अन्वेषण अध्याय 2 आइए विचार करें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
क्या आपको लगता है कि उस समय 75 मुखियाओं को एकजुट करना सरल कार्य रहा होगा?
उत्तर

नहीं — और यही कठिनाई इस उपलब्धि को उल्लेखनीय बनाती है। 14वीं शताब्दी में 75 मुखियाओं को एक संघ में लाने के लिए कम से कम चार समस्याएँ सुलझानी पड़तीं, और उनमें से एक भी सैनिक समस्या नहीं थी।

  1. उन तक संदेश पहुँचाना। उस समय संदेश घुड़सवार से तेज नहीं जा सकता था, और वह भी आज के तेलंगाना के जंगल, पहाड़ और नदी वाले क्षेत्र से होकर। 75 मुखियाओं से एक बार परामर्श करने में ही सप्ताह लग जाते, और हर संदेश पकड़ा जा सकता था।
  2. प्रतिद्वंद्वियों को साथ खड़ा करना। प्रत्येक मुखिया के पास अपना क्षेत्र, अपने सशस्त्र लोग और अपना राजस्व था — और प्राय: पड़ोसी मुखिया से कोई पुराना झगड़ा भी। हर एक को यह मानना पड़ा कि तुगलक का संकट पड़ोसी से बड़ा है।
  3. नेतृत्व पर सहमति। संघ को रणभूमि में एक सेनापति चाहिए। इसका अर्थ है कि 74 नेता अपने ही बराबर के एक व्यक्ति के नीचे रहना स्वीकार करें — और योद्धा समाज में इसकी कीमत प्रतिष्ठा से चुकानी पड़ती है, जो घर पर उनके अधिकार का आधार थी।
  4. सब कुछ दाँव पर लगाना। सल्तनत के विरुद्ध संघ में सम्मिलित होने का अर्थ था प्रतिशोध के लिए चिह्नित हो जाना। जो सम्मिलित हो और फिर संघ बिखर जाए, उसे दिल्ली की सेना का सामना अकेले करना पड़ता।
फिर भी यह क्यों संभव हुआ: मुसुनुरी नायक स्वयं तेलुगु मुखिया थे, इसलिए उनके पास दूसरों को बुलाने की प्रतिष्ठा थी; और उन्होंने संघ चरणों में बनाया — पहले संघ ने “छोटे राज्यों” को पराजित किया, और हर सफलता अगले मुखिया को मनाना सरल बनाती गई। विजय से बड़ा कोई निमंत्रण नहीं होता। परिणाम यह हुआ कि उन्होंने दिल्ली सल्तनत की सेनाओं को पराजित किया और 1330–1336 के आस-पास वारंगल से मुहम्मद बिन तुगलक की सेना को खदेड़ दिया।
इसे जोड़कर देखिए: अब 1565 में दूसरे पक्ष के साथ जो हुआ, उससे तुलना कीजिए। दक्कन की पाँच सल्तनतें — बीजापुर, गोलकुंडा, बरार, अहमदनगर और बीदर — सामान्यत: आपस में लड़ती थीं, और विजयनगर काफी हद तक इसीलिए टिका था। जिस क्षण उन्होंने “गठबंधन बनाया”, विजयनगर तालीकोटा में हार गया। इस काल में मिलकर खड़े होने की क्षमता प्राय: किसी भी अकेली सेना के आकार से अधिक मूल्यवान थी।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