प्र1.
(क) “साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।” इस दोहे पर आधारित एक कहानी लिखिए जिसमें किसी व्यक्ति ने कठिन परिस्थितियों में भी सत्य का साथ नहीं छोड़ा। (संकेत— किसी खेल में आपकी टीम द्वारा नियमों के उल्लंघन का आपके द्वारा विरोध किया जाना।)
उत्तर
कहानी में क्या-क्या होना चाहिए —
- एक ऐसी स्थिति जिसमें सच बोलने में नुकसान हो। यही कहानी की जान है; बिना कीमत के सत्य में कोई कहानी नहीं बनती।
- पात्र के मन की उलझन — वह क्षण जब चुप रह जाना आसान लग रहा हो।
- निर्णय और उसका तुरंत परिणाम (जो अक्सर बुरा होता है)।
- अंत में वह लाभ जो दिखाई नहीं देता — भरोसा, आत्मसम्मान, चैन।
नमूना कहानी — आख़िरी गेंद
अंतर-विद्यालय क्रिकेट का फ़ाइनल था। आख़िरी गेंद पर दो रन चाहिए थे। मैंने गेंद को हवा में उछाला और दौड़ पड़ा। विपक्षी क्षेत्ररक्षक ने कैच पकड़ा, पर गेंद ज़मीन छूकर उसके हाथ में आई थी — यह केवल मैंने देखा था, क्योंकि मैं सबसे पास था। अंपायर ने मुझे नॉट आउट देकर हमारी टीम को विजेता घोषित कर दिया।
मेरे साथी दौड़कर मुझसे लिपट गए। पर मुझे वह क्षण याद आ रहा था जब गेंद घास से टकराई थी। मैंने अंपायर के पास जाकर कहा — “सर, वह कैच पूरा नहीं था, पर मैं उससे पहले क्रीज़ पार कर चुका था; रन हमारा है। मैं चाहता हूँ कि आप एक बार दोबारा देख लें।” अंपायर ने दोनों टीमों को बुलाया, वीडियो देखा और निर्णय बदल दिया। हम एक रन से हार गए।
लौटते समय हमारी टीम चुप थी और मेरा मन भारी था। पर विपक्षी टीम का कप्तान मेरे पास आया और बोला — “तुमने हमें ट्रॉफ़ी नहीं दी, तुमने खेल को बचा लिया।” अगले वर्ष जब हमारे विद्यालय ने टीम का कप्तान चुना, तो कोच ने मेरा नाम लिया और कहा — “कप्तान वही होगा जिसकी बात पर सब भरोसा कर सकें।”
उस दिन मुझे कबीर की पंक्ति का अर्थ समझ आया — साँच बराबर तप नहीं। तप का अर्थ ही यह है कि कुछ खोकर कुछ पाया जाए।
अंतर-विद्यालय क्रिकेट का फ़ाइनल था। आख़िरी गेंद पर दो रन चाहिए थे। मैंने गेंद को हवा में उछाला और दौड़ पड़ा। विपक्षी क्षेत्ररक्षक ने कैच पकड़ा, पर गेंद ज़मीन छूकर उसके हाथ में आई थी — यह केवल मैंने देखा था, क्योंकि मैं सबसे पास था। अंपायर ने मुझे नॉट आउट देकर हमारी टीम को विजेता घोषित कर दिया।
मेरे साथी दौड़कर मुझसे लिपट गए। पर मुझे वह क्षण याद आ रहा था जब गेंद घास से टकराई थी। मैंने अंपायर के पास जाकर कहा — “सर, वह कैच पूरा नहीं था, पर मैं उससे पहले क्रीज़ पार कर चुका था; रन हमारा है। मैं चाहता हूँ कि आप एक बार दोबारा देख लें।” अंपायर ने दोनों टीमों को बुलाया, वीडियो देखा और निर्णय बदल दिया। हम एक रन से हार गए।
लौटते समय हमारी टीम चुप थी और मेरा मन भारी था। पर विपक्षी टीम का कप्तान मेरे पास आया और बोला — “तुमने हमें ट्रॉफ़ी नहीं दी, तुमने खेल को बचा लिया।” अगले वर्ष जब हमारे विद्यालय ने टीम का कप्तान चुना, तो कोच ने मेरा नाम लिया और कहा — “कप्तान वही होगा जिसकी बात पर सब भरोसा कर सकें।”
उस दिन मुझे कबीर की पंक्ति का अर्थ समझ आया — साँच बराबर तप नहीं। तप का अर्थ ही यह है कि कुछ खोकर कुछ पाया जाए।
कहानी की बनावट पर ध्यान दीजिए: यहाँ सत्य बोलने पर तुरंत हार मिली और लाभ बहुत बाद में। यदि सच बोलते ही इनाम मिल जाता, तो कहानी उपदेश बन जाती। दोहे की गहराई इसी में है कि वह सत्य को ‘तप’ कहता है, ‘सौदा’ नहीं।