प्र1.
भारत में 1947 में लगभग 14 प्रतिशत व्यक्ति साक्षर थे, जिसमें लगभग 8 प्रतिशत महिलाएँ थीं। कुछ लोगों के अनुसार केवल साक्षर व्यक्तियों को मताधिकार दिया जाना चाहिए। अपने समूह में चर्चा करें कि संविधान-निर्माताओं ने स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही सार्वभौमिक मताधिकार देने का निश्चय क्यों किया।
उत्तर
क्योंकि साक्षरता की कसौटी नए गणतंत्र को सीधे उसी छोटे वर्ग के हाथ सौंप देती जिसे औपनिवेशिक शासन पहले ही विशेषाधिकार दे चुका था — और सौ में से लगभग 86 भारतीय तथा सौ में से 92 महिलाएँ पूरी तरह मूक रह जातीं। संविधान निर्माताओं ने यही देखा था — स्वतंत्रता से पहले लगभग 13 प्रतिशत भारतीयों को ही मत देने का अधिकार था और मताधिकार सार्वभौमिक नहीं था। सार्वभौमिक मताधिकार उसी से जान-बूझकर किया गया विच्छेद था।
उन्होंने जिन कारणों पर विचार किया होगा, बल के क्रम में —
- कम साक्षरता औपनिवेशिक शासन का परिणाम थी, जनता का दोष नहीं। जिस अभाव को औपनिवेशिक राज्य ने उत्पन्न किया, उसी के लिए भारतीयों को दंडित करना दोहरा अन्याय होता।
- निरक्षर होना और निर्णय न कर पाना एक बात नहीं है। किसान जानता है कि नहर की मरम्मत हुई या नहीं, राशन गाँव तक पहुँचा या नहीं, विद्यालय में अध्यापक है या नहीं। मत इसी जानकारी को दर्ज करता है।
- जिन्हें प्रतिनिधित्व की सबसे अधिक आवश्यकता थी, वही बाहर रह जाते। निर्धन, महिलाएँ और पीढ़ियों से शिक्षा से वंचित समुदाय — इन्हीं की समस्याओं को विधायिका में सुना जाना सबसे आवश्यक था।
- कोई भी कसौटी आगे बढ़ाई जा सकती है। एक बार साक्षरता को छलनी मान लिया, तो कोई संपत्ति जोड़ देगा, कोई आय, कोई शिक्षा — और मतदाता-समूह सिकुड़ता चला जाएगा। एक स्पष्ट, सार्वभौमिक नियम यह द्वार बंद कर देता है।
- वैधता। सात में से एक वयस्क द्वारा चुनी गई सरकार यह दावा नहीं कर सकती थी कि वह पूरे राष्ट्र की ओर से बोलती है, और नए संविधान को सबकी स्वीकृति चाहिए थी।
- विश्वास को संस्थापक निर्णय बनाना। अध्याय के आरंभ में उद्धृत अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर ने इसे इस प्रकार कहा — “आम व्यक्ति पर अपार विश्वास प्रकट करते हुए... वयस्क मताधिकार का सिद्धांत स्वीकार किया।”
यह प्रयोग सफल क्यों हुआ: प्रणाली मतदाता को जैसा वह था, वैसा मानकर बनाई गई — किसी आदर्श मतदाता को मानकर नहीं। प्रत्याशियों को चुनाव चिह्न दिए गए, ताकि नाम न पढ़ पाने वाला मतदाता भी दल पहचान सके; मतदान गुप्त रखा गया; मतदान अधिकारी सहायता के लिए उपस्थित रहे। पहले अधिकार दिया गया, फिर उसे प्रयोग-योग्य बनाने के लिए तंत्र खड़ा किया गया — इसका उल्टा नहीं।
क्या आप जानते हैं? भारत ने महिलाओं को भी आरंभ से ही मताधिकार दिया, जबकि अनेक पुराने लोकतंत्रों में ऐसा नहीं था। स्विट्ज़रलैंड में महिलाओं को मत देने का अधिकार 1971 में मिला — भारतीय महिलाओं के मतदान आरंभ करने के बीस वर्ष से भी अधिक बाद।