोलने वाले को भी।

चित्र कैसे काम करता है: कबीर ने मीठे बोल के लिए ‘सीतल’ (शीतलता) शब्द चुना — जैसे गरमी में कोई पानी छिड़क दे। और छिड़कने वाले के अपने हाथ भी भीगते हैं; इसीलिए ‘औरन को सीतल करै’ के तुरंत बाद ‘आपहुँ सीतल होय’ आता है। शर्त एक ही है — ‘मन का आपा खोय’। आपा यानी अहंकार, ‘मैं’ का भाव। जब तक बात में ‘मैं’ बैठा है, शब्द चाहे नरम हों, चुभेंगे।

‘लोग प्रशंसा करने लगते हैं’ और ‘विवाद में जीत मिलती है’ — ये दोनों बाहरी लाभ हैं, और अहंकार को बढ़ाते हैं। कबीर इसका ठीक उलटा कह रहे हैं: लाभ भीतर का है, बाहर का नहीं।

प्र5.
(5) “साँच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप। जाके हिरदे साँच है ता हिरदे गुरु आप॥” इस दोहे से क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता है? • सत्य और झूठ में कोई अंतर नहीं होता है • सत्य का पालन करना किसी साधना से कम नहीं है • बाहरी परिस्थितियाँ ही जीवन में सफलता तय करती हैं • सत्य महत्वपूर्ण जीवन मूल्य है जिससे हृदय प्रकाशित होता है
उत्तर

दो उत्तर सही हैं — ★ सत्य का पालन करना किसी साधना से कम नहीं है और ★ सत्य महत्वपूर्ण जीवन मूल्य है जिससे हृदय प्रकाशित होता है।

“साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप॥”

भाव — सत्य के बराबर कोई तप नहीं और झूठ के बराबर कोई पाप नहीं। जिसके हृदय में सत्य है, उसी हृदय में स्वयं गुरु विराजते हैं।

तुलना कैसे काम करती है: ‘बराबर’ शब्द दो बार आया है और दोनों बार वह एक कसौटी खड़ी करता है। तप की सारी कठिन साधनाएँ एक तराज़ू में रख दीजिए — सत्य उनके बराबर बैठ जाता है। सभी पाप एक तराज़ू में रख दीजिए — झूठ उनके बराबर बैठ जाता है। कबीर कह रहे हैं कि सच बोलना कोई साधारण अच्छाई नहीं, वह अपने आप में तपस्या है, क्योंकि उसमें नुकसान उठाना पड़ता है।
दूसरी पंक्ति और आगे जाती है: सच्चा हृदय ही वह जगह है जहाँ गुरु बसते हैं — यानी जिसके भीतर सच्चाई है, उसे मार्गदर्शन बाहर ढूँढ़ने नहीं जाना पड़ता।

‘सत्य और झूठ में कोई अंतर नहीं होता’ दोहे का उलटा अर्थ है — ‘बराबर’ का अर्थ यहाँ ‘समान’ नहीं, ‘उतना बड़ा’ है।

प्र6.
(6) “निंदक नियरे राखिए आँगन कुटी छवाय। बिन पानी साबुन बिना निर्मल करै सुभाय॥” यहाँ जीवन में किस दृष्टिकोण को अपनाने की सलाह दी गई है? • आलोचना से बचना चाहिए • आलोचकों को दूर रखना चाहिए • आलोचकों को पास रखना चाहिए • आलोचकों की निंदा करनी चाहिए
उत्तर

★ आलोचकों को पास रखना चाहिए।

“निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय॥”

भाव — जो आपकी कमियाँ बताता है, उसे दूर मत कीजिए — उसे अपने आँगन में झोंपड़ी छवाकर बसा लीजिए, क्योंकि वह बिना पानी और साबुन के आपका स्वभाव साफ़ कर देता है।

