मल्हार अध्याय 6 सोच-विचार के लिए

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) आपके विचार से कहानी का सबसे प्रभावशाली पात्र कौन है और क्यों?
उत्तर

सबसे प्रभावशाली पात्र वृद्धा है — इसलिए नहीं कि वह दुखी है, बल्कि इसलिए कि कहानी में जो एक बड़ा परिवर्तन होता है, वह उसी के कारण होता है।

  • उसके पास कुछ नहीं है, फिर भी वह जीतती है। न धन, न घर, न कोई अपना — कहानी उसे ‘गरीब, अनाथ वृद्धा’ कहकर शुरू होती है। सामने ज़मींदार है, जिसके पास महल, नौकर, वकील और अदालत तक है।
  • वह हथियार नहीं, विवेक चुनती है। टोकरी माँगने का बहाना, ज़मींदार से ही उसे उठवाना, और फिर एक प्रश्न — “उसका भार आप जन्म-भर कैसे उठा सकेंगे?” इतना ही काफ़ी है।
  • वह किसी को नीचा नहीं दिखाती। जीतने के बाद भी वह ताना नहीं मारती। कहानी का अंत उसकी विजय-घोषणा से नहीं, ज़मींदार की क्षमा-याचना से होता है।
दूसरा उत्तर भी बनता है: कोई कहे कि सबसे प्रभावशाली पात्र पोती है, तो उसकी बात में दम है। वह पूरी कहानी में एक बार भी मंच पर नहीं आती, सिर्फ़ दादी के मुँह से उसका ज़िक्र आता है — फिर भी हर घटना उसी की ज़िद से चलती है। उसने खाना न छोड़ा होता तो दादी मिट्टी माँगने न जाती, टोकरी न उठती, ज़मींदार न बदलता। जो पात्र दिखता नहीं, वही कहानी चलाता है — यह लेखक की बड़ी कारीगरी है।
तीसरा पक्ष: ज़मींदार को चुनने वाला यह कह सकता है कि कहानी में सबसे ज़्यादा बदलता वही है — घमंडी से लज्जित, लज्जित से पश्चातापी। जो उत्तर आप चुनें, उसके साथ कहानी की एक पंक्ति ज़रूर दीजिए।
प्र2.
(ख) वृद्धा की पोती ने खाना क्यों छोड़ दिया था?
उत्तर

क्योंकि उसे अपने घर से गहरा लगाव था और झोंपड़ी छिन जाने के बाद वह किसी और जगह को अपना घर मान ही नहीं पा रही थी।

“जब से यह झोंपड़ी छूटी है, तब से मेरी पोती ने खाना-पीना छोड़ दिया है। मैंने बहुत कुछ समझाया, पर वह एक नहीं मानती। यही कहा करती है कि अपने घर चल, वहीं रोटी खाऊँगी।”

वह पाँच बरस की उम्र में माँ खो चुकी थी; तब से वही झोंपड़ी उसका सारा संसार थी। घर के साथ उसकी माँ, पिता और दादा की सारी यादें भी जुड़ी थीं। इसलिए घर का छिनना उसके लिए केवल जगह बदलना नहीं था।

इसे विरोध की तरह पढ़िए: एक बच्ची न अदालत जा सकती है, न वकील कर सकती है, न किसी से लड़ सकती है। उसके पास विरोध का बस एक ही तरीका है — जो एक चीज़ उसके अपने बस में है, उसे रोक देना। खाना छोड़ना उसका सत्याग्रह है। और यह काम कर जाता है: उसी ज़िद के कारण दादी ज़मींदार के सामने पहुँचती है, और वहीं से कहानी बदल जाती है।
प्र3.
(ग) ज़मींदार ने झोंपड़ी पर कब्जा कैसे किया?
उत्तर

उसने दो चरणों में कब्ज़ा किया — पहले समझाने-बुझाने से, और जब वह न चला तो पैसे और अदालत के ज़ोर से।

  1. पहले कहा-सुनी — “वृद्धा से बहुतेरा कहा कि अपनी झोंपड़ी हटा ले।” पर वृद्धा नहीं मानी, क्योंकि वह वहाँ कई ज़मानों से बसी थी।
  2. फिर ज़मींदारी चाल — “श्रीमान् के सब प्रयत्न निष्फल हुए, तब वे अपनी ज़मींदारी चाल चलने लगे।”
  3. रिश्वत —बाल की खाल निकालने वाले वकीलों की थैली गरम कर…” यानी बारीक नुक्ताचीनी करने वाले वकीलों को घूस दी।
  4. अदालती आदेश और बेदख़ली — “…उन्होंने अदालत से उस झोंपड़ी पर अपना कब्जा कर लिया और वृद्धा को वहाँ से निकाल दिया।”
दो मुहावरे, पूरा सच: लेखक ने यहाँ अन्याय का लंबा वर्णन नहीं किया — केवल दो मुहावरे रख दिए। ‘बाल की खाल निकालना’ बताता है कि वकीलों ने कानून की बारीकियों से रास्ता निकाला, और ‘थैली गरम करना’ बताता है कि इसके पीछे पैसा था। इन दो मुहावरों से यह साफ़ हो जाता है कि कब्ज़ा कानूनी दिखता था पर न्यायपूर्ण नहीं था। कागज़ पर ज़मींदार जीता, सच में वह हार चुका था।
प्र4.
(घ) “महाराज क्षमा करें तो एक विनती है। ज़मींदार साहब के सिर हिलाने पर उसने कहा…” यहाँ ज़मींदार द्वारा सिर हिलाने की इस क्रिया का क्या अर्थ है?
उत्तर

