प्र1.
(क) ‘हरिद्वार’ पाठ में लेखक ने हरिद्वार के अपने अनुभवों को बहुत ही साहित्यिक और कल्पनाशील भाषा में प्रस्तुत किया है जिसमें कई स्थानों पर उन्होंने तुलनात्मक वाक्यों के माध्यम से दृश्यों का वर्णन किया है। जैसे— हरी-भरी लताओं की तुलना सज्जनों से इस प्रकार की गई है— “पर्वतों पर अनेक प्रकार की वल्ली हरी-भरी सज्जनों के शुभ मनोरथों की भाँति फैलकर लहलहा रही है।”
नीचे कुछ तुलनात्मक वाक्य दिए गए हैं। पाठ में ढूँढ़िए कि इन तुलनात्मक वाक्यों को लेखक ने किस प्रकार विशिष्ट तरीके से लिखा है यानी विशिष्टता प्रदान की है?
1. वृक्षों की तुलना साधुओं से की गई है।
2. गंगाजल की मिठास की तुलना चीनी से की गई है।
3. हरियाली की तुलना गलीचे से की गई है।
4. नदी की धारा की तुलना राजा भगीरथ के यश (कीर्ति) से की गई है।
उत्तर
पाठ की मूल पंक्तियाँ ये हैं —
| क्रम | लेखक की अपनी पंक्ति | विशिष्टता कहाँ है |
|---|---|---|
| 1. | “बड़े-बड़े वृक्ष भी ऐसे खड़े हैं मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते हैं और साधुओं की भाँति घाम, ओस और वर्षा अपने ऊपर सहते हैं।” | केवल ‘वृक्ष साधु जैसे हैं’ नहीं कहा। पहले मुद्रा दिखाई — एक पैर पर खड़ा तपस्वी — फिर तीन कष्ट गिनाए (घाम, ओस, वर्षा)। इससे तुलना एक पूरा चित्र बन गई। |
| 2. | “जल यहाँ का अत्यंत शीतल है और मिष्ट भी वैसा ही है मानो चीनी के पने को बरफ में जमाया है।” | यहाँ एक साथ दो गुण पकड़े गए हैं — ठंडक और मिठास। ‘चीनी का पना’ मिठास देता है, ‘बरफ में जमाना’ ठंडक। एक ही कल्पना में दोनों समा गए। |
| 3. | “वर्षा के कारण सब ओर हरियाली ही दिखाई पड़ती थी मानो हरे गलीचा की जात्रियों के विश्राम के हेतु बिछायत बिछी थी।” | गलीचा केवल सुंदरता के लिए नहीं आया — उसका प्रयोजन भी बताया गया, “जात्रियों के विश्राम के हेतु”। इससे प्रकृति एक मेजबान बन जाती है जो यात्रियों के लिए बिछावन बिछा रही है। |
| 4. | “एक ओर त्रिभुवन पावनी श्री गंगा जी की पवित्र धारा बहती है जो राजा भगीरथ के उज्ज्वल कीर्ति की लता-सी दिखाई देती है।” | सबसे सूक्ष्म तुलना। धारा दिखाई देती है, कीर्ति दिखाई नहीं देती — फिर भी ‘लता-सी’ जोड़कर लेखक ने दोनों को मिला दिया, क्योंकि दोनों दूर तक फैलती हैं। साथ ही यह कथा भी याद दिला दी कि गंगा को भगीरथ ही लाए थे। |
अलंकार पहचानिए: जहाँ ‘की भाँति’, ‘-सी’, ‘जैसा’ आए — वहाँ उपमा है (क्रम 1 का दूसरा भाग, क्रम 4)। जहाँ ‘मानो’ आए और एक चीज को दूसरी होने की कल्पना की जाए — वहाँ उत्प्रेक्षा है (क्रम 1 का पहला भाग, 2 और 3)। और वृक्षों को तपस्या करते हुए दिखाना मानवीकरण है।
सीखने की बात: भारतेंदु की तुलना कभी अकेली नहीं आती — उसके साथ एक ब्योरा जुड़ा रहता है (एक पैर से खड़े, विश्राम के हेतु, उज्ज्वल कीर्ति)। अपनी लिखाई में भी उपमा के साथ एक ब्योरा जोड़ दीजिए; वाक्य तुरंत जीवंत हो जाएगा।