प्र1.
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में विचार-विमर्श कीजिए और साझा कीजिए—
(क) “अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।” इंटरनेट पर अनावश्यक सूचनाएँ साझा करने के क्या-क्या संकट हो सकते हैं?
उत्तर
इंटरनेट पर ‘बोलना’ भी अति हो सकता है — और वहाँ बोली हुई बात मिटती नहीं, दर्ज हो जाती है। खतरे ये हैं —
- निजी जानकारी का दुरुपयोग: घर का पता, विद्यालय का नाम, रोज़ का समय, यात्रा की योजना, माता-पिता के काम की जानकारी — इनसे कोई अजनबी आपकी दिनचर्या जान सकता है।
- फ़ोटो का गलत उपयोग: साझा की गई तस्वीर बदलकर या गलत संदर्भ में फैलाई जा सकती है।
- बैंक और पासवर्ड संबंधी ठगी: जन्मतिथि, विद्यालय का नाम या पालतू का नाम अक्सर पासवर्ड और सुरक्षा-प्रश्न में होते हैं।
- स्थायी रिकॉर्ड: गुस्से में लिखी एक टिप्पणी वर्षों बाद भी खोजी जा सकती है — इंटरनेट भूलता नहीं।
- अफ़वाह फैलाने में भागीदारी: बिना जाँचे आगे भेजी गई बात से किसी निर्दोष को नुकसान हो सकता है, और भेजने वाला भी ज़िम्मेदार माना जाता है।
- ध्यान और समय की हानि: हर बात पर प्रतिक्रिया देने की आदत पढ़ाई का समय खा जाती है।
दोहा यहाँ कैसे लागू है: कबीर चुप्पी की भी वकालत नहीं करते। इंटरनेट पर दूसरी अति भी है — गलत होते देखकर कुछ न कहना, या साइबर बदमाशी की शिकायत न करना। संतुलन यह है: निजी बात मत साझा कीजिए, पर गलत काम की सूचना बड़ों और शिक्षकों को ज़रूर दीजिए।
एक सरल कसौटी: पोस्ट करने से पहले पूछिए — “क्या यह बात मैं कक्षा में सबके सामने बोर्ड पर लिख सकता हूँ?” उत्तर ‘नहीं’ हो तो साझा मत कीजिए।