दीपकम् अध्याय 2 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
छात्रः कक्षां प्रविशति । संस्कृतं पठति ।
उत्तर

उत्तरम् (पुस्तके प्रदत्तम् उदाहरणम्) — छात्रः कक्षां प्रविश्य संस्कृतं पठति ।

[हिन्दी — छात्र कक्षा में प्रवेश करके संस्कृत पढ़ता है।]

विधि समझ लीजिए: दो वाक्यों को एक बनाना है। जो क्रिया पहले होती है उसे ल्यबन्त में बदलिए (प्रविशति → प्र + विश् + ल्यप् = प्रविश्य), और जो बाद में होती है वही मुख्य क्रिया रहकर वाक्य के अन्त में आएगी। कर्ता एक ही बार लिखा जाएगा।
प्र2.
भक्तः मन्दिरम् आगच्छति । पूजां करोति ।
उत्तर

उत्तरम् — भक्तः मन्दिरम् आगत्य पूजां करोति ।

[हिन्दी — भक्त मन्दिर आकर पूजा करता है।]

प्रकृति-प्रत्ययः: आगच्छति → आ + गम् + ल्यप् = आगत्य (अथवा आगम्य)।
प्र3.
माता भोजनं निर्माति । पुत्राय ददाति ।
उत्तर

उत्तरम् — माता भोजनं निर्माय पुत्राय ददाति ।

[हिन्दी — माता भोजन बनाकर पुत्र