कक्षा ८ संस्कृत अध्याय 13 वर्णोच्चारण-शिक्षा १ के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-19
इस अध्याय के बारे में
पाठ किस बात का है — पिछले पाठ (सम्यग्वर्णप्रयोगेण…) में देखा था कि शुद्ध उच्चारण क्यों ज़रूरी है। यह पाठ आगे बढ़कर पूछता है — शुद्ध उच्चारण होता कैसे है? पुस्तक का अपना वाक्य है — ‘अतः प्रत्येक-वर्णस्य शुद्धम् उच्चारणं कथं भवतीति अत्र ज्ञास्यामः।’ अर्थात् यह पाठ वर्णोच्चारण की प्रक्रिया का पाठ है, केवल नियम गिनाने का नहीं। उच्चारण में केवल मुँह काम नहीं करता — पुस्तक स्पष्ट कहती है — ‘वर्णानाम् उच्चारणे केवलम् आस्यस्य एव उपयोगः भवति इति – न ।’ शरीर के चार अङ्ग मिलकर काम करते हैं : १. नाभि-प्रदेशः (मांसपेशी-बल-तन्त्रम्), २. उरः (वायु-बल-तन्त्रम्), ३. कण्ठ-बिलः (ध्वनि-तन्त्रम्), ४. आस्यम् (उच्चारण-तन्त्रम्)। आस्य के भीतर दो गुहाएँ हैं — मुखम् और नासिका । वायु का मार्ग — चार चरण — (१) नाभि-प्रदेश की मांसपेशियाँ उरः को दबाती हैं, (२) उरः फेफड़ों की वायु को ऊपर निकालता है, (३) वह वायु ऊपर चलती
त्वरित पुनरावृत्ति
| स्थानम् (सामान्य) | विशेष-स्थानम् | करणम् (विशेष-करणम्) | तत्र उत्पद्यमानाः वर्णाः |
|---|---|---|---|
| कण्ठः | कण्ठस्य पृष्ठभागः | स्व-स्थानं करणम् (कण्ठस्य अग्रभागः) | अ आ आ३ · क् ख् ग् घ् ङ् · ह् · विसर्गः (ः) |
| तालु | तालु | जिह्वा करणम् (जिह्वा-मध्यः) | इ ई ई३ · च् छ् ज् झ् ञ् · य् · श् |
| मूर्धा | मूर्धा | जिह्वा करणम् (जिह्वा-उपाग्रः) | ऋ ॠ ऋ३ · ट् ठ् ड् ढ् ण् · र् · ष् |
| दन्तः | दन्तः | जिह्वा करणम् (जिह्वा-अग्रः) | ऌ ॡ३ · त् थ् द् ध् न् · ल् · स् |
| ओष्ठः | उत्तरोष्ठः | स्व-स्थानं करणम् (अधरोष्ठः) | उ ऊ ऊ३ · प् फ् ब् भ् म् · (व्) |
| नासिका | नासिका-मूलस्य उपरिभागः | स्व-स्थानं करणम् (नासिका-मूलस्य अधोभागः) | ङ् ञ् ण् न् म् · अनुस्वारः (ं) |
| कण्ठ-तालु (कण्ठ-तालव्यः) | द्वे अपि स्थाने | जिह्वा + स्व-स्थानम् | ए ऐ ऐ३ |
| कण्ठ-ओष्ठौ (कण्ठौष्ठ्यः) | द्वे अपि स्थाने | ओष्ठौ + स्व-स्थानम् | ओ औ औ३ |
| दन्त-ओष्ठौ (दन्त्योष्ठ्यः) | द्वे अपि स्थाने | जिह्वा-अग्रः + अधरोष्ठः | व् |
अभ्यास
- पाठः
- (क) स्थानम्
- (ख) करणम्
- पारिभाषिक-शब्दार्थान् जानीमः
- वयं शब्दार्थान् जानीमः
- अभ्यासात् जायते सिद्धिः
- अभ्यासात् जायते सिद्धिः
- अभ्यासात् जायते सिद्धिः
- अभ्यासात् जायते सिद्धिः
- अभ्यासात् जायते सिद्धिः
- अत्र इदम् अवधेयम्
- योग्यताविस्तरः
- आस्यस्य अभ्यन्तरे षट् स्थानानि, षट् करणानि च (वर्ण-चक्रम्)