प्र1.
क्या आप ऐसी प्रथाओं के बारे में जानते हैं जो इसे प्रतिबिंबित करती हैं?
उत्तर
हाँ, अनेक। जिन परंपराओं में प्रकृति पालनकर्ता और पोषणकर्ता मानी जाती है, वहाँ यह सम्मान केवल कहा नहीं जाता — वह दैनिक व्यवहार में गुँथा होता है।
| प्रथा | यह क्या दर्शाती है |
|---|---|
| घर में तुलसी-पूजा (आपकी पुस्तक का चित्र 1.6) | परिवार के कल्याण हेतु प्रतिदिन एक पौधे की देखभाल और सम्मान |
| पवित्र उपवन — देवराई, कावु, सरना, ओरण | वन के ऐसे भाग जहाँ कटाई वर्जित है। पृष्ठ 2 पर अध्याय स्वयं इन्हें सांस्कृतिक रूप से अस्वीकार्य दोहन का उदाहरण बताता है — और इसीलिए वे आज भी खड़े हैं |
| सूर्य को अर्घ्य अर्पित करना (चित्र 1.9) | प्रकाश और ऊष्मा के प्रति कृतज्ञतास्वरूप जल का अर्पण |
| नदियों को माता कहना — गंगा, नर्मदा, कावेरी | जिस नदी को माता कहा जाए, उसे नाला बनाना कठिन हो जाता है |
| फसल और पशुओं से जुड़े त्योहार — पोंगल, बिहू, ओणम, बैसाखी, गोवर्धन पूजा, नाग पंचमी | मृदा, सूर्य, गाय-बैल और वर्षा के प्रति ठीक उसी क्षण कृतज्ञता जब उन्होंने दिया है |
| वृक्षों का व्यक्तिगत सम्मान — पीपल, बरगद, नीम को धागा बाँधना और जल देना | जिस वृक्ष का नाम और रक्षक हो, वह प्रायः नहीं काटा जाता |
| सामान्य (हल्की) जुताई (चित्र 1.4) | भूमिगत पारिस्थितिकी तंत्र में न्यूनतम व्यवधान और मृदा की नमी बनी रहना |
ये प्रथाएँ आस्था से आगे क्यों महत्वपूर्ण हैं: देखिए कि हर प्रथा करती क्या है। पवित्र उपवन स्थानीय जैव-विविधता बचाते हैं और भूजल का पुनर्भरण करते हैं। परती दिन और मछली न पकड़ने की ऋतुएँ जनसंख्या को उबरने का अवसर देती हैं। वृक्ष का सम्मान उसे खड़ा रखता है। पृष्ठ 6 पर अध्याय का भी यही तर्क है — समुदाय प्रजनन काल में मछली पकड़ना नियंत्रित करते थे और इसी से मछलियों की संख्या बनी रहती थी। श्रद्धा व्यवहार में ठीक उसी समय संयम बन जाती है जब संयम आवश्यक होता है।
यह कीजिए: घर के किसी बड़े से पूछिए कि आपके यहाँ कौन-सा पौधा, वृक्ष, नदी या पशु विशेष माना जाता है और किस दिन। फिर लिखिए कि वह प्रथा किसकी रक्षा करती है। दो स्तंभ बनाइए — प्रथा, और वह जिसका वह संरक्षण करती है।