दीपकम् अध्याय 13 योग्यताविस्तरः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
‘करण-प्रकरणम्’ किमर्थम् अत्र दीयते ? षष्ठ-कक्षायाः ‘स्थान-प्रकरणेन’ सह अस्य कः सम्बन्धः ?
उत्तर

पुस्तकस्य वाक्यम् — षष्ठ-कक्षायां ‘स्थान-प्रकरणस्य’ सूत्राणि दृष्टवन्तः। अधुना ‘करण-प्रकरणस्य’ सूत्राणि — (छठी कक्षा में हमने ‘स्थान-प्रकरण’ के सूत्र देखे थे; अब ‘करण-प्रकरण’ के सूत्र देखते हैं।)

क्रम इस प्रकार बनता है: पाणिनीय-शिक्षा वेदाङ्ग ‘शिक्षा’ का प्रसिद्ध ग्रन्थ है। उसमें वर्णोच्चारण के तीनों तत्त्व क्रम से आते हैं — पहले स्थान (कक्षा ६ में पढ़ा), फिर करण (यहाँ, कक्षा ८ में), और फिर प्रयत्न (अगली कक्षा में)। इसीलिए इस पाठ में जो कुछ चित्रों और पेटिकाओं से समझाया गया, वही योग्यताविस्तर में मूल सूत्र-रूप में दिया गया है — ताकि विद्यार्थी परिभाषा और शास्त्र-वाक्य दोनों को जोड़कर देख सके।
पूरा सूत्र-समूह एक साथ: ‘करणम् अपि।’ · ‘तालव्य-मूर्धन्य-दन्त्यानां — जिह्वा करणम्।’ · ‘जिह्वामध्येन — तालव्यानाम्।’ · ‘जिह्वोपाग्रेण — मूर्धन्यानाम्।’ · ‘जिह्वाग्रेण — दन्त्यानाम्।’ · ‘शेषाः — स्वस्थानकरणाः।’ · ‘इत्येतत् करणम्।’ — नीचे प्रत्येक का अर्थ अलग-अलग दिया गया है।
प्र2.
सूत्रम् — ‘करणम् अपि।’ अस्य अर्थः कः ?
उत्तर

अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — अधुना (वर्णोच्चारणस्य) ‘करणं’ जानीमः। (अब हम वर्णोच्चारण का ‘करण’ जानते हैं।)

‘अपि’ क्यों: ‘अपि’ = भी। स्थान-प्रकरण समाप्त हो चुका; अब करण भी जानना है — यह सूत्र प्रकरण का आरम्भ-सूचक है। शास्त्र-ग्रन्थों में ऐसा छोटा सूत्र नए प्रकरण का द्वार खोलता है, जैसे व्याकरण में ‘अथ शब्दानुशासनम्’।
प्र3.
सूत्रम् — ‘तालव्य-मूर्धन्य-दन्त्यानां — जिह्वा करणम्।’ अस्य अर्थः कः ?
उत्तर

अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — तालव्यानां मूर्धन्यानां दन्त्यानां च वर्णानाम् उच्चारणे → ‘जिह्वा’ करणं भवति। (तालव्य, मूर्धन्य और दन्त्य वर्णों के उच्चारण में करण जीभ होती है।)

यह सामान्य नियम है: यह सूत्र तीनों वर्गों का सामान्य करण एक साथ बता देता है। आगे के तीन सूत्र बताएँगे कि उसी जीभ का कौन-सा भाग किस वर्ग के लिए काम करता है — अर्थात् विशेष करण। अभ्यास का प्रश्न २ (ङ) इसी सूत्र पर आधारित है।
व्याकरण: ‘तालव्य-मूर्धन्य-दन्त्यानाम्’ षष्ठी विभक्ति, बहुवचन — ‘तालव्य, मूर्धन्य तथा दन्त्य वर्णों का’। ‘जिह्वा’ प्रथमा एकवचन, स्त्रीलिङ्ग और ‘करणम्’ प्रथमा एकवचन, नपुंसकलिङ्ग — यह विधेय है, अतः लिङ्ग-भेद होते हुए भी वाक्य शुद्ध है।
प्र4.
सूत्रम् — ‘जिह्वामध्येन — तालव्यानाम्।’ अस्य अर्थः कः ?
उत्तर

अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — तालव्य-वर्णानाम् उच्चारणे → जिह्वायाः ‘मध्य-भागः’ करणं भवति। (तालव्य वर्णों के उच्चारण में जीभ का मध्य भाग करण होता है।)

कौन-से वर्ण: तालव्य वर्ण हैं — इ ई · ए ऐ · च् छ् ज् झ् ञ् · य् · श्। इन सबमें जीभ का बीच वाला भाग ऊपर उठकर तालु के पास जाता है। ‘च’ और ‘श’ बोलकर देखिए — दोनों में जीभ का मध्य ही काम करता है।
व्याकरण: ‘जिह्वामध्येन’ तृतीया विभक्ति, एकवचन — ‘जीभ के मध्य भाग से’। करण-कारक में तृतीया आती है (‘करणे तृतीया’) — और यहाँ विषय ही ‘करण’ है, इसलिए तृतीया विभक्ति का प्रयोग विशेष रूप से सार्थक है।
प्र5.
सूत्रम् — ‘जिह्वोपाग्रेण — मूर्धन्यानाम्।’ अस्य अर्थः कः ?
उत्तर

अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — मूर्धन्य-वर्णानाम् उच्चारणे → जिह्वायाः ‘उपाग्र-भागः’ करणं भवति। (मूर्धन्य वर्णों के उच्चारण में जीभ का उपाग्र भाग करण होता है।)

‘उपाग्रः’ किसे कहते हैं: पारिभाषिक सारणी की परिभाषा है — ‘जिह्वाग्रात् किञ्चित् पूर्वभागः’ अर्थात् जीभ की नोक से थोड़ा पीछे का भाग (Near Tip of Tongue)। मूर्धन्य वर्ण हैं — ऋ ॠ · ट् ठ् ड् ढ् ण् · र् · ष्। ‘ट’ बोलिए — जीभ ज़रा मुड़कर उपाग्र से मूर्धा को छूती है; इसीलिए अंग्रेज़ी में इन्हें Retroflex (मुड़े हुए) कहा जाता है।
सन्धि देखिए: ‘जिह्वा + उपाग्रेण’ में गुण-सन्धि से ‘आ + उ = ओ’ हुआ, अतः रूप बना ‘जिह्वोपाग्रेण’।
प्र6.
सूत्रम् — ‘जिह्वाग्रेण — दन्त्यानाम्।’ अस्य अर्थः कः ?
उत्तर

अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — दन्त्य-वर्णानाम् उच्चारणे → जिह्वायाः ‘अग्र-भागः’ करणं भवति। (दन्त्य वर्णों के उच्चारण में जीभ का अग्र भाग — नोक — करण होता है।)

कौन-से वर्ण: दन्त्य वर्ण हैं — ऌ · त् थ् द् ध् न् · ल् · स्। इनमें जीभ की नोक सीधे दाँतों के मूल से लगती है। ‘त’ और ‘ट’ को बारी-बारी बोलिए — अन्तर साफ़ दिखेगा : ‘त’ में नोक दाँतों पर, ‘ट’ में उपाग्र मूर्धा पर।
तीनों सूत्र एक साथ याद कीजिए: जीभ की नोक → दन्त्य, नोक से ज़रा पीछे → मूर्धन्य, मध्य → तालव्य। जैसे-जैसे करण पीछे हटता है, स्थान भी पीछे हटता जाता है (दन्तः → मूर्धा → तालु)।
प्र7.
सूत्रम् — ‘शेषाः — स्वस्थानकरणाः।’ अस्य अर्थः कः ? ‘शेषाः’ इति के ?
उत्तर

अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — शेषाणां (कण्ठ्य-ओष्ठ्य-नासिक्यानां) वर्णानाम् उच्चारणे → ‘स्वस्थानं’ (स्वस्य स्थानस्य कश्चिद् भागविशेषः) एव → करणं भवति।

(शेष वर्णों के — अर्थात् कण्ठ्य, ओष्ठ्य तथा नासिक्य वर्णों के — उच्चारण में उनका अपना स्थान ही, ठीक-ठीक कहें तो उसी स्थान का कोई विशेष भाग, करण बन जाता है।)

‘शेषाः’ कौन: छह स्थानों में से तीन (तालु, मूर्धा, दन्तः) पिछले सूत्रों में आ चुके; जो बचे — कण्ठः, ओष्ठः, नासिका — वे ही ‘शेषाः’ हैं। सूत्र-शैली की यह खूबी है — जो पहले कह दिया गया उसे दुहराया नहीं जाता, बाकी को ‘शेष’ कहकर एक ही शब्द में समेट लिया जाता है।
जोड़कर देखिए: पुस्तक का पेटिका-वाक्य (पृष्ठ 151) — ‘कण्ठः, ओष्ठः, नासिका च — एतेषु त्रिषु स्थानेषु → स्व-स्थानम् एव करणं भवति।’ और पारिभाषिक परिभाषा — ‘स्वस्थानकरणः = निजस्थानस्य पर-भागः एव करणं यस्य वर्णस्य।’ तीनों वाक्य एक ही बात कहते हैं।
प्र8.
सूत्रम् — ‘इत्येतत् करणम्।’ अस्य अर्थः कः ?
उत्तर

अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — अत्र पर्यन्तम् एतत् उच्चारणस्य ‘करणं’ चर्चितम्। (यहाँ तक उच्चारण के ‘करण’ की चर्चा हुई।)

यह उपसंहार-सूत्र है: जैसे ‘करणम् अपि।’ प्रकरण खोलता है, वैसे ही ‘इत्येतत् करणम्।’ उसे बन्द करता है। बीच के पाँच सूत्रों में करण का पूरा नियम आ गया — पहले सामान्य (जिह्वा), फिर तीन विशेष (मध्य, उपाग्र, अग्र), और अन्त में शेष (स्वस्थान)। अगला प्रकरण ‘प्रयत्न’ का होगा, जो अगली कक्षा में पढ़ाया जाएगा।
पाठ का समापन: यही इस पाठ का और दीपकम् कक्षा 8 की पूरी पुस्तक का भी अन्तिम अंश है। पृष्ठ 158 का ‘आस्यस्य अभ्यन्तरे षट् स्थानानि, षट् करणानि च’ चक्र सब कुछ एक चित्र में समेटकर दिखा देता है — उसे बार-बार देखिए, यही सबसे अच्छा पुनरावर्तन है।
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