मल्हार अध्याय 5 सबकी प्रस्तुति

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
पाठ के किसी एक दोहे को चुनकर अपने समूह के साथ मिलकर भिन्न-भिन्न प्रकार से कक्षा के सामने प्रस्तुत कीजिए। उदाहरण के लिए— • गायन करना, जैसे लोकगीत शैली में। • भाव-नृत्य प्रस्तुति। • कविता पाठ करना। • संगीत के साथ प्रस्तुत करना। • अभिनय करना, जैसे एक दोस्त गुस्से में आकर कुछ गलत कह देता है लेकिन दूसरा दोस्त उसे समझाता है कि मधुर भाषा का कितना प्रभाव पड़ता है। (ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।)
उत्तर

यह समूह-गतिविधि है। अच्छी प्रस्तुति में तीन बातें होनी चाहिए — दोहा साफ़ सुनाई दे, उसका भाव दिखे, और प्रस्तुति के अंत में एक पंक्ति में संदेश कहा जाए

तैयारी के चरण —

  1. दोहा चुनिए और उसका अर्थ पूरे समूह को समझा दीजिए। अर्थ समझे बिना अभिनय बनावटी लगता है।
  2. प्रस्तुति का रूप चुनिए — गायन, नृत्य, अभिनय या काव्य-पाठ। समूह में जो जिसमें सहज हो, उसे वही भूमिका दीजिए।
  3. दोहे की लय पकड़िए। दोहे की हर पंक्ति बोलने में लगभग बराबर समय लेती है — गाते समय यही लय ताल बन जाती है।
  4. दो बार पूर्वाभ्यास कीजिए और समय 3 मिनट के भीतर रखिए।
नमूना योजना (अभिनय) — दोहा: “ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।”
दृश्य 1: मैदान में मैच हारने पर एक खिलाड़ी साथी पर चिल्लाता है — “तुम्हारे कारण हारे!” साथी सिर झुकाकर चला जाता है।
दृश्य 2: अगले दिन वही खिलाड़ी अकेला बैठा है; उसका मन भी खराब है। तीसरा साथी आकर दोहा गुनगुनाता है।
दृश्य 3: वह साथी के पास जाकर कहता है — “कल मुझसे गलत कहा गया। कैच किसी से भी छूट सकता है।” दोनों हँसकर खेलने चले जाते हैं।
समापन: पूरा समूह मिलकर दोहा बोलता है और एक विद्यार्थी कहता है — “मीठा बोल सुनने वाले को ही नहीं, बोलने वाले को भी ठंडक देता है।”
गायन क्यों सबसे उपयुक्त है: कबीर के दोहे लिखकर नहीं, गा-गाकर लोगों तक पहुँचे थे। आज भी वे भजन और लोकगीत के रूप में गाए जाते हैं। लोकगीत शैली में गाकर आप वही परंपरा दोहरा रहे होंगे जिससे ये दोहे सैकड़ों वर्षों तक जीवित रहे।
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