अन्वेषण अध्याय 6 इसे अनदेखा न करें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
भारतीय संविधान का भाग V, अध्याय I— ‘कार्यपालिका’ से आरंभ होता है। इसमें राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद सहित अन्य की भूमिकाओं और उत्तरदायित्वों का वर्णन है। अध्याय II में संसद की भूमिका और कार्यों का उल्लेख है। आपके विचार में ऐसा क्यों किया होगा?
उत्तर

दो स्पष्टीकरण संभव हैं, और वे परस्पर विरोधी नहीं हैं।

1. संविधान पहले पद बनाता है, फिर वह निकाय जिसका वह पद अंग है। अध्याय I राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद का सृजन करता है। किंतु अध्याय II में वर्णित संसद में राष्ट्रपति स्वयं सम्मिलित हैं — “भारत की संसद… राष्ट्रपति, लोकसभा और राज्यसभा से मिलकर बनती है।” जब तक राष्ट्रपति का पद ही न बना हो, संसद का वर्णन नहीं किया जा सकता। इसलिए यह क्रम तार्किक है, कोई श्रेष्ठता-क्रम नहीं : पहले पद परिभाषित कीजिए, फिर वह सभा जिसका वह पद अंग है।

2. यह क्रम दोनों अंगों के वास्तविक संबंध को दर्शाता है। हमारी व्यवस्था में कार्यपालिका संसद से बाहर नहीं है — मंत्रिपरिषद दोनों सदनों के सांसदों में से बनती है, अधिकांश विधेयक कार्यपालिका प्रस्तुत करती है, और राष्ट्रपति ही संसद का सत्र बुलाते हैं तथा विधेयकों को स्वीकृति देते हैं। कार्यपालिका को पहले रखना यह दिखाता है कि दोनों कितनी गहराई से गुँथे हुए हैं — और यही संसदीय प्रणाली को राष्ट्रपति-प्रणाली से अलग करता है।

इस क्रम का अर्थ यह नहीं है कि कार्यपालिका श्रेष्ठ है। दोनों अध्यायों को साथ पढ़िए तो उत्तरदायित्व उल्टी दिशा में चलता है — मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है, संसद सभी सरकारी व्यय को स्वीकृति देती है, और मंत्रियों को प्रश्नकाल में अपने कार्यों का औचित्य सिद्ध करना पड़ता है। पाठ में स्थान और शक्ति के क्रम में स्थान — दोनों एक बात नहीं हैं।
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