मल्हार अध्याय 4 लेखन के अनोखे तरीके

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) ‘हरिद्वार’ पाठ में लेखक ने हरिद्वार के अपने अनुभवों को बहुत ही साहित्यिक और कल्पनाशील भाषा में प्रस्तुत किया है जिसमें कई स्थानों पर उन्होंने तुलनात्मक वाक्यों के माध्यम से दृश्यों का वर्णन किया है। जैसे— हरी-भरी लताओं की तुलना सज्जनों से इस प्रकार की गई है— “पर्वतों पर अनेक प्रकार की वल्ली हरी-भरी सज्जनों के शुभ मनोरथों की भाँति फैलकर लहलहा रही है।” नीचे कुछ तुलनात्मक वाक्य दिए गए हैं। पाठ में ढूँढ़िए कि इन तुलनात्मक वाक्यों को लेखक ने किस प्रकार विशिष्ट तरीके से लिखा है यानी विशिष्टता प्रदान की है? 1. वृक्षों की तुलना साधुओं से की गई है। 2. गंगाजल की मिठास की तुलना चीनी से की गई है। 3. हरियाली की तुलना गलीचे से की गई है। 4. नदी की धारा की तुलना राजा भगीरथ के यश (कीर्ति) से की गई है।
उत्तर

पाठ की मूल पंक्तियाँ ये हैं —

क्रमलेखक की अपनी पंक्तिविशिष्टता कहाँ है
1.“बड़े-बड़े वृक्ष भी ऐसे खड़े हैं मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते हैं और साधुओं की भाँति घाम, ओस और वर्षा अपने ऊपर सहते हैं।”केवल ‘वृक्ष साधु जैसे हैं’ नहीं कहा। पहले मुद्रा दिखाई — एक पैर पर खड़ा तपस्वी — फिर तीन कष्ट गिनाए (घाम, ओस, वर्षा)। इससे तुलना एक पूरा चित्र बन गई।
2.“जल यहाँ का अत्यंत शीतल है और मिष्ट भी वैसा ही है मानो चीनी के पने को बरफ में जमाया है।”यहाँ एक साथ दो गुण पकड़े गए हैं — ठंडक और मिठास। ‘चीनी का पना’ मिठास देता है, ‘बरफ में जमाना’ ठंडक। एक ही कल्पना में दोनों समा गए।
3.“वर्षा के कारण सब ओर हरियाली ही दिखाई पड़ती थी मानो हरे गलीचा की जात्रियों के विश्राम के हेतु बिछायत बिछी थी।”गलीचा केवल सुंदरता के लिए नहीं आया — उसका प्रयोजन भी बताया गया, “जात्रियों के विश्राम के हेतु”। इससे प्रकृति एक मेजबान बन जाती है जो यात्रियों के लिए बिछावन बिछा रही है।
4.“एक ओर त्रिभुवन पावनी श्री गंगा जी की पवित्र धारा बहती है जो राजा भगीरथ के उज्ज्वल कीर्ति की लता-सी दिखाई देती है।”सबसे सूक्ष्म तुलना। धारा दिखाई देती है, कीर्ति दिखाई नहीं देती — फिर भी ‘लता-सी’ जोड़कर लेखक ने दोनों को मिला दिया, क्योंकि दोनों दूर तक फैलती हैं। साथ ही यह कथा भी याद दिला दी कि गंगा को भगीरथ ही लाए थे।
अलंकार पहचानिए: जहाँ ‘की भाँति’, ‘-सी’, ‘जैसा’ आए — वहाँ उपमा है (क्रम 1 का दूसरा भाग, क्रम 4)। जहाँ ‘मानो’ आए और एक चीज को दूसरी होने की कल्पना की जाए — वहाँ उत्प्रेक्षा है (क्रम 1 का पहला भाग, 2 और 3)। और वृक्षों को तपस्या करते हुए दिखाना मानवीकरण है।
सीखने की बात: भारतेंदु की तुलना कभी अकेली नहीं आती — उसके साथ एक ब्योरा जुड़ा रहता है (एक पैर से खड़े, विश्राम के हेतु, उज्ज्वल कीर्ति)। अपनी लिखाई में भी उपमा के साथ एक ब्योरा जोड़ दीजिए; वाक्य तुरंत जीवंत हो जाएगा।
प्र2.
(ख) “मैं उस पुण्य भूमि का वर्णन करता हूँ जहाँ प्रवेश करने ही से मन शुद्ध हो जाता है।” “पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं। एक पैसे को लाख करके मान लेते हैं।” उपर्युक्त पंक्तियों को ध्यान से देखिए, ये आज की हिंदी की तरह नहीं लिखी गई हैं। इसे लेखक ने न केवल अपनी शैली में लिखा है, अपितु इसमें प्राचीन हिंदी भाषा की छवि भी दिखाई देती है। नीचे कुछ पंक्तियाँ दी गई हैं आप इन्हें आज की हिंदी में लिखिए। 1. “इन वृक्षों पर अनेक रंग के पक्षी चहचहाते हैं और नगर के दुष्ट बधिकों से निडर होकर कल्लोल करते हैं।” 2. “वर्षा के कारण सब ओर हरियाली ही दृष्टि पड़ती थी मानो हरे गलीचा की जात्रियों के विश्राम के हेतु बिछायत बिछी थी।” 3. “यह ऐसा निर्मल तीर्थ है कि इच्छा क्रोध की खानि जो मनुष्य हैं सो वहाँ रहते ही नहीं।” 4. “मेरा तो चित्त वहाँ जाते ही ऐसा प्रसन्न और निर्मल हुआ कि वर्णन के बाहर है।” 5. “यहाँ रात्रि को ग्रहण हुआ और हम लोगों ने ग्रहण में बड़े आनंदपूर्वक स्नान किया और दिन में श्री भागवत का पारायण भी किया।” 6. “उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।” 7. “निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।”
उत्तर

