दीपकम् अध्याय 13 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
(क) उरसि किं तन्त्रं भवति ?
उत्तर

उत्तरम् — वायु-बल-तन्त्रम्। (छाती में वायु-बल-तन्त्र होता है — Air-pressure System।)

आधार (पृष्ठ 146): ‘२. उरः (Chest — Lungs & Diaphragm) / वायु-बल-तन्त्रम् — (Air-pressure System)’। उरः में श्वासकोश (फेफड़े) और उरःप्राचीर (डायाफ्राम) हैं, जो वायु का दाब बनाकर उसे ऊपर भेजते हैं — इसलिए इसका तन्त्र ‘वायु-बल’ का तन्त्र कहलाता है।
व्याकरण: ‘उरसि’ सप्तमी विभक्ति, एकवचन, नपुंसकलिङ्ग (उरस् — सकारान्त नपुंसक) — अर्थ ‘छाती में’। उत्तर ‘तन्त्रम्’ प्रथमा एकवचन नपुंसकलिङ्ग है, क्योंकि प्रश्न में ‘किं तन्त्रं भवति’ पूछा गया है।
प्र2.
(ख) नाभिप्रदेशे स्थिताः मांसपेश्यः किं नोदयन्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — उरः (नोदयन्ति)। (नाभि-भाग में स्थित मांसपेशियाँ छाती को दबाती हैं।)

आधार (पृष्ठ 146): ‘१. सर्वप्रथमं नाभि-प्रदेशे स्थिताः मांसपेश्यः उरः नोदयन्ति।’ यही वाग्-उत्पत्ति का पहला चरण है — बोलना नाभि से शुरू होता है, गले से नहीं। इसीलिए गायक और वक्ता ‘पेट से बोलो’ कहते हैं।
व्याकरण: ‘उरः’ यहाँ द्वितीया विभक्ति, एकवचन, नपुंसकलिङ्ग है (कर्म — किसे दबाती हैं?)। उरस् शब्द के प्रथमा और द्वितीया एकवचन दोनों का रूप ‘उरः’ ही होता है। ‘नोदयन्ति’ = अभिपीडयन्ति (दबाती हैं)।
प्र3.
(ग) आस्यस्य आभ्यन्तरे वर्णानाम् उत्पत्त्यर्थं द्वितीयं तत्त्वं किम् अस्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — करणम्। (दूसरा तत्त्व ‘करण’ है।)

आधार (पृष्ठ 147): ‘(क) प्रथमम् — स्थानम्, (ख) द्वितीयम् — करणम्, (ग) तृतीयम् — आभ्यन्तर-प्रयत्नः।’ क्रम याद रखिए — पहले जगह तय होती है, फिर उस जगह तक पहुँचने वाला औज़ार, और अन्त में उस औज़ार का प्रयत्न (कितना दबाव, कितनी दूरी) — जो अगली कक्षा में पढ़ाया जाएगा।
व्याकरण: ‘करणम्’ प्रथमा विभक्ति, एकवचन, नपुंसकलिङ्ग। प्रश्न में ‘तत्त्वं किम् अस्ति’ है, इसलिए उत्तर भी प्रथमा एकवचन नपुंसकलिङ्ग में ही आएगा।
प्र4.
(घ) आस्ये कति स्थानानि सन्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — षट् (स्थानानि)। (आस्य में छह स्थान हैं।)

आधार (पृष्ठ 148): ‘आस्ये — षट् स्थानानि वयं दृष्टवन्तः’ — मुखे कण्ठः, तालु, मूर्धा, दन्तः, ओष्ठः (पञ्च) तथा नासिकायाम् नासिका (एकम्) — कुल छह। ध्यान रहे, प्रश्न ‘मुखे’ नहीं, ‘आस्ये’ पूछता है — और आस्य में मुख तथा नासिका दोनों आते हैं, इसलिए उत्तर पाँच नहीं, छह है।
व्याकरण: ‘षट्’ अव्यय-सदृश संख्यावाचक है; इसके साथ संज्ञा बहुवचन में आती है — ‘षट् स्थानानि सन्ति’। ‘कति’ का उत्तर सदैव संख्या से दिया जाता है।
प्र5.
(ङ) स्थानस्य कार्यनिदर्शनार्थं किं समुचितम् उदाहरणम् अस्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — मुरली। (बाँसुरी उपयुक्त उदाहरण है।)

आधार (पृष्ठ 149): ‘स्थानस्य सम्यक् कार्य-निदर्शनार्थं मुरली समुचितम् उदाहरणम् अस्ति।’ बाँसुरी में हवा एक ही है, पर छिद्र बदलते ही स्वर बदल जाता है — ठीक वैसे ही मुँह में वायु एक ही है, पर स्थान बदलते ही वर्ण बदल जाता है।
व्याकरण: ‘मुरली’ प्रथमा विभक्ति, एकवचन, स्त्रीलिङ्ग (ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग — नदी-वत्)। शब्दार्थ-सारणी में इसका पर्याय वंशी दिया गया है।
प्र6.
(च) करणानि मुरल्याः कस्य भागम् इव व्यवहरन्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — अङ्गुलीः इव (अङ्गुलयः इव)। (करण बाँसुरी बजाती हुई अङ्गुलियों की तरह काम करते हैं।)

आधार (पृष्ठ 150): ‘यथा निदर्शने — मुरलीं वादयन्त्यः अङ्गुलयः — आस्यस्य करणानि इव व्यवहरन्ति।’ अङ्गुलियाँ छिद्रों को छूती हैं या उनके पास जाती हैं — ठीक वही काम करण (जिह्वा या स्व-स्थान) स्थान के साथ करते हैं।
यह जोड़ी अलग-अलग याद कीजिए: अङ्गुलिच्छिद्राणि → स्थानानि इव (पृष्ठ 149) और अङ्गुलयः → करणानि इव (पृष्ठ 150–151)। परीक्षा में दोनों उलटकर पूछे जाते हैं। ‘अङ्गुलयः’ प्रथमा बहुवचन, स्त्रीलिङ्ग (अङ्गुलि — इकारान्त स्त्रीलिङ्ग); ‘कस्य भागम्’ के उत्तर में द्वितीया चाहिए, इसलिए ‘अङ्गुलीः इव’ भी शुद्ध है।
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