प्र1.
‘स्वरः’ इत्यस्य परिभाषा-वाक्यं किम् ? तस्य अर्थं च लिखत।
उत्तर
परिभाषा-वाक्यम् — स्वयं राजन्ते इति स्वराः।
पुस्तकस्य अर्थः — ये वर्णाः (स्वयं) स्वतन्त्ररूपेण (राजन्ते) उच्चार्यन्ते, ते → स्वराः भवन्ति।
(हिन्दी — जो वर्ण अपने आप, स्वतन्त्र रूप से बोले जाते हैं, वे स्वर होते हैं।)
पद-विश्लेषण: स्वयम् = अपने आप, बिना किसी के सहारे। राजन्ते = शोभित होते हैं / प्रकट होते हैं — यहाँ पुस्तक इसका अर्थ ‘उच्चार्यन्ते’ (उच्चारित होते हैं) करती है। अर्थात् स्वर वह वर्ण है जिसे बोलने के लिए किसी दूसरे वर्ण की सहायता नहीं चाहिए — ‘अ’, ‘इ’, ‘उ’ अकेले ही पूरे बोले जा सकते हैं।
जाँच कीजिए: ‘क्’ को अकेले बोलने की कोशिश कीजिए — नहीं बोल पाएँगे; ‘क्अ’ कहना ही पड़ेगा। पर ‘अ’ अकेले पूरा बोला जाता है। यही स्वर और व्यञ्जन का मूल भेद है। पारिभाषिक सारणी में स्वरः = अच् / अच्-वर्णः (Vowel) दिया है।