अन्वेषण अध्याय 1 महत्वपूर्ण प्रश्न

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
हम प्राकृतिक संसाधनों का वर्गीकरण कैसे करते हैं?
उत्तर

किसी मानदंड — अर्थात किसी समान विशेषता — को चुनकर और उसी के आधार पर संसाधनों को समूहों में रखकर। अध्याय दो मानदंडों का प्रयोग करता है, इसलिए वह दो अलग-अलग श्रेणी-समूह देता है।

1. उपयोग के आधार पर (पृष्ठ 4) —

श्रेणीयह अलग समूह क्यों हैअध्याय के उदाहरण
जीवन के लिए आवश्यक संसाधनइनके बिना पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं और हम इन्हें स्वयं बना भी नहीं सकतेवह वायु जिसमें हम श्वास लेते हैं, वह जल जिसे हम पीते हैं, वह मृदा जो हमें भोजन देती है
सामग्री के लिए संसाधनइनसे हम भौतिक वस्तुएँ बनाते हैं — उपयोगिता के लिए भी और सौंदर्य के लिए भीलकड़ी (कुर्सी, प्रतिमा), संगमरमर, कोयला, सोना
ऊर्जा के लिए संसाधनये भवनों, परिवहन और सभी उत्पादन प्रक्रियाओं को चलाते हैंकोयला, जल, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस, सूर्य का प्रकाश, पवन

2. नवीकरणीयता के आधार पर (पृष्ठ 5–8) —

श्रेणीकसौटीउदाहरण
नवीकरणीयप्रकृति इन्हें मानवीय समयावधि के भीतर पुनर्स्थापित और पुनर्जनित कर देती हैसौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, प्रवाहित जल से ऊर्जा, वनों से लकड़ी
अनवीकरणीयलंबी अवधि में बने; जिस अनुपात से हम उपयोग करते हैं उस अनुपात में पुनःपूर्ति नहींकोयला, पेट्रोलियम, लोहा, ताँबा, सोना
प्राकृतिक संसाधन मानदंड 1 : उपयोग मानदंड 2 : नवीकरणीयता जीवन के लिए आवश्यक सामग्री के लिए ऊर्जा के लिए नवीकरणीय अनवीकरणीय एक ही संसाधन दोनों ओर आ सकता है — कोयला ऊर्जा का स्रोत भी है और अनवीकरणीय भी।
दो मानदंड, दो श्रेणी-समूह। कोयला दोनों में आता है, और प्रवाहित जल भी।
वर्गीकरण क्यों करते हैं: अध्याय श्रेणियाँ देने से पहले यही समझाता है। हम कुछ समान विशेषताएँ चुनते हैं, समूह का नामकरण करते हैं, और फिर एक ही शब्द पूरे वर्णन का काम कर देता है। ‘अनवीकरणीय’ कहते ही सुनने वाला जान जाता है कि भंडार सीमित है, तेज़ी से उपयोग करने से वह बढ़ेगा नहीं, और किसी दिन विकल्प खोजना ही होगा — यह सब बार-बार समझाना नहीं पड़ता।
सुझाव: कोई श्रेणी उतनी ही अच्छी है जितना उसका मानदंड। स्वयं से पूछिए कि वर्गीकरण किस प्रश्न का उत्तर देने के लिए है। ‘क्या मैं इसे सदा उपयोग कर सकता हूँ?’ से नवीकरणीय/अनवीकरणीय मिलता है; ‘मुझे इसकी आवश्यकता किसलिए है?’ से उपयोग-आधारित तीन श्रेणियाँ।
प्र2.
जीवन के विभिन्न पक्षों और प्राकृतिक संसाधनों के वितरण के मध्य क्या संबंध है?
उत्तर

प्राकृतिक संसाधन पृथ्वी पर या किसी देश के भीतर भी समान रूप से वितरित नहीं हैं, और मानव जीवन का लगभग हर पक्ष इसी तथ्य के अनुसार ढलता है।

