यह कल्पना का प्रश्न है, पर कल्पना को कहानी से बँधा रहना चाहिए — पोती पाँच-छह बरस की थी, इसलिए वह वकीलों और अदालत की भाषा नहीं बोलेगी। वह वही कहेगी जो एक बच्चा कहता है: सीधी, बिना डरे, और इसीलिए सबसे चुभने वाली बात।
“महाराज, आपके पास इतना बड़ा महल है। उसमें कितने कमरे हैं, आपको गिनने भी नहीं आते होंगे। मेरे पास तो बस एक कमरा था — उसी में मेरी माँ थी, उसी में मेरे बाबा थे। आप कहते हैं कि दूसरी जगह भी घर बन जाएगा। पर घर तो वह होता है जहाँ अपने लोग रहे हों, है न? आपका महल आपसे कोई छीन ले तो क्या आप दूसरी जगह चले जाएँगे? मुझे आपका महल नहीं चाहिए, महाराज। मुझे मेरी झोंपड़ी लौटा दीजिए। मैं आपके अहाते में एक कदम भी नहीं रखूँगी।”