दीपकम् अध्याय 13 आस्यस्य अभ्यन्तरे षट् स्थानानि, षट् करणानि च (वर्ण-चक्रम्)

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
पृष्ठे 158 स्थितस्य वर्ण-चक्रस्य अनुसारं — कस्मिन् स्थाने के वर्णाः उत्पद्यन्ते तथा तत्र किं करणं भवति ?
उत्तर

पुस्तक का अन्तिम चित्र ‘आस्यस्य अभ्यन्तरे षट् स्थानानि, षट् करणानि च’ पूरे पाठ को एक ही चक्र में समेट देता है। बाहरी अर्ध-वृत्त में षट् स्थानानि हैं, भीतरी अर्ध-वृत्त में षट् करणानि, और बीच के छल्लों में उन स्थानों से निकलने वाले वर्ण

स्थानम्वर्ग-नामतत्र उत्पद्यमानाः वर्णाः (चक्रानुसारम्)करणम्
१. कण्ठःकण्ठ्याःअ आ आ३ · क् ख् ग् घ् ङ् · ह् · विसर्गः स्व-स्थानं करणम्
२. तालुतालव्याःइ ई ई३ · च् छ् ज् झ् ञ् · य् · श्जिह्वा-मध्यः
३. मूर्धामूर्धन्याःऋ ॠ ऋ३ · ट् ठ् ड् ढ् ण् · र् · ष्जिह्वा-उपाग्रः
४. दन्तःदन्त्याःऌ ॡ३ · त् थ् द् ध् न् · ल् · स्जिह्वा-अग्रः
५. ओष्ठःओष्ठ्याःउ ऊ ऊ३ · प् फ् ब् भ् म् · व् (दन्त्योष्ठ्यः)ओष्ठः (अधरोष्ठः)
६. नासिकानासिक्याःङ् ञ् ण् न् म् · अनुस्वारः स्व-स्थानं करणम्
चक्र पढ़ने का तरीका: सबसे बाहरी छल्ला स्वर देता है, उसके भीतर वर्गीय व्यञ्जन (स्पर्श), फिर अन्तःस्थ (य् र् ल् व्), फिर ऊष्म (श् ष् स् ह्), और सबसे भीतर अयोगवाह (अनुस्वार ं, विसर्ग ः)। नीचे की पट्टी में यही क्रम लिखा है — समानाक्षराणि · सन्ध्यक्षराणि · स्पर्शाः · अन्तःस्थाः · ऊष्माणः · अयोगवाहौ, और उन पर दो शीर्षक — स्वराः तथा व्यञ्जनानि
ङ् ञ् ण् न् म् दो बार क्यों? क्योंकि इनका स्थान दो हैं — ङ् कण्ठ्य भी है और नासिक्य भी; ञ् तालव्य भी और नासिक्य भी; इसी प्रकार ण्, न्, म्। इनके उच्चारण में वायु मुख के अपने वर्ग-स्थान पर रुकती है और साथ ही नाक से भी निकलती है — इसीलिए चक्र में ये दोनों जगह दिखाए गए हैं।
प्र2.
कण्ठ-तालव्यः, कण्ठौष्ठ्यः, दन्त्योष्ठ्यः — एते के वर्णाः ? एतेषां स्थानं कति ?
उत्तर

उत्तरम् — एते ते वर्णाः, येषाम् उच्चारणे एकं न, अपितु द्वे स्थाने कार्यं कुरुतः। (ये वे वर्ण हैं जिनके उच्चारण में एक नहीं, बल्कि दो स्थान काम करते हैं।) पारिभाषिक-शब्दार्थ-सारणी में पुस्तक इन तीनों को अलग से गिनाती है —

पारिभाषिकः शब्दःअर्थः (पुस्तकानुसारम्)वर्णाःEnglish
कण्ठ-तालव्यःकण्ठ-तालु-स्थानयोः उत्पन्नः वर्णःए, ऐ, ऐ३Velar-palatal / Palato-velar
कण्ठौष्ठ्यःकण्ठ-ओष्ठ-स्थानयोः उत्पन्नः वर्णःओ, औ, औ३Velar-labial / Labio-velar
दन्त्योष्ठ्यःदन्त-ओष्ठ-स्थानयोः उत्पन्नः वर्णःव्Dento-labial / Labio-dental
क्यों दो स्थान: वस्तुतः ‘अ + इ’ का सन्धि-स्वर (सन्ध्यक्षरम्) है — ‘अ’ कण्ठ्य है और ‘इ’ तालव्य, इसलिए ‘ए’ कण्ठ-तालव्य हुआ। इसी तरह = ‘अ + उ’, जहाँ ‘उ’ ओष्ठ्य है — अतः ‘ओ’ कण्ठौष्ठ्य। और व् बोलते समय नीचे का होंठ ऊपर के दाँतों से लगता है — दो अङ्ग, दो स्थान, इसलिए दन्त्योष्ठ्य। पृष्ठ 158 के चक्र में भी ‘ए ऐ३’ कण्ठ और तालु के बीच, ‘ओ औ३’ कण्ठ और ओष्ठ के बीच तथा ‘व्’ दन्त और ओष्ठ के बीच रखे गए हैं।
स्वयं परखिए: ‘अ’ लम्बा खींचकर धीरे-धीरे ‘इ’ की ओर जाइए — बीच में जो ध्वनि बनती है वही ‘’ है। यही अभ्यास ‘अ’ से ‘उ’ की ओर कीजिए — ‘’ मिलेगा।
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