उत्तरम् (पुस्तकस्य पेटिका-वाक्यम्) — कण्ठः, ओष्ठः, नासिका च — एतेषु त्रिषु स्थानेषु → ‘स्व-स्थानम्’ एव करणं भवति। (कण्ठ, ओष्ठ और नासिका — इन तीनों स्थानों में करण वही स्थान स्वयं होता है।)
पुस्तक का विस्तार — कण्ठ्यानाम्, ओष्ठ्यानाम्, नासिक्यानां च वर्णानाम् उच्चारणे जिह्वा प्रायः निष्क्रिया भवति। एतेषां वर्णानाम् उच्चारणार्थं → तत्-तत्-स्थानस्य एव कश्चित् पर-भागः, तत्-तत्-स्थानस्य पूर्व-भागं स्पृशति, समीपं वा याति। अतः एतेषां त्रिविधानां वर्णानाम् उच्चारणार्थं → स्व-स्थानं — ‘करणम्’, अर्थात् ‘उपकरणं’ भवति।
(हिन्दी अर्थ — कण्ठ्य, ओष्ठ्य और नासिक्य वर्णों के उच्चारण में जीभ प्रायः निष्क्रिय रहती है। इनके लिए उसी स्थान का कोई पर-भाग उसी स्थान के पूर्व-भाग को छूता है या उसके पास जाता है। इसीलिए इनमें ‘स्व-स्थान’ ही करण बन जाता है।)
‘स्वस्थानकरणः’ का अर्थ: पारिभाषिक सारणी की परिभाषा है — ‘निजस्थानस्य पर-भागः एव करणं यस्य वर्णस्य’ (जिस वर्ण के उच्चारण-स्थान का पर-भाग ही उसका करण हो)। सरल भाषा में — यहाँ छूने वाला और छुआ जाने वाला एक ही अङ्ग के दो भाग हैं, इसलिए बाहर से कोई तीसरा औज़ार (जीभ) लाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। ‘प’ बोलकर देखिए — नीचे का होंठ ऊपर के होंठ से लगता है, जीभ कहीं नहीं जाती।
अभ्यास से जोड़िए: प्रश्न २ (घ) — ‘केषां वर्णानाम् उच्चारणे जिह्वा प्रायः निष्क्रिया भवति ?’ उत्तर — कण्ठ्यानाम्, ओष्ठ्यानाम्, नासिक्यानां च। प्रश्न ३ (च) उलटकर पूछा गया है — ‘तत्तत्स्थानस्य एव कश्चित् पूर्वभागः, तत्तत्स्थानस्य परभागं स्पृशति’ — यह असत्य है; पुस्तक में पर-भाग पूर्व-भाग को छूता है।