मल्हार अध्याय 5 आपकी बात

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।” क्या आपके जीवन में कोई ऐसा व्यक्ति है जिसने आपको सही दिशा दिखाने में सहायता की हो? उस व्यक्ति के बारे में बताइए।
उत्तर

यह आपके अपने अनुभव का प्रश्न है, इसलिए उत्तर आपका ही होना चाहिए। पर अच्छा उत्तर बनाने के लिए इन चार बातों को क्रम से रखिए —

  1. वह व्यक्ति कौन है और आपसे उसका क्या संबंध है।
  2. कौन-सी एक ठोस घटना — कब, कहाँ, क्या हुआ। सामान्य बातें (“वे बहुत अच्छे हैं”) उत्तर को कमज़ोर करती हैं।
  3. उन्होंने क्या कहा या किया, और उससे आपमें क्या बदला।
  4. दोहे से जोड़ - वे आपके लिए किस अर्थ में ‘गुरु’ हैं।
नमूना उत्तर: “छठी कक्षा में मैं गणित से इतना डरता था कि प्रश्न देखते ही कॉपी बंद कर देता था। हमारे शिक्षक श्री रमेश जी ने एक दिन मुझे रोककर कहा — ‘उत्तर मत सोचो, पहला कदम सोचो।’ फिर उन्होंने रोज़ भोजनावकाश के दस मिनट मुझे केवल पहला कदम लिखवाना सिखाया। तीन महीने बाद मैं पूरा प्रश्न स्वयं हल करने लगा। उन्होंने मुझे गणित नहीं सिखाया था — उन्होंने डर के सामने खड़ा होना सिखाया था। मेरे लिए वे ही कबीर वाले गुरु हैं, क्योंकि रास्ता उन्होंने ही दिखाया।”
ध्यान दीजिए: ‘गुरु’ केवल विद्यालय का शिक्षक नहीं होता। माता-पिता, दादी, कोई कारीगर, कोई खिलाड़ी-प्रशिक्षक या कोई पुस्तक भी उस काम की गुरु हो सकती है जो उसने सिखाया।
प्र2.
(ख) “निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।” क्या कभी किसी ने आपकी कमियों या गलतियों के विषय में बताया है जिनमें आपको सुधार करने का अवसर मिला हो? उस अनुभव को साझा कीजिए।
उत्तर

यह भी अनुभव का प्रश्न है। उत्तर में यह ज़रूर आना चाहिए कि पहली प्रतिक्रिया क्या थी — क्योंकि आलोचना सुनते ही अच्छी लगे, ऐसा कम होता है। सच्चाई से लिखा गया उत्तर ही असर करता है।

ढाँचा: गलती क्या थी → किसने बताई और कैसे बताई → आपको उस समय कैसा लगा → आपने क्या किया → अब पीछे मुड़कर देखने पर क्या लगता है।

नमूना उत्तर: “मुझे लगता था कि मैं वाद-विवाद में अच्छा बोलता हूँ। एक दिन मेरी सहेली ने कहा — ‘तुम बोलते समय किसी की बात पूरी नहीं सुनतीं, बीच में काट देती हो।’ मुझे बहुत बुरा लगा और दो दिन मैंने उससे बात नहीं की। फिर अगली प्रतियोगिता की रिकॉर्डिंग देखी तो सचमुच मैंने तीन बार दूसरों को टोका था। मैंने तय किया कि जब तक सामने वाला रुक न जाए, मैं नहीं बोलूँगी। अगली बार निर्णायकों ने मेरी ‘सुनने की क्षमता’ की तारीफ़ की। उस दिन समझ आया कि जो सच बता दे, वह मित्र है — इसीलिए कबीर उसे आँगन में बसाने को कहते हैं।”
इसमें सीखने की बात: ध्यान दीजिए कि इस उत्तर में आलोचना पहले चुभी और बाद में काम आई। कबीर भी यही मानते हैं — निंदक सुख नहीं देता, सफ़ाई देता है; और सफ़ाई में थोड़ी रगड़ लगती ही है।
प्र3.
(ग) “कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।” क्या आपने कभी अनुभव किया है कि आपकी संगति (जैसे— मित्र) आपके विचारों और आदतों या व्यवहारों को प्रभावित करती है? अपने अनुभव साझा कीजिए।
उत्तर

अपने अनुभव में एक बदलाव चुनिए और उसे नापकर बताइए — क्या पहले था, क्या बाद में हुआ, और बीच में किसकी संगति थी। संगति का असर तभी दिखता है जब पहले और बाद की तुलना हो।

नमूना उत्तर: “पिछले वर्ष तक मैं विद्यालय से लौटकर सीधे मोबाइल उठा लेता था। इस वर्ष हमारे मोहल्ले में दो लड़के शाम को मैदान में खो-खो खेलने लगे और मुझे भी बुला लिया। पहले हफ़्ते मैं मन मारकर गया, फिर आदत बन गई। अब मैं रोज़ एक घंटा खेलता हूँ, रात को समय पर नींद आ जाती है और सुबह पढ़ने में मन लगता है। किसी ने मुझे मोबाइल छोड़ने को नहीं कहा था — बस मेरा ‘पेड़’ बदल गया।”
संगति का असर सीधा नहीं होता: कोई मित्र यह नहीं कहता कि ‘अब से ऐसा करो’। असर साथ बिताए समय से आता है — जो लोग जिस काम में समय लगाते हैं, हमारा समय भी उधर मुड़ जाता है। इसीलिए मित्र चुनना असल में यह चुनना है कि आपका समय किधर जाएगा।
दूसरा पक्ष भी लिख सकते हैं: यदि किसी संगति ने आपकी कोई आदत बिगाड़ी हो और आपने उसे पहचानकर बदला हो, तो वह भी उतना ही अच्छा उत्तर है — बल्कि उसमें आपकी अपनी समझ भी दिखती है।
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