जीवन का पक्षवितरण उसे कैसे आकार देता हैअध्याय का प्रमाण
लोग कहाँ बसते हैंसंसाधन के निकट उद्योग लगते हैं, उद्योगों के आस-पास बस्तियाँ बनती हैं और लोग वहाँ आते हैंपृष्ठ 9 — प्राकृतिक संसाधनों के निकट स्थित उद्योग स्थानीय लोगों के लिए आजीविका के अवसर सृजित करते हैं
जीवन की गुणवत्ताबस्ती के साथ आधुनिक सुविधाएँ आती हैंपृष्ठ 9 — ‘जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने वाली आधुनिक सुविधाएँ सुलभ होती हैं’
विस्थापन और संघर्षवही विकास उन लोगों को उजाड़ता है जो संसाधन के ऊपर बसे हैं; पावन स्थान संकट में पड़ते हैंपृष्ठ 9–10 — संसाधन-संपन्न क्षेत्रों के लोगों को घरों से विस्थापित होना पड़ा; कुछ मामलों में पावन स्थान संकट में हैं, जिससे संघर्ष उत्पन्न होते हैं
व्यापारराष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संसाधनों की भौगोलिक स्थिति पर निर्भर करता है; कच्चे माल में कौशल जुड़ने से विलक्षण उत्पाद बनते हैंपृष्ठ 10 — वूट्ज स्टील; व्यापार ने भारत में बड़े साम्राज्यों के विकास को गति दी
राज्यों और देशों के संबंधप्रकृति राजनैतिक सीमाओं पर ध्यान नहीं देती, इसलिए साझा संसाधन समझौते से ही बाँटा जा सकता हैपृष्ठ 10 — कावेरी जल का कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के मध्य वितरण; इसके लिए आपसी संवाद और कुशल प्रबंधन आवश्यक हुआ
युद्धसंसाधनों पर नियंत्रण युद्धों का कारण रहा है और आज भी हैपृष्ठ 8 — ‘प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण पाने के लिए अनेक युद्ध लड़े गए हैं और आज भी लड़े जा रहे हैं’
समाज के भीतर न्यायसंसाधन उपलब्ध होने पर भी उस तक पहुँच प्रायः असमान होती हैपृष्ठ 18 — नगरों के अनेक क्षेत्रों में पीने के जल की पर्याप्त आपूर्ति नहीं; वायु प्रदूषण उन्हें सर्वाधिक प्रभावित करता है जो स्वयं को बचा नहीं सकते
यह संबंध स्वतः क्यों नहीं बनता: अध्याय यहाँ सावधान है। प्रचुरता समृद्धि की गारंटी नहीं है — यही ‘प्रचुरता का विरोधाभास’ है (पृष्ठ 11)। किसी भंडार को स्थायी लाभ में बदलने का काम मानवीय ज्ञान, सुशासन और रणनीतिक योजना करती है; इनके बिना समृद्ध भंडार भी केवल एक अस्थायी अप्रत्याशित लाभ बनकर रह जाता है।
प्र3.
प्राकृतिक संसाधनों के असंधारणीय उपयोग/अतिशोषण से क्या आशय है?
उत्तर

इसका आशय है संसाधन का ऐसा उपयोग जो पुनर्स्थापन और पुनर्जनन की प्राकृतिक लय को तोड़ दे — अर्थात प्रकृति की भरपाई करने की गति से अधिक तेज़ी से लेना। इससे वह संसाधन, जो अनंत काल तक चल सकता था, नवीकरण करना बंद कर देता है और उस पर निर्भर सब कुछ लड़खड़ाने लगता है।

किसका अतिशोषणपरिणामअध्याय में कहाँ
वनवृक्षों के बढ़ने की गति से अधिक तेज़ी से लकड़ी काटने पर अंततः वन नष्ट हो जाते हैंपृष्ठ 6
जीवाश्म ईंधन + वन-कटाईतापमान वृद्धि; हिमालय के हिमनद इतने शीघ्र पिघल रहे हैं कि वर्षा उनकी पूर्ति नहीं कर पाती; ‘वाटर टावर’ पर निर्भर मैदानी जनसंख्या की जल सुरक्षा संकट मेंपृष्ठ 6
मछली-भंडारव्यवसायीकरण से टूना की संख्या में तीव्र और व्यापक ह्रास; टूना छोटी मछलियों और झींगों को खाकर समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखती है, इसलिए असंतुलन आगे फैलता हैपृष्ठ 6 — इसे अनदेखा न करें
नदियाँ (अपशिष्ट के लिए)जो अपशिष्ट सड़-गलकर किसी जीव का भोजन नहीं बन पाता, वह चक्र में व्यवधान डालता है; नदी विषाक्त हो जाती है और जीवन का पोषण नहीं कर पातीपृष्ठ 7
भूजलदोहन पुनर्भरण से अधिक होने पर कमी बढ़ती जाती है — निष्कर्षण महँगा, फिर असंभव। पंजाब में जल लगभग 30 मीटर की गहराई तक चला गया और लगभग 80% क्षेत्र ‘अति-दोहित’ घोषित हैपृष्ठ 12–14
मृदारासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अनुचित उपयोग से मृदा-क्षरण; पंजाब में वही रसायन भूजल में घुलकर स्वास्थ्य संकट बन गएपृष्ठ 12–13
अनवीकरणीय संसाधनवे समाप्त हो जाते हैं। भारत का कोयला लगभग 50 वर्ष और चल सकता है, जबकि माँग बढ़ती जा रही हैपृष्ठ 8

पृष्ठ 12 के अनुसार, इन विषयों का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि प्राकृतिक संसाधनों के अविवेकपूर्ण दोहन से प्रदूषण, जैव-विविधता की हानि और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं, जो हाल के वर्षों में तीव्रता से घटित हो रही हैं।

हानि लाभ से अधिक समय तक क्यों रहती है: पंजाब इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। हरित क्रांति वास्तव में सफल रही — उसने देश के एक बड़े भाग को भोजन दिया और भारत को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाया। परंतु खाद्य सुरक्षा अल्पावधि के लिए मिली, जबकि दीर्घकालिक परिणामों को ‘ठीक करने में समय और प्रयास लगेगा’। कुछ ऋतुओं में मिला लाभ दशकों की हानि से चुकाया गया।
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