मल्हार अध्याय 4 मेरी समझ से

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा (★) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं। 1. “सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं” का क्या अर्थ है? • लेखक के अनुसार सज्जन लोग बिना पूछे स्वादिष्ट रसीले फल देते हैं। • लेखक फलदार वृक्षों की उदारता को मानवीय रूप में व्यक्त कर रहे हैं। • लेखक का मानना था कि हरिद्वार के सभी दुकानदार बहुत सज्जन थे। • लेखक को पत्थर मारकर पके हुए फल तोड़कर खाना पसंद था।
उत्तर

सही उत्तर — लेखक फलदार वृक्षों की उदारता को मानवीय रूप में व्यक्त कर रहे हैं। इसी के सामने तारा (★) बनाइए।

प्रमाण पाठ से ही: यह वाक्य पत्र में वृक्षों वाले अनुच्छेद के बीच आया है — “फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़; यहाँ तक कि जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोरथ पूर्ण करते हैं। सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं।” यानी ‘सज्जन’ यहाँ वृक्ष हैं। पुस्तक स्वयं आगे ‘काल की पहचान’ में इसी वाक्य को इस रूप में लिखती है — “वृक्ष ऐसे हैं कि पत्थर मारने से फल देते हैं।” इससे संदेह ही नहीं बचता।
विकल्पसही / गलतकारण
सज्जन लोग बिना पूछे रसीले फल देते हैंगलतवाक्य का विषय मनुष्य नहीं, वृक्ष हैं। ‘पत्थर मारने’ की बात मनुष्यों पर लागू ही नहीं होती।
फलदार वृक्षों की उदारता को मानवीय रूप में व्यक्त करनासही ★वृक्ष पर पत्थर मारो तो भी वह बदले में फल ही देता है — यही सज्जन का स्वभाव है। निर्जीव वृक्ष को सज्जन मनुष्य का गुण देना मानवीकरण कहलाता है।
हरिद्वार के सभी दुकानदार सज्जन थेगलतदुकानदारों की चर्चा बहुत बाद में आती है — “पंडे दुकानदार इत्यादि कनखल व ज्वालापुर से आते हैं।” इस वाक्य से उसका कोई संबंध नहीं।
लेखक को पत्थर मारकर फल तोड़ना पसंद थागलतयह वाक्य का शब्दशः, सतही अर्थ है। पूरा अनुच्छेद वृक्षों की परोपकार-वृत्ति की प्रशंसा कर रहा है, लेखक की आदत नहीं बता रहा।
ध्यान दें: पुराने वाक्य में क्रिया का कर्ता अक्सर छूट जाता है। ऐसे वाक्य का अर्थ अकेले वाक्य से नहीं, उससे पहले-बाद की पंक्तियों से निकालना चाहिए।
प्र2.
2. “वैराग्य और भक्ति का उदय होता था” इस कथन से लेखक का कौन-सा भाव प्रकट होता है? • शारीरिक थकान और मानसिक बेचैनी • आर्थिक संतोष और मानसिक विकास • मानसिक शांति और आध्यात्मिक अनुभव • सामाजिक सद्भाव और पारिवारिक प्रेम
उत्तर

सही उत्तर — मानसिक शांति और आध्यात्मिक अनुभव। इसी के सामने तारा (★) बनाइए।

पूरी पंक्ति इस प्रकार है — “चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था। झगड़े-लड़ाई का कहीं नाम भी नहीं था।” तीनों शब्द — ज्ञान, वैराग्य, भक्ति — मन की अवस्थाएँ हैं, शरीर या धन की नहीं।

क्यों: ‘वैराग्य’ का अर्थ है सांसारिक वस्तुओं से मन का हट जाना और ‘भक्ति’ का अर्थ है ईश्वर की ओर मन का लग जाना। जिस मन में ये दोनों बार-बार उठ रहे हों, वह मन न थका हुआ है, न बेचैन — वह शांत है। और यह शांति किसी सामाजिक या पारिवारिक कारण से नहीं, तीर्थ के वातावरण से आई है, इसलिए इसे आध्यात्मिक कहा जाएगा।
  • शारीरिक थकान और मानसिक बेचैनी — इसका उलटा सच है; लेखक कहते हैं “जितना समय बीता, बड़े आनंद से बीता।”
  • आर्थिक संतोष — पत्र में धन-कमाई की कोई बात ही नहीं है।
  • सामाजिक सद्भाव और पारिवारिक प्रेम — “झगड़े-लड़ाई का नाम नहीं था” से सद्भाव झलकता तो है, पर वाक्य का मुख्य भाव वह नहीं है; ‘वैराग्य’ और ‘भक्ति’ शब्द सीधे आध्यात्मिक अनुभव की ओर ले जाते हैं।
प्र3.
3. “पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल से बढ़कर था” इस वाक्य का सर्वाधिक उपयुक्त निष्कर्ष क्या है? • संतुष्टि में सुख होता है। • सुखी लोग पत्थर पर भोजन करते हैं। • लेखक के पास सोने की थाली नहीं थी। • पत्थर पर रखा भोजन अधिक स्वादिष्ट होता है।
उत्तर

