प्र1.
यहाँ कुछ प्रकार की शिकायतें दी गई हैं जिनका निवारण भारत निर्वाचन आयोग करता है— आपके विचार में ये आचार संहिता के उल्लंघन क्यों हैं?
उत्तर
चारों एक ही मूल नियम तोड़ते हैं — चुनाव मतदाताओं को समझाकर जीता जाना चाहिए, और वह भी हर दूसरे प्रत्याशी के बराबर शर्तों पर। प्रत्येक चित्र इससे बचने का एक अलग तरीका दिखाता है। पृष्ठ 131 के चारों चित्र क्या दिखाते हैं और प्रत्येक उल्लंघन क्यों है —
| चित्र | क्या दिखाता है | यह आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन क्यों है |
|---|---|---|
| चित्र 5.17 | एक प्रत्याशी द्वारा महिला मतदाताओं को साड़ियाँ और घरेलू उपकरण बाँटे गए | यह उपहार देकर मत खरीदना है। संहिता स्पष्ट कहती है — “मतदाताओं को वोट के बदले उपहार देकर प्रभावित करना दंडनीय है।” यह प्रत्याशियों के बीच समानता भी समाप्त कर देता है — धनी प्रत्याशी ईमानदार प्रत्याशी से अधिक खर्च कर सकता है |
| चित्र 5.18 | एक दल के प्रत्याशी द्वारा विपक्षी दल के प्रत्याशी के विरुद्ध आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग | संहिता के अनुसार सभी प्रत्याशियों से अपेक्षा है कि वे “विवेक और संयम का परिचय दें, ताकि निर्वाचन शांतिपूर्वक संपन्न हो”। अपशब्द समर्थकों को भड़का सकते हैं और विचारों की प्रतिस्पर्धा को झगड़े — या हिंसा — में बदल सकते हैं |
| चित्र 5.19 | सरकारी अधिकारी सत्ता दल के लिए प्रचार करते हुए | सरकारी कर्मचारियों को वेतन जनता देती है और उन्हें प्रत्येक नागरिक की सेवा करनी है। संहिता का पहला तत्व यही है कि सरकार में रहते हुए दल सरकार द्वारा उपलब्ध संसाधनों का उपयोग चुनावी लाभ के लिए न करे — और अधिकारी उन संसाधनों में सबसे प्रभावी हैं |
| चित्र 5.20 | निरीक्षण के समय एक प्रत्याशी की कार से 500 रुपये के नोटों की गड्डियाँ मिलीं | चुनाव के समय बड़ी मात्रा में बेहिसाब नकदी मत खरीदने या अघोषित चुनावी व्यय की ओर संकेत करती है — यही वह बात है जिसे अध्याय आगे चुनावों में धन का बढ़ता प्रभाव कहता है। प्रत्याशियों के व्यय पर कड़ी चौकसी टी.एन. शेषन के सुधारों में से एक थी |
चारों में समान सिद्धांत: मत का उद्देश्य यह दर्ज करना है कि मतदाता ने क्या उचित समझा। उपहार निर्णय के स्थान पर एहसान रख देता है; अपशब्द उसके स्थान पर क्रोध; प्रचार करता सरकारी अधिकारी उसके स्थान पर सरकारी कृपा का भय या आशा; और बेहिसाब धन तीनों को खरीद लेता है। हर स्थिति में गणना तो होगी, पर वह यह नहीं मापेगी कि जनता क्या सोचती है — और चुनाव का पूरा प्रयोजन ही समाप्त हो जाएगा।
क्या आप जानते हैं? आदर्श आचार संहिता का आरंभ एक स्वैच्छिक सहमति के रूप में हुआ — इसे 1960 में केरल में अपनाया गया, जिसे उस समय के प्रमुख राजनैतिक दलों के प्रतिनिधियों ने स्वेच्छा से स्वीकार किया। आयोग ने इसे 1962 के आम चुनाव के दौरान दलों के बीच प्रसारित किया, और 1991 से आयोग इसका अनुपालन सुनिश्चित करने में सक्रिय भूमिका निभाने लगा। इस प्रकार स्वयं पर लगाए गए शिष्टाचार राष्ट्रीय स्तर पर लागू अनुशासन बन गए।