जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय॥”
क्यों यही दोहा — घटना में दो चीज़ें हैं जो सीधे इस दोहे से मिलती हैं। पहली, अमित का मन कहीं टिकता नहीं — यही ‘मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय’ है। दूसरी, कम अंक कोई अलग दंड नहीं, वे उसकी संगति का फल हैं — ‘सो तैसा फल पाय’। ध्यान दीजिए कि अमित को किसी ने सज़ा नहीं दी; परिणाम अपने आप आया, जैसे पेड़ पर बैठे पंछी को उसी पेड़ का फल मिलता है।