मल्हार अध्याय 5 सृजन

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) “साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।” इस दोहे पर आधारित एक कहानी लिखिए जिसमें किसी व्यक्ति ने कठिन परिस्थितियों में भी सत्य का साथ नहीं छोड़ा। (संकेत— किसी खेल में आपकी टीम द्वारा नियमों के उल्लंघन का आपके द्वारा विरोध किया जाना।)
उत्तर

कहानी में क्या-क्या होना चाहिए —

  • एक ऐसी स्थिति जिसमें सच बोलने में नुकसान हो। यही कहानी की जान है; बिना कीमत के सत्य में कोई कहानी नहीं बनती।
  • पात्र के मन की उलझन — वह क्षण जब चुप रह जाना आसान लग रहा हो।
  • निर्णय और उसका तुरंत परिणाम (जो अक्सर बुरा होता है)।
  • अंत में वह लाभ जो दिखाई नहीं देता — भरोसा, आत्मसम्मान, चैन।
नमूना कहानी — आख़िरी गेंद
अंतर-विद्यालय क्रिकेट का फ़ाइनल था। आख़िरी गेंद पर दो रन चाहिए थे। मैंने गेंद को हवा में उछाला और दौड़ पड़ा। विपक्षी क्षेत्ररक्षक ने कैच पकड़ा, पर गेंद ज़मीन छूकर उसके हाथ में आई थी — यह केवल मैंने देखा था, क्योंकि मैं सबसे पास था। अंपायर ने मुझे नॉट आउट देकर हमारी टीम को विजेता घोषित कर दिया।

मेरे साथी दौड़कर मुझसे लिपट गए। पर मुझे वह क्षण याद आ रहा था जब गेंद घास से टकराई थी। मैंने अंपायर के पास जाकर कहा — “सर, वह कैच पूरा नहीं था, पर मैं उससे पहले क्रीज़ पार कर चुका था; रन हमारा है। मैं चाहता हूँ कि आप एक बार दोबारा देख लें।” अंपायर ने दोनों टीमों को बुलाया, वीडियो देखा और निर्णय बदल दिया। हम एक रन से हार गए।

लौटते समय हमारी टीम चुप थी और मेरा मन भारी था। पर विपक्षी टीम का कप्तान मेरे पास आया और बोला — “तुमने हमें ट्रॉफ़ी नहीं दी, तुमने खेल को बचा लिया।” अगले वर्ष जब हमारे विद्यालय ने टीम का कप्तान चुना, तो कोच ने मेरा नाम लिया और कहा — “कप्तान वही होगा जिसकी बात पर सब भरोसा कर सकें।”

उस दिन मुझे कबीर की पंक्ति का अर्थ समझ आया — साँच बराबर तप नहीं। तप का अर्थ ही यह है कि कुछ खोकर कुछ पाया जाए।
कहानी की बनावट पर ध्यान दीजिए: यहाँ सत्य बोलने पर तुरंत हार मिली और लाभ बहुत बाद में। यदि सच बोलते ही इनाम मिल जाता, तो कहानी उपदेश बन जाती। दोहे की गहराई इसी में है कि वह सत्य को ‘तप’ कहता है, ‘सौदा’ नहीं।
प्र2.
(ख) “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।” इस दोहे को ध्यान में रखते हुए अपने किसी प्रेरणादायक शिक्षक से साक्षात्कार कीजिए और उनके योगदान पर एक निबंध लिखिए।
उत्तर

चरण 1 — साक्षात्कार की तैयारी। पहले से समय लीजिए और प्रश्न लिखकर ले जाइए। ऐसे प्रश्न पूछिए जिनका उत्तर ‘हाँ/नहीं’ में न हो —

  • आपने शिक्षक बनने का निश्चय कब और क्यों किया?
  • आपके अपने कोई ऐसे गुरु रहे जिन्होंने आपको बदला हो?
  • पढ़ाते समय आपकी सबसे बड़ी चुनौती क्या रही है?
  • कोई एक विद्यार्थी जिसका बदलना आपको आज भी याद है?
  • आज के विद्यार्थियों से आप क्या कहना चाहेंगे?

चरण 2 — नोट लेना। उत्तर सुनते समय पूरे वाक्य लिखने की कोशिश मत कीजिए; मुख्य शब्द और उनके अपने दो-तीन वाक्य ज्यों के त्यों लिख लीजिए — निबंध में उद्धरण बहुत असर करते हैं। अनुमति लेकर रिकॉर्ड भी कर सकते हैं।

चरण 3 — निबंध का ढाँचा —

भागउसमें क्या
शीर्षकजैसे — “गोविंद दियो बताय : श्रीमती सुनीता शर्मा से बातचीत”
भूमिकादोहे की पंक्ति से आरंभ; शिक्षक का परिचय, कितने वर्षों से पढ़ा रहे हैं
बीच का भागसाक्षात्कार से मिली बातें — उनका रास्ता, उनकी कठिनाइयाँ, उनकी पढ़ाने की शैली, कोई एक घटना; बीच-बीच में उनके अपने शब्द उद्धरण चिह्नों में
आपका अनुभवउनसे आपने व्यक्तिगत रूप से क्या पाया — एक ठोस उदाहरण
निष्कर्षदोहे पर लौटिए — गुरु ‘गोविंद’ यानी लक्ष्य तक का रास्ता कैसे बताते हैं
सुझाव: निबंध पूरा होने पर एक प्रति उन शिक्षक को भी दीजिए। साक्षात्कार का शिष्टाचार यही है — और वह आपकी अगली बातचीत का रास्ता भी खोल देता है।
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