आज की हिंदी में ये पंक्तियाँ इस प्रकार लिखी जा सकती हैं —

क्रमआज की हिंदी मेंकौन-सा शब्द बदलना पड़ा
1.इन पेड़ों पर रंग-बिरंगे पक्षी चहचहाते हैं और शहर के क्रूर शिकारियों का डर छोड़कर मस्ती से चहकते-खेलते रहते हैं।वृक्ष → पेड़ · अनेक रंग के → रंग-बिरंगे · नगर → शहर · बधिक → शिकारी · कल्लोल करना → मस्ती करना, खेलना
2.बारिश की वजह से चारों ओर हरियाली ही दिखाई देती थी, मानो यात्रियों के आराम के लिए हरे रंग का कालीन बिछा दिया गया हो।वर्षा → बारिश · दृष्टि पड़ना → दिखाई देना · जात्रियों → यात्रियों · विश्राम के हेतु → आराम के लिए · गलीचा → कालीन · बिछायत → बिछावन/बिछा हुआ
3.यह तीर्थ इतना पवित्र है कि लालच और गुस्से से भरे हुए लोग वहाँ टिक ही नहीं पाते।निर्मल → पवित्र/स्वच्छ · इच्छा → लालच · क्रोध की खानि → गुस्से से भरे हुए · सो → वे
4.वहाँ पहुँचते ही मेरा मन इतना प्रसन्न और शांत हो गया कि उसका वर्णन किया ही नहीं जा सकता।चित्त → मन · निर्मल → शांत/स्वच्छ · वर्णन के बाहर है → वर्णन नहीं किया जा सकता
5.यहाँ रात में ग्रहण लगा और हम सबने ग्रहण के समय बड़े आनंद से स्नान किया तथा दिन में श्रीमद्भागवत का पूरा पाठ भी किया।रात्रि → रात · ग्रहण हुआ → ग्रहण लगा · आनंदपूर्वक → आनंद से · पारायण → आरंभ से अंत तक पूरा पाठ
6.उस समय पत्थर पर बैठकर खाए गए भोजन का सुख सोने की थाली में खाए गए भोजन से कहीं अधिक था।थाल → थाली · बढ़ के था → अधिक था · ‘पत्थर पर का भोजन’ जैसी बनावट को खोलकर लिखना पड़ा
7.मुझे विश्वास है कि आप इस पत्र को अपनी पत्रिका में जगह देंगे (छापेंगे)।निश्चय है → विश्वास है · स्थानदान दीजिएगा → जगह देंगे/प्रकाशित करेंगे
ध्यान देने वाली बात: बदलाव केवल शब्दों का नहीं होता, वाक्य की बनावट का भी होता है। जैसे 6 में ‘पत्थर पर का भोजन का सुख’ में दो बार ‘का’ आया है — आज की हिंदी में इसे ‘पत्थर पर बैठकर खाए गए भोजन का सुख’ लिखना पड़ता है। इसी तरह 3 में ‘जो… सो…’ की पुरानी जोड़ी को हटाकर सीधा वाक्य बनाना पड़ता है।
Check it yourself: अनुवाद करने के बाद अपना वाक्य जोर से पढ़िए। यदि कहीं अटकना पड़े तो वहीं कोई पुरानी बनावट बची रह गई है।
प्र3.
(ग) इस रचना में हरिश्चंद्र जी ने कहीं-कहीं प्राचीन वर्तनी का प्रयोग किया है, जैसे— शिखर के लिए शिषर, यात्रियों के लिए जात्रियों। ऐसे शब्दों की सूची बनाइए। आप इन शब्दों को कैसे लिखते हैं? कक्षा में चर्चा कीजिए।
उत्तर

