प्र1.
आपको क्यों लगता है कि मध्यकाल में ऐसे स्थानों को दुर्गों के निर्माण के लिए चुना गया? इसके पक्ष-विपक्ष पर चर्चा कीजिए। (संकेत — रणनीति, सुरक्षा, भेद्यता इत्यादि विषयों पर विचार करें।)
उत्तर
क्योंकि ऊँचाई और दुर्गम भूमि रक्षक के लिए वही काम करती हैं जो अतिरिक्त सैनिक करते हैं — और यह काम वे स्थायी रूप से, बिना वेतन के करती हैं। कुंभलगढ़ (चित्र 2.10) अध्याय का उदाहरण है: 15वीं शताब्दी में राणा कुंभा द्वारा अरावली की पहाड़ियों में निर्मित, “घने जंगलों और खड़ी पहाड़ियों से घिरा”, और 36 किलोमीटर लंबी विशाल दीवार वाला।
| पक्ष में | विपक्ष में |
|---|---|
| शत्रु पहले दिखता है। ऊँचाई से आती हुई सेना एक दिन पहले दिख जाती है और नीचे के गाँवों को चेतावनी भेजी जा सकती है। | रसद सबसे कमजोर कड़ी है। अन्न और विशेषकर जल भीतर संचित करना या ऊपर ढोना पड़ता है। घेरा डालने वाले को दीवार तोड़ने की आवश्यकता नहीं — केवल प्रतीक्षा करनी है। |
| खड़ी ढलानें सैनिकों को कई गुना कर देती हैं। आक्रमणकारियों को सँकरे मार्गों से एक-एक कर चढ़ना पड़ता है, इसलिए थोड़े रक्षक भी वह द्वार रोक लेते हैं जिसे बड़ी सेना भी एक झटके में नहीं ले सकती। | लंबी दीवार पर बहुत लोग चाहिए। 36 किलोमीटर की प्राचीर पर हर जगह पहरा संभव नहीं; दृढ़ शत्रु टटोलता रहता है जब तक कमजोर भाग न मिल जाए। |
| जंगल छिपाते और धीमा करते हैं। वे रक्षकों की गतिविधि छिपाते हैं और घेरे के भारी साधनों — बाद में तोपों — को ऊपर लाना अत्यंत कठिन बना देते हैं। | यह मुख्य मार्ग से दूर है। जो एकांत दुर्ग की रक्षा करता है, वही उसे उन व्यापार-मार्गों और खेतों से दूर रखता है जहाँ से वास्तव में राजस्व आता है। |
| पत्थर और जलस्रोत वहीं मिलते हैं। पहाड़ी निर्माण-सामग्री देती है और प्राय: झरने भी, इसलिए दुर्ग वहीं बन सकता है। | व्यय बहुत बड़ा है। ऐसा दुर्ग बनाने और उसमें सेना रखने में पीढ़ियों तक धन और जनशक्ति फँसी रहती है। |
| अंतिम शरण। मैदान छिन जाने पर शासक, कोष और परिवारों के लिए एक ठिकाना बना रहता है — इसीलिए कुंभलगढ़ “मेवाड़ के शासकों के लिए एक सुदृढ़ गढ़ के रूप में कार्य करता था”। | यदि यह गिरा तो सब गिरा। शासक, कोष और परिवार एक ही स्थान पर रखने से एक पराजय सर्वनाश बन जाती है — जैसा चित्तौड़गढ़ में हुआ। |
ऐसा क्यों हुआ: मध्यकालीन राज्य आधुनिक राज्य की भाँति सैनिकों की अटूट पंक्ति से सीमा की रक्षा नहीं कर सकता था। वह बिंदुओं की रक्षा करता था — और उनके बीच की भूमि को पार करना महँगा बना देता था। पहाड़ी दुर्ग भूगोल को स्थायी रूप से सेना का अंग बना देता है। यही तर्क बड़े पैमाने पर अरावली में महाराणा प्रताप के लिए और असम के जंगलों-नदियों में अहोमों के लिए काम करता है।
स्वयं जाँचिए: मानचित्र पर अपने निकटतम दुर्ग को खोजिए — ग्वालियर, दौलताबाद, गोलकुंडा, चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, जूनागढ़, या कोई स्थानीय दुर्ग। दो प्रश्न पूछिए: वहाँ के पहरेदार को क्या दिखता था? और उसका जल कहाँ से आता था? इन दो उत्तरों में यह लगभग पूरा समा जाता है कि दुर्ग वहीं क्यों बना।