रूपक कैसे काम करता है: कबीर स्वभाव के दोषों को मैल मान लेते हैं। मैल धोने के लिए दो चीज़ें चाहिए — पानी और साबुन। निंदक इन दोनों के बिना वही काम कर देता है, केवल गलती बता देने भर से। इसलिए वह मुफ़्त का धोबी है — और मुफ़्त की सेवा को कोई दूर क्यों भेजे?
‘आँगन कुटी छवाय’ पूरे चित्र को ठोस बना देता है। कबीर यह नहीं कहते कि निंदक की बात सुन लीजिए; वे कहते हैं उसे रहने की जगह दीजिए — यानी आलोचना को कभी-कभार बरदाश्त करना नहीं, उसे अपने जीवन का स्थायी हिस्सा बनाना है।
आज के लिए: जो शिक्षक आपकी उत्तर-पुस्तिका में सबसे ज़्यादा लाल निशान लगाते हैं, अक्सर वही आपको सबसे अधिक सुधारते हैं।
प्र7.
(7) “साधू ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय। सार-सार को गहि रहै थोथा देइ उड़ाय॥” इस दोहे में ‘सूप’ किसका प्रतीक है? • मन की कल्पनाओं का • सुख-सुविधाओं का • विवेक और सूझबूझ का • कठोर और क्रोधी स्वभाव का
उत्तर

★ विवेक और सूझबूझ का।

“साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय॥”

भाव — अच्छे व्यक्ति का स्वभाव सूप जैसा होना चाहिए — जो सार्थक है उसे रख ले और जो निस्सार है उसे उड़ा दे।

उपमा कैसे काम करती है: सूप बाँस या सींक का बना वह चौड़ा पात्र है जिससे किसान अनाज फटकता है। फटकने पर भारी और भरा दाना (सार) सूप में ही रह जाता है और हल्का, खोखला भूसा (थोथा) हवा में उड़ जाता है। ध्यान दीजिए — सूप कुछ फेंकता नहीं, वह केवल हिलता है; अलग होने का काम दाने और भूसे का अपना भारीपन कर देता है। विवेक भी ऐसा ही है: वह लड़ता नहीं, बस पहचान लेता है कि किसमें वज़न है और किसमें नहीं।
‘जैसा’ वाचक शब्द के कारण यह उपमा है; और चूँकि सूप पूरे दोहे में विवेक के स्थान पर खड़ा है, वह विवेक का प्रतीक भी बन जाता है।
आज के लिए: इंटरनेट पर हर दिन जितनी सूचना आती है, उसमें ‘सार’ थोड़ा और ‘थोथा’ बहुत होता है। सूप वाला स्वभाव ही उसे छानता है।
प्र8.
(ख) हो सकता है कि आपके समूह के साथियों ने अलग-अलग उत्तर चुने हों। अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?
उत्तर

यह चर्चा का प्रश्न है। चर्चा में हर साथी को केवल अपना उत्तर नहीं, उत्तर का आधार बताना चाहिए — दोहे की कौन-सी पंक्ति या कौन-सा शब्द उसे वहाँ ले गया।

अच्छी चर्चा में ये तीन बातें आनी चाहिए —

  • पंक्ति से प्रमाण: ‘मैंने ‘संतुलन’ इसलिए चुना क्योंकि दोहे के चारों भाग ‘अति’ से शुरू होते हैं।’
  • दूसरे विकल्प को नकारने का कारण: ‘मैंने ‘बारिश और धूप से बचना’ नहीं चुना, क्योंकि वर्षा और धूप यहाँ उदाहरण हैं, विषय नहीं।’
  • एक से अधिक उत्तर की गुंजाइश: कुछ प्रश्नों में दो उत्तर सही हो सकते हैं (जैसे प्रश्न 3 और 5) — तब यह देखिए कि दोनों में कौन-सा दोहे के अधिक निकट है।
नमूना उत्तर: “हमारे समूह में तीन साथियों ने प्रश्न 3 का उत्तर ‘दूसरों के काम आना’ चुना और दो ने ‘सभी के प्रति उदार रहना’। चर्चा में हमने पाया कि दोनों एक ही बात के दो रूप हैं — उदारता भाव है और दूसरों के काम आना उसका व्यवहार। किसी ने ‘परिश्रम और लगन’ नहीं चुना, क्योंकि दोहे में परिश्रम की चर्चा ही नहीं है।”
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