पाठ में मिलने वाली प्राचीन वर्तनी और आज का रूप —

पाठ में (प्राचीन वर्तनी)आज हम ऐसे लिखते हैंअंतर किस तरह का है
शिषरशिखर‘ख’ के स्थान पर ‘ष’
जात्रियोंयात्रियों‘य’ के स्थान पर ‘ज’
मनोर्थमनोरथ‘र’ के बाद का ‘थ’ जुड़कर संयुक्त-सा लिखा गया
ठंढे-ठंढेठंडे-ठंडे‘ड’ के स्थान पर ‘ढ’
बरफबर्फ‘र’ पर रेफ न लगाकर पूरा ‘र’ लिखना
प्रगटप्रकट‘क’ के स्थान पर ‘ग’
कुशावर्त्तकुशावर्तदोहरा ‘त्त’, आज एक ‘त’
चण्डिकाचंडिकाआधे ‘ण्’ के स्थान पर अनुस्वार (ं)
धारोंधाराओंबहुवचन बनाने का पुराना ढंग
दारचीनीदालचीनी‘ल’ के स्थान पर ‘र’ (पाठ में दोनों रूप मिलते हैं)
साक्षातसाक्षात्अंत का हलंत (्) आज लगाया जाता है
कल्लोलकल्लोल / कलोलवर्तनी वही, पर शब्द आज कम प्रयोग होता है

इनके अलावा कुछ शब्द ऐसे हैं जिनकी वर्तनी नहीं, प्रयोग बदल गया है — वल्ली (लता), मिष्ट (मीठा), बधिक (शिकारी), अर्थी (याचक), निदान (आखिरकार), बिछायत (बिछावन), पना (शरबत), पाट (नदी की चौड़ाई)। इन्हें भी अपनी सूची में अलग खाने में लिखिए।

चर्चा के लिए एक प्रश्न: वर्तनी बदलती क्यों है? क्योंकि भाषा बोलने वालों के साथ चलती है। छपाई के मानक तय होने से पहले हर लेखक जैसा बोलता था वैसा लिखता था — इसीलिए ‘यात्री’ किसी क्षेत्र में ‘जात्री’ बोला जाता था और वैसा ही छप जाता था। आज मानक वर्तनी तय है, इसलिए ऐसा अंतर कम दिखता है।
पुस्तक में ही एक रोचक अंतर देखिए: पाठ के मूल अंश में पंक्ति है — “सब ओर हरियाली ही दिखाई पड़ती थी”, जबकि इसी पंक्ति को अभ्यास में उद्धृत करते समय लिखा गया है — “सब ओर हरियाली ही दृष्टि पड़ती थी”। दोनों का अर्थ एक ही है; ‘दृष्टि पड़ना’ पुराना प्रयोग है।
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