दीपकम् अध्याय 13 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
मुखे उपलभ्यमानानि स्थानानि बहिष्ठात् अन्तः यथाक्रमं (अर्थात् विपरीत-क्रमेण) लिखन्तु — (क) मूर्धा (ख) दन्तः (ग) तालु (घ) कण्ठः (ङ) ओष्ठः
उत्तर

उत्तरम् — बहिष्ठात् अन्तः क्रमः इत्थम् अस्ति —

क्रमःस्थानम्कुत्र
(क)ओष्ठःसर्वबहिः — होंठ
(ख)दन्तःहोंठ के ठीक भीतर — दाँत
(ग)मूर्धादाँतों के पीछे उठा हुआ भाग
(घ)तालुतालु — मुँह की छत
(ङ)कण्ठःसर्वान्तः — गला

एकपङ्क्त्याम् — ओष्ठः → दन्तः → मूर्धा → तालु → कण्ठः।

यह क्रम कहाँ से आया: पृष्ठ 148 का चित्र ‘आस्ये वर्णानां षट् उच्चारण-स्थानानि’ स्थानों को भीतर से बाहर की ओर गिनता है — १. कण्ठः, २. तालु, ३. मूर्धा, ४. दन्तः, ५. ओष्ठः। प्रश्न इसी क्रम को उलटकर (बहिष्ठात् अन्तः = बाहर से भीतर) लिखने को कहता है, इसलिए उत्तर पुस्तक की गिनती का ठीक विपरीत है।
बहिष्ठात् अन्तः — बाहर से भीतर की ओर ओष्ठः दन्तः मूर्धा तालु कण्ठः बहिः अन्तः पुस्तकस्य गणना (अन्तः → बहिः) : १ कण्ठः · २ तालु · ३ मूर्धा · ४ दन्तः · ५ ओष्ठः
बाहर से भीतर की ओर मुख के पाँच स्थान। नासिका मुख में नहीं है, अतः इस क्रम में नहीं गिनी जाती।
सावधानी: प्रश्न ‘मुखे उपलभ्यमानानि स्थानानि’ पूछता है — इसलिए नासिका इस सूची में नहीं आएगी। नासिका आस्य का छठा स्थान अवश्य है, पर वह मुख में नहीं, नासिका में है।
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