मल्हार अध्याय 5 आज के समय में

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
नीचे कुछ घटनाएँ दी गई हैं। इन्हें पढ़कर आपको कबीर के कौन-से दोहे याद आते हैं? घटनाओं के नीचे दिए गए रिक्त स्थान पर उन दोहों को लिखिए— 1. अमित का मन पढ़ाई में नहीं लगता था और वह गलत संगति में चला गया। कुछ समय बाद जब उसके अंक कम आए तो उसे समझ में आया — “संगति का असर जीवन पर पड़ता है।”
उत्तर
“कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।
जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय॥”

क्यों यही दोहा — घटना में दो चीज़ें हैं जो सीधे इस दोहे से मिलती हैं। पहली, अमित का मन कहीं टिकता नहीं — यही ‘मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय’ है। दूसरी, कम अंक कोई अलग दंड नहीं, वे उसकी संगति का फल हैं — ‘सो तैसा फल पाय’। ध्यान दीजिए कि अमित को किसी ने सज़ा नहीं दी; परिणाम अपने आप आया, जैसे पेड़ पर बैठे पंछी को उसी पेड़ का फल मिलता है।

प्र2.
2. एक विद्यार्थी इंटरनेट पर लगातार सूचनाएँ खोज रहा था। उसके पिता ने कहा — “हर जानकारी सही नहीं होती, सही बातों को चुनो और बेकार छोड़ दो।”
उत्तर
“साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय॥”

क्यों यही दोहा — पिता की सलाह के दोनों हिस्से दोहे की दूसरी पंक्ति के दो हिस्से हैं — ‘सही बातों को चुनो’ = सार सार को गहि रहै, ‘बेकार छोड़ दो’ = थोथा देइ उड़ाय। इंटरनेट की ढेर सारी सूचना ठीक वैसी ही है जैसा फटकने से पहले का अनाज — दाना और भूसा एक साथ। छाँटने का काम कोई और नहीं कर सकता, वह अपने विवेक से ही होता है।

प्र3.
3. आपका एक मित्र आपकी किसी गलत बात पर आपकी आलोचना करता है। आप पहले परेशान होते हैं, लेकिन फिर आपने सोचा — “आलोचना मुझे सुधरने का मौका देती है, मुझे इन बातों का बुरा नहीं मानना चाहिए। इसे सकारात्मक रूप से लेना चाहिए।”
उत्तर
“निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय॥”

क्यों यही दोहा — घटना में जो बदलाव आया है, वही दोहे का मर्म है: पहले बुरा लगना और फिर लाभ दिखना। मित्र ने न कोई पानी लगाया, न साबुन — केवल गलती बता दी, और स्वभाव का मैल साफ़ होने लगा। इसीलिए कबीर ऐसे मित्र को दूर नहीं, आँगन में बसाने की सलाह देते हैं।

प्र4.
4. रीमा ने अपने गुस्से में सहकर्मी को बुरा-भला कह दिया, जिससे वातावरण बिगड़ गया। बाद में उसने समझा कि अगर वह शांति से बात करती तो समस्या हल हो जाती।
उत्तर
“ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय॥”

क्यों यही दोहा — रीमा की गलती बात कहने में नहीं, गुस्से के साथ कहने में थी — यानी ‘आपा’ बीच में आ गया। और परिणाम भी दोहे जैसा ही उल्टा हुआ: वातावरण बिगड़ने से केवल सहकर्मी परेशान नहीं हुआ, रीमा को भी बाद में पछतावा हुआ। जो दूसरों को शीतल नहीं कर पाती, वह स्वयं भी शीतल नहीं रह पाती।

प्र5.
5. कक्षा में मोहन ने बहुत अधिक बोलकर सबको परेशान कर दिया, जबकि रमेश बिल्कुल चुप रहा। गुरुजी ने कहा — “बोलचाल में संतुलन आवश्यक है, न अधिक बोलो, न अधिक चुप रहो।”
उत्तर
“अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥”

क्यों यही दोहा — यह घटना तो दोहे की पहली पंक्ति का जीता-जागता चित्र है — मोहन ‘अति बोलना’ है और रमेश ‘अति चूप’। गुरुजी की बात दोहे का ही सार है। और दूसरी पंक्ति याद दिलाती है कि यह कोई नई सीख नहीं — प्रकृति भी यही सिखाती है, जहाँ न लगातार वर्षा भली है, न लगातार धूप।

प्र6.
6. सुरेश को जब ‘प्रतिभा सम्मान’ मिला तो उसने कहा — “इसमें मेरे परिश्रम के साथ मेरे गुरुजनों का मार्गदर्शन भी सम्मिलित है।”
उत्तर
“गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥”

क्यों यही दोहा — सम्मान मिलने का क्षण वही क्षण है जब ‘आपा’ सबसे आसानी से सिर उठाता है। सुरेश उसी क्षण में पहला श्रेय गुरु को देता है — ठीक वैसे ही जैसे दोहे का शिष्य गोविंद के सामने खड़ा होकर भी पहले गुरु के चरण छूता है। उसने अपना परिश्रम नकारा नहीं; उसने केवल यह माना कि परिश्रम को दिशा किसने दी।

छह घटनाओं का सार: ध्यान दीजिए, पाठ के आठ में से छह दोहे यहाँ काम आ गए — यही बताता है कि ये दोहे किसी पुराने समय की बात नहीं, आज की साधारण घटनाओं की भाषा हैं।
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