वे दो वर्ष जीवन भर हर नौकरी के आवेदन में उसका पीछा करेंगे। विद्यालय छूटने का अर्थ केवल कम जानना नहीं है; इसका अर्थ है कि शिक्षा और प्रशिक्षण जिस मानव पूँजी का निर्माण करने वाले थे, वह बनी ही नहीं — और उस पर टिकी हर बात कठिन हो जाती है।
| वह क्या खोता है | उसका परिणाम |
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| बुनियादी अधिगम | कक्षा 8 के आस-पास ही पढ़ना, गणना और तर्क अन्य विषयों के औजार बनते हैं। इनका छूटना दो वर्ष के ज्ञान की हानि नहीं, अपितु आगे के वर्षों को असीखने योग्य बना देना है, क्योंकि हर वर्ष पिछले वर्ष पर टिका होता है |
| प्रमाणपत्र और पात्रता | अधिकांश प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों के लिए विद्यालयी प्रमाणपत्र चाहिए। स्वयं (SWAYAM) के निःशुल्क पाठ्यक्रम भी कक्षा 9 और उससे आगे के लिए बने हैं। प्रमाणपत्र के बिना कौशल के द्वार बंद रह जाते हैं |
| कौशल, और इसलिए आय | वह प्रायः अकुशल कार्य तक सीमित रह जाएगा — दैनिक मजदूरी, सहायक का काम — जो कम वेतन देता है, असुरक्षित है और जिसमें प्रशिक्षण भी कम मिलता है |
| मोल-भाव की शक्ति और सुरक्षा | जो श्रमिक अनुबंध या सुरक्षा-सूचना नहीं पढ़ सकता, उसे कम पारिश्रमिक देना सरल है और दुर्घटना की संभावना अधिक |
| अगली पीढ़ी | कम आय के कारण संभावना बढ़ जाती है कि अगली बार संकट आने पर उसके अपने बच्चे भी विद्यालय छोड़ें। इस प्रकार एक नौकरी का जाना एक चक्र बन जाता है |
और यह हानि केवल उसकी नहीं है। अध्याय कहता है कि भारत का जनांकिकीय लाभांश इस बात पर निर्भर है कि व्यक्तियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशिक्षण एवं कौशल प्रशिक्षण तक पहुँच मिले। प्रत्येक ड्रॉपआउट उस लाभांश में से घटा हुआ एक युवा है — और भारत को इसे लाखों से गुणा करना पड़ता है।