सिर हिलाना यहाँ मौन स्वीकृति है — यानी ‘ठीक है, कहो’। वृद्धा ने बात कहने की अनुमति माँगी थी, और ज़मींदार ने बिना बोले सिर हिलाकर अनुमति दे दी।

पर लेखक ने ‘हाँ कहा’ क्यों नहीं लिखा: क्योंकि सिर हिलाना और ‘हाँ’ कहना एक बात नहीं है। इस छोटी-सी क्रिया में ज़मींदार का पूरा स्वभाव खुल जाता है —
  • वह उससे बात करना भी ज़रूरी नहीं समझता। अभी-अभी उसने नौकरों से कहा था, “उसे यहाँ से हटा दो” — वृद्धा से नहीं, नौकरों से। वह बुढ़िया से सीधे बोलता ही नहीं।
  • यह रुतबे की भाषा है। बड़े लोग इशारे से काम चलाते हैं; बोलने में समय और सम्मान दोनों खर्च होते हैं।
  • साथ ही, यह पूरा इनकार भी नहीं है। उसने सुनने से मना नहीं किया — यहीं दया की एक बहुत पतली दरार दिखती है, जो आगे चलकर चौड़ी होती जाएगी।
तुलना कीजिए: कहानी के अंत में यही आदमी ‘लज्जित होकर कहने लगे’ और फिर ‘क्षमा माँगी’ — अब वह बोलता है। शुरू में सिर हिलाना, अंत में क्षमा माँगना — इसी दूरी का नाम इस कहानी का कथानक है।
प्र5.
(ङ) “किसी नौकर से न कहकर आप ही स्वयं टोकरी उठाने आगे बढ़े।” यहाँ ज़मींदार के व्यवहार में परिवर्तन का आरंभ दिखाई देता है। पहले ज़मींदार का व्यवहार कैसा था? इस घटना के बाद उसके व्यवहार में क्या परिवर्तन आया?
उत्तर

पहले — ज़मींदार धन और रुतबे के घमंड से भरा था और दूसरों की तकलीफ़ उसे दिखती ही नहीं थी।

  • अहाता बढ़ाने की अपनी इच्छा को उसने एक बुढ़िया की ज़रूरत से बड़ा माना।
  • “श्रीमान् ने उसको देखते ही अपने नौकरों से कहा कि उसे यहाँ से हटा दो” — वह वृद्धा को व्यक्ति नहीं, हटाने की चीज़ समझता था।
  • वकीलों की थैली गरम करके अदालत से कब्ज़ा लेना उसे गलत नहीं लगा।
  • “ज़मींदार साहब पहले तो बहुत नाराज हुए” — विनती पर भी पहली प्रतिक्रिया चिढ़ ही थी।

बाद में — परिवर्तन एक झटके में नहीं, चार सीढ़ियों में आता है:

दया — “उनके भी मन में कुछ दया आ गई।”
श्रम — “किसी नौकर से न कहकर आप ही स्वयं टोकरी उठाने को आगे बढ़े।”
लज्जा — “वह लज्जित होकर कहने लगे कि, ‘नहीं, यह टोकरी हमसे न उठाई जाएगी।’”
बोध और पश्चाताप — “उनकी आँखें खुल गईं। कृतकर्म का पश्चाताप कर उन्होंने वृद्धा से क्षमा माँगी और उसकी झोंपड़ी वापस दे दी।”
‘आप ही स्वयं’ इतना महत्वपूर्ण क्यों है: इस कहानी में ज़मींदार का हर काम अब तक किसी और के हाथों हुआ था — नौकरों के हाथों, वकीलों के हाथों, अदालत के हाथों। जीवन में पहली बार वह अपने हाथ से कुछ उठाने झुकता है। जिस क्षण वह झुकता है, उसका घमंड टूटने लगता है। और जो सबक अपने शरीर से मिलता है, वह किसी उपदेश से नहीं मिलता।
प्र6.
(च) “उन्होंने वृद्धा से क्षमा माँगी और उसकी झोंपड़ी वापस दे दी।” ज़मींदार ने ऐसा क्यों किया?
उत्तर

क्योंकि वृद्धा की बात ने उसे पहली बार अपने काम का असली वज़न महसूस करा दिया।

“ज़मींदार साहब धन-मद से गर्वित हो अपना कर्तव्य भूल गए थे पर वृद्धा के उपर्युक्त वचन सुनते ही उनकी आँखें खुल गईं। कृतकर्म का पश्चाताप कर उन्होंने वृद्धा से क्षमा माँगी और उसकी झोंपड़ी वापस दे दी।”

तीन कारण एक साथ काम करते हैं —

  1. अनुभव — तर्क से नहीं, अपने हाथों की हार से उसे समझ आया कि एक टोकरी मिट्टी भी भारी है।
  2. लज्जा — यह हार नौकरों के सामने हुई। जिस रुतबे के बल पर वह अब तक चल रहा था, वही टूटा।
  3. बोध — ‘आँखें खुल गईं’ मुहावरा है — भ्रम टूटना, सच दिखाई देने लगना। लेखक ने ठीक इसी जगह ‘कर्तव्य’ शब्द रखा है: पश्चाताप तभी होता है जब आदमी को याद आ जाए कि वह क्या करने के लिए बना था।
पश्चाताप अधूरा नहीं छोड़ा गया: ज़मींदार केवल ‘माफ़ कर दो’ कहकर नहीं रुकता — वह झोंपड़ी लौटा देता है। लेखक यहाँ एक ज़रूरी बात कह रहा है: सच्चा पश्चाताप वह है जो नुकसान की भरपाई भी करे। बिना झोंपड़ी लौटाए माँगी गई क्षमा केवल शब्द होती।
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