प्र1.
पृष्ठे 158 स्थितस्य वर्ण-चक्रस्य अनुसारं — कस्मिन् स्थाने के वर्णाः उत्पद्यन्ते तथा तत्र किं करणं भवति ?
उत्तर
पुस्तक का अन्तिम चित्र ‘आस्यस्य अभ्यन्तरे षट् स्थानानि, षट् करणानि च’ पूरे पाठ को एक ही चक्र में समेट देता है। बाहरी अर्ध-वृत्त में षट् स्थानानि हैं, भीतरी अर्ध-वृत्त में षट् करणानि, और बीच के छल्लों में उन स्थानों से निकलने वाले वर्ण।
| स्थानम् | वर्ग-नाम | तत्र उत्पद्यमानाः वर्णाः (चक्रानुसारम्) | करणम् |
|---|---|---|---|
| १. कण्ठः | कण्ठ्याः | अ आ आ३ · क् ख् ग् घ् ङ् · ह् · विसर्गः ः | स्व-स्थानं करणम् |
| २. तालु | तालव्याः | इ ई ई३ · च् छ् ज् झ् ञ् · य् · श् | जिह्वा-मध्यः |
| ३. मूर्धा | मूर्धन्याः | ऋ ॠ ऋ३ · ट् ठ् ड् ढ् ण् · र् · ष् | जिह्वा-उपाग्रः |
| ४. दन्तः | दन्त्याः | ऌ ॡ३ · त् थ् द् ध् न् · ल् · स् | जिह्वा-अग्रः |
| ५. ओष्ठः | ओष्ठ्याः | उ ऊ ऊ३ · प् फ् ब् भ् म् · व् (दन्त्योष्ठ्यः) | ओष्ठः (अधरोष्ठः) |
| ६. नासिका | नासिक्याः | ङ् ञ् ण् न् म् · अनुस्वारः ं | स्व-स्थानं करणम् |
चक्र पढ़ने का तरीका: सबसे बाहरी छल्ला स्वर देता है, उसके भीतर वर्गीय व्यञ्जन (स्पर्श), फिर अन्तःस्थ (य् र् ल् व्), फिर ऊष्म (श् ष् स् ह्), और सबसे भीतर अयोगवाह (अनुस्वार ं, विसर्ग ः)। नीचे की पट्टी में यही क्रम लिखा है — समानाक्षराणि · सन्ध्यक्षराणि · स्पर्शाः · अन्तःस्थाः · ऊष्माणः · अयोगवाहौ, और उन पर दो शीर्षक — स्वराः तथा व्यञ्जनानि।
ङ् ञ् ण् न् म् दो बार क्यों? क्योंकि इनका स्थान दो हैं — ङ् कण्ठ्य भी है और नासिक्य भी; ञ् तालव्य भी और नासिक्य भी; इसी प्रकार ण्, न्, म्। इनके उच्चारण में वायु मुख के अपने वर्ग-स्थान पर रुकती है और साथ ही नाक से भी निकलती है — इसीलिए चक्र में ये दोनों जगह दिखाए गए हैं।