मल्हार अध्याय 5 साइबर सुरक्षा और दोहे

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में विचार-विमर्श कीजिए और साझा कीजिए— (क) “अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।” इंटरनेट पर अनावश्यक सूचनाएँ साझा करने के क्या-क्या संकट हो सकते हैं?
उत्तर

इंटरनेट पर ‘बोलना’ भी अति हो सकता है — और वहाँ बोली हुई बात मिटती नहीं, दर्ज हो जाती है। खतरे ये हैं —

  • निजी जानकारी का दुरुपयोग: घर का पता, विद्यालय का नाम, रोज़ का समय, यात्रा की योजना, माता-पिता के काम की जानकारी — इनसे कोई अजनबी आपकी दिनचर्या जान सकता है।
  • फ़ोटो का गलत उपयोग: साझा की गई तस्वीर बदलकर या गलत संदर्भ में फैलाई जा सकती है।
  • बैंक और पासवर्ड संबंधी ठगी: जन्मतिथि, विद्यालय का नाम या पालतू का नाम अक्सर पासवर्ड और सुरक्षा-प्रश्न में होते हैं।
  • स्थायी रिकॉर्ड: गुस्से में लिखी एक टिप्पणी वर्षों बाद भी खोजी जा सकती है — इंटरनेट भूलता नहीं
  • अफ़वाह फैलाने में भागीदारी: बिना जाँचे आगे भेजी गई बात से किसी निर्दोष को नुकसान हो सकता है, और भेजने वाला भी ज़िम्मेदार माना जाता है।
  • ध्यान और समय की हानि: हर बात पर प्रतिक्रिया देने की आदत पढ़ाई का समय खा जाती है।
दोहा यहाँ कैसे लागू है: कबीर चुप्पी की भी वकालत नहीं करते। इंटरनेट पर दूसरी अति भी है — गलत होते देखकर कुछ न कहना, या साइबर बदमाशी की शिकायत न करना। संतुलन यह है: निजी बात मत साझा कीजिए, पर गलत काम की सूचना बड़ों और शिक्षकों को ज़रूर दीजिए।
एक सरल कसौटी: पोस्ट करने से पहले पूछिए — “क्या यह बात मैं कक्षा में सबके सामने बोर्ड पर लिख सकता हूँ?” उत्तर ‘नहीं’ हो तो साझा मत कीजिए।
प्र2.
(ख) “साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।” किसी भी वेबसाइट, ईमेल या मीडिया पर उपलब्ध जानकारी को ‘सूप’ की तरह छानने की आवश्यकता क्यों है? कैसे तय करें कि कौन-सी सूचना उपयोगी है और कौन-सी हानिकारक?
उत्तर

छानने की ज़रूरत क्यों — इंटरनेट पर कुछ भी डालने से पहले कोई जाँच नहीं होती, जैसे पुस्तक छपने से पहले होती है। इसलिए वहाँ ‘सार’ और ‘थोथा’ आपस में मिले-जुले पड़े रहते हैं। साथ ही बहुत-सी सामग्री किसी उद्देश्य से बनाई जाती है — कुछ बेचने के लिए, कुछ डराने के लिए, कुछ केवल क्लिक पाने के लिए। बिना छाने सब स्वीकार कर लेने पर हम गलत सूचना पर निर्णय ले बैठते हैं और उसे आगे फैलाकर दूसरों को भी भटकाते हैं।

कैसे तय करें — जाँच की छह कसौटियाँ:

कसौटीक्या देखें
स्रोतकिसने प्रकाशित किया? सरकारी (.gov.in), शैक्षिक (.edu, ncert.nic.in) या प्रतिष्ठित संस्था का पृष्ठ अधिक भरोसेमंद है।
लेखकनाम दिया है या नहीं? बिना नाम की सामग्री की जवाबदेही किसी की नहीं होती।
तिथिकब की जानकारी है? पुरानी संख्या और नियम आज गलत हो सकते हैं।
प्रमाणआँकड़े के साथ स्रोत दिया है? या केवल दावा है?
दूसरी जगह जाँचवही बात दो-तीन स्वतंत्र भरोसेमंद स्थानों पर मिलती है या नहीं।
भाषा का स्वर“तुरंत सबको भेजें”, “यह सच कोई नहीं बताएगा”, बहुत सारे विस्मयादिबोधक चिह्न — ये अफ़वाह के पक्के लक्षण हैं।
सूप का रूपक यहाँ ठीक क्यों बैठता है: सूप कुछ फेंकता नहीं, वह हिलाकर भारीपन जाँचता है। जाँच भी यही करती है — दावे को हिलाइए, यानी उसका प्रमाण पूछिए। जिसमें वज़न होगा वह टिक जाएगा, थोथा अपने आप उड़ जाएगा।
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