दीपकम् अध्याय 13 अत्र इदम् अवधेयम्

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
‘स्वरः’ इत्यस्य परिभाषा-वाक्यं किम् ? तस्य अर्थं च लिखत।
उत्तर

परिभाषा-वाक्यम् — स्वयं राजन्ते इति स्वराः।

पुस्तकस्य अर्थः — ये वर्णाः (स्वयं) स्वतन्त्ररूपेण (राजन्ते) उच्चार्यन्ते, ते → स्वराः भवन्ति।

(हिन्दी — जो वर्ण अपने आप, स्वतन्त्र रूप से बोले जाते हैं, वे स्वर होते हैं।)

पद-विश्लेषण: स्वयम् = अपने आप, बिना किसी के सहारे। राजन्ते = शोभित होते हैं / प्रकट होते हैं — यहाँ पुस्तक इसका अर्थ ‘उच्चार्यन्ते’ (उच्चारित होते हैं) करती है। अर्थात् स्वर वह वर्ण है जिसे बोलने के लिए किसी दूसरे वर्ण की सहायता नहीं चाहिए — ‘अ’, ‘इ’, ‘उ’ अकेले ही पूरे बोले जा सकते हैं।
जाँच कीजिए: ‘क्’ को अकेले बोलने की कोशिश कीजिए — नहीं बोल पाएँगे; ‘क्’ कहना ही पड़ेगा। पर ‘अ’ अकेले पूरा बोला जाता है। यही स्वर और व्यञ्जन का मूल भेद है। पारिभाषिक सारणी में स्वरः = अच् / अच्-वर्णः (Vowel) दिया है।
प्र2.
‘व्यञ्जनम्’ इत्यस्य परिभाषा-वाक्यं किम् ? तस्य अर्थं च लिखत।
उत्तर

परिभाषा-वाक्यम् — अन्वग् भवति व्यञ्जनम्।

पुस्तकस्य अर्थः — उच्चारणार्थं यः वर्णः अचं (स्वरं) प्रति पराश्रितः भवति, सः वर्णः → ‘व्यञ्जनं’ भवति।

(हिन्दी — उच्चारण के लिए जो वर्ण स्वर पर आश्रित रहता है, वही वर्ण व्यञ्जन होता है।)

‘अन्वग्’ का अर्थ: ‘अनु + अञ्च्’ — पीछे-पीछे चलने वाला। व्यञ्जन स्वर के पीछे-पीछे चलता है, अकेला खड़ा नहीं हो सकता। इसीलिए लिखने में भी उसके नीचे हलन्त् ( ् ) लगाना पड़ता है — क्, ख्, ग् — और बोलते समय उसमें ‘अ’ जोड़ना पड़ता है — क, ख, ग।
दोनों परिभाषाएँ आमने-सामने: स्वरः = स्वतन्त्रः (अपने बल पर), व्यञ्जनम् = पराश्रितः (दूसरे के सहारे)। पारिभाषिक सारणी में व्यञ्जनम् = हल्, हल्-वर्णः (Consonant) और स्वरः = अच् (Vowel) — ‘अच्’ तथा ‘हल्’ ये माहेश्वर-सूत्रों के प्रत्याहार हैं।
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