सही उत्तर — संतुष्टि में सुख होता है। इसी के सामने तारा (★) बनाइए।

लेखक तुलना किन दो चीजों की कर रहे हैं, यह पकड़िए —

एक ओर — गंगा तट, पत्थर की थाली, पास आते ठंडे छींटे
दूसरी ओर — सोने की थाल
विजेता — पत्थर वाला भोजन
निष्कर्ष: सुख थाली की कीमत से नहीं, खाने वाले के मन की तृप्ति से बनता है।
क्यों यही निष्कर्ष: ‘सोने की थाल’ यहाँ केवल एक बर्तन नहीं, अमीरी और ठाट का प्रतीक है। लेखक कह रहे हैं कि जिस क्षण मन भरा हुआ था, उस क्षण सबसे सादा प्रबंध भी सबसे बड़े ठाट से आगे निकल गया — यानी सुख का असली स्रोत संतोष है। यही बात पत्र में पंडों के बारे में भी कही गई है — “एक पैसे को लाख करके मान लेते हैं।”
  • “सुखी लोग पत्थर पर भोजन करते हैं” — यह उलटी बात है, ऐसा कोई नियम पत्र नहीं बनाता।
  • “लेखक के पास सोने की थाली नहीं थी” — तुलना बर्तन की उपलब्धता की नहीं, अनुभव की है।
  • “पत्थर पर रखा भोजन अधिक स्वादिष्ट होता है” — स्वाद पत्थर से नहीं, वातावरण और मन से बढ़ा था।
प्र4.
4. “एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पत्थर ही पर जल के अत्यंत निकट परोसकर भोजन किया।” यह प्रसंग किस मूल्य को बढ़ावा देता है? • अंधविश्वास और लालच • मानवता और देशप्रेम • सादगी और आत्मनिर्भरता • स्वच्छता और प्रकृति प्रेम
उत्तर

इस प्रश्न के दो उत्तरों पर तारा (★) बनाया जा सकता है — मुख्य रूप से सादगी और आत्मनिर्भरता, और उसके साथ स्वच्छता और प्रकृति प्रेम

वाक्य का अंशवह कौन-सा मूल्य दिखाता है
“मैंने… रसोई करकेआत्मनिर्भरता — किसी नौकर या दुकान पर निर्भर नहीं, भोजन स्वयं बनाया।
पत्थर ही पर… परोसकर”सादगी — थाली-आसन का आडंबर नहीं, जो सामने था वही मेज भी और थाली भी।
जल के अत्यंत निकट”, “जल के छलके पास ही ठंढे-ठंढे आते थे”प्रकृति-प्रेम — लेखक ने प्रकृति से दूर नहीं, उसके बीच बैठकर खाया।
बाकी दो क्यों नहीं: ‘अंधविश्वास और लालच’ का इस प्रसंग में कोई चिह्न नहीं — न कोई कर्मकांड है, न पाने की इच्छा। ‘मानवता और देशप्रेम’ भारतेंदु के दूसरे लेखन का बड़ा स्वर है, पर इस वाक्य में किसी दूसरे मनुष्य या देश की बात ही नहीं है, केवल लेखक, पत्थर और गंगा हैं।
ध्यान दें: प्रश्न-पत्र में ऐसा प्रश्न आए तो पहले सादगी और आत्मनिर्भरता लिखिए और फिर एक पंक्ति में दूसरा विकल्प जोड़कर कारण दे दीजिए — पुस्तक स्वयं कहती है कि एक से अधिक उत्तर हो सकते हैं।
प्र5.
5. लेखक का हरिद्वार अनुभव मुख्यतः किस प्रकार का था? • राजनीतिक • आध्यात्मिक • सामाजिक • प्राकृतिक
उत्तर

प्रश्न में ‘मुख्यतः’ शब्द है, इसलिए सबसे उपयुक्त उत्तर एक ही है — आध्यात्मिक। इसी के सामने तारा (★) बनाइए।

पत्र की सबसे भारी पंक्तियाँ सब मन की अवस्था की हैं —

  • “जहाँ प्रवेश करने ही से मन शुद्ध हो जाता है”
  • “मेरा तो चित्त वहाँ जाते ही ऐसा प्रसन्न और निर्मल हुआ कि वर्णन के बाहर है”
  • “चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था”
  • “मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ”
प्राकृतिक क्यों नहीं (और आधा क्यों है): पत्र में प्रकृति का वर्णन बहुत है — पर्वत, वल्ली, वृक्ष, पक्षी, हरियाली, गंगा। पर ध्यान दीजिए कि लेखक हर प्राकृतिक दृश्य को अंत में मन की पवित्रता से जोड़ देते हैं — वृक्ष ‘तपस्या’ करते हैं, घास तक ‘पुण्यभूमि’ का प्रमाण बन जाती है। यानी प्रकृति यहाँ साधन है और आध्यात्मिक अनुभव लक्ष्य। इसलिए ‘प्राकृतिक’ पर भी तारा बनाइए तो उसे दूसरे क्रम पर रखिए, और यह कारण लिखिए।

