सबसे प्रभावशाली पात्र वृद्धा है — इसलिए नहीं कि वह दुखी है, बल्कि इसलिए कि कहानी में जो एक बड़ा परिवर्तन होता है, वह उसी के कारण होता है।
- उसके पास कुछ नहीं है, फिर भी वह जीतती है। न धन, न घर, न कोई अपना — कहानी उसे ‘गरीब, अनाथ वृद्धा’ कहकर शुरू होती है। सामने ज़मींदार है, जिसके पास महल, नौकर, वकील और अदालत तक है।
- वह हथियार नहीं, विवेक चुनती है। टोकरी माँगने का बहाना, ज़मींदार से ही उसे उठवाना, और फिर एक प्रश्न — “उसका भार आप जन्म-भर कैसे उठा सकेंगे?” इतना ही काफ़ी है।
- वह किसी को नीचा नहीं दिखाती। जीतने के बाद भी वह ताना नहीं मारती। कहानी का अंत उसकी विजय-घोषणा से नहीं, ज़मींदार की क्षमा-याचना से होता है।