उत्तरम् (पुस्तकस्य वाक्यम्) — वर्णस्य उच्चारण-समये, श्वासकोशतः ऊर्ध्वं सरन् वायुः, कण्ठ-बिल-माध्यमेन आस्यस्य अभ्यन्तरं प्रविश्य, तत्र मुखे नासिकायां वा यस्मिन् स्थले वर्णरूपेण प्रकटीभवति, तत् — ‘स्थानम्’ इति उच्यते।
(हिन्दी अर्थ — वर्ण के उच्चारण के समय फेफड़ों से ऊपर चलती हुई वायु, कण्ठ-बिल के रास्ते आस्य के भीतर प्रवेश करके, वहाँ मुख में या नाक में जिस स्थल पर वर्ण के रूप में प्रकट होती है, वही ‘स्थान’ कहलाता है।)