राजनीतिक और सामाजिक उत्तर नहीं बनते — इस पत्र में न शासन की चर्चा है, न समाज-सुधार की। (भारतेंदु की दूसरी रचनाओं में ये स्वर हैं, इस पत्र में नहीं।)

प्र6.
6. पत्र की भाषा का एक मुख्य लक्षण क्या है? • कठिन शब्दों का प्रयोग और बोझिलता • मुहावरों का अधिक प्रयोग • सरलता और चित्रात्मकता • जटिलता और संक्षिप्तता
उत्तर

सही उत्तर — सरलता और चित्रात्मकता। इसी के सामने तारा (★) बनाइए।

चित्रात्मकता का अर्थ है — पढ़ते ही आँखों के सामने चित्र बन जाना। नमूने देखिए —

पंक्तिआँखों के सामने क्या बनता है
“बड़े-बड़े वृक्ष भी ऐसे खड़े हैं मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते हैं”एक पैर पर खड़ा तपस्वी — और उसी मुद्रा में खड़ा पेड़
“मानो चीनी के पने को बरफ में जमाया है”ठंडा-मीठा शरबत, जो जमकर बर्फ बन गया हो
“मानो हरे गलीचा की जात्रियों के विश्राम के हेतु बिछायत बिछी थी”दूर तक बिछा हुआ हरा कालीन
बाकी विकल्प क्यों नहीं: कुछ शब्द आज हमें कठिन लगते हैं (वल्ली, मिष्ट, बधिक, निदान), पर वे उस समय की सामान्य हिंदी थे — भाषा जान-बूझकर बोझिल नहीं बनाई गई। मुहावरे इसमें बहुत कम हैं; इसकी शक्ति मुहावरों में नहीं, उपमाओं में है। और यह पत्र संक्षिप्त भी नहीं — वर्णन खुलकर, विस्तार से किया गया है।
प्र7.
(ख) हो सकता है कि आपके समूह के साथियों ने अलग-अलग उत्तर चुने हों। अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?
उत्तर

यह चर्चा का प्रश्न है — इसका ‘एक’ उत्तर नहीं, चर्चा करने का तरीका होता है। नीचे वह तरीका और एक नमूना चर्चा दी गई है।

चर्चा कैसे कीजिए

  1. हर साथी पहले अपना चुना हुआ विकल्प बताए — बिना कारण
  2. फिर हर कोई पाठ में से एक पंक्ति ढूँढ़कर पढ़े, जो उसके उत्तर को सही ठहराती हो। बिना पंक्ति के तर्क नहीं माना जाएगा — यही इस गतिविधि का नियम रखिए।
  3. जहाँ दो अलग उत्तर हों, वहाँ देखिए कि दोनों की पंक्तियाँ कहीं एक-दूसरे को काट तो नहीं रहीं। अगर नहीं काट रहीं, तो दोनों उत्तर सही हो सकते हैं।
  4. अंत में लिखिए — “हम सहमत हुए कि…” और “हम असहमत रहे क्योंकि…”।

नमूना उत्तर: हमारे समूह में प्रश्न 5 पर मतभेद हुआ। तीन साथियों ने ‘आध्यात्मिक’ चुना और दो ने ‘प्राकृतिक’। ‘आध्यात्मिक’ वालों ने पंक्ति दी — “मेरा तो चित्त वहाँ जाते ही ऐसा प्रसन्न और निर्मल हुआ कि वर्णन के बाहर है।” ‘प्राकृतिक’ वालों ने पंक्ति दी — “यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है।” चर्चा के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि दोनों पंक्तियाँ सच हैं, पर लेखक ने प्रकृति का वर्णन भी अंत में मन की पवित्रता सिद्ध करने के लिए किया है — जैसे “यहाँ की घास भी ऐसी सुगंधमय है” कहकर वे भूमि को ‘पुण्यभूमि’ सिद्ध करते हैं। इसलिए हमने ‘आध्यात्मिक’ को पहला और ‘प्राकृतिक’ को दूसरा उत्तर माना।

Tip: ऐसे प्रश्नों में अंक इस बात के मिलते हैं कि आपने अपने उत्तर के लिए पाठ से प्रमाण दिया या नहीं — केवल “मुझे यही ठीक लगा” लिखने से बात नहीं बनती।
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