यह रही वही सारणी, जिसमें एक स्तंभ जोड़ दिया गया है ताकि प्रवृत्ति स्पष्ट दिखे।
| लोकसभा की अवधि | सत्रों की संख्या | बैठकों की संख्या | प्रति सत्र औसत बैठकें |
|---|---|---|---|
| पहली लोकसभा (1952–1957) | 14 | 677 | 677 ÷ 14 ≈ 48 |
| दूसरी लोकसभा (1957–1962) | 16 | 567 | 567 ÷ 16 ≈ 35 |
| दसवीं लोकसभा (1991–1996) | 16 | 423 | 423 ÷ 16 ≈ 26 |
| तेरहवीं लोकसभा (1999–2004) | 14 | 356 | 356 ÷ 14 ≈ 25 |
आँकड़ों से तीन निष्कर्ष निकलते हैं।
- सत्रों की संख्या लगभग अपरिवर्तित रही — पचास वर्षों में 14 से 16 के बीच। संसद आज भी वर्ष में लगभग तीन बार बैठती है, जैसा अध्याय बताता है : बजट, मानसून और शीतकालीन सत्र। अर्थात संसदीय वर्ष का ढाँचा वही रहा।
- किंतु बैठकों की संख्या तेजी से घटी है। पहली लोकसभा की 677 बैठकों से तेरहवीं लोकसभा की 356 — अर्थात 321 बैठकों की कमी, जो लगभग आधी है (356, 677 का लगभग 53% है)। यह गिरावट लगातार है, कोई एक बार की घटना नहीं : 677 → 567 → 423 → 356।
- इसलिए हर सत्र बहुत छोटा हो गया। एक सत्र की औसत लंबाई लगभग 48 बैठकों से घटकर लगभग 25 रह गई — लगभग आधी। चूँकि एक बैठक सामान्यतः 6 घंटे चलती है, पहली लोकसभा लगभग 677 × 6 ≈ 4,060 घंटे बैठी, जबकि तेरहवीं लगभग 356 × 6 ≈ 2,140 घंटे।
- लोकसभा और राज्यसभा की वेबसाइट (sansad.in) पर ‘सत्र’ या ‘सांख्यिकीय जानकारी’ वाले पृष्ठों में प्रत्येक लोकसभा के सत्र और बैठकें दी गई हैं।
- चौदहवीं से अठारहवीं लोकसभा तक के लिए यही चार स्तंभ बनाइए।
- फिर एक साधारण दंड-आलेख बनाइए जिसमें क्षैतिज अक्ष पर लोकसभा और ऊर्ध्वाधर अक्ष पर बैठकों की संख्या हो। चित्र प्रवृत्ति को अकाट्य बना देता है — और यह भी दिखा देता है कि गिरावट जारी रही, थम गई, या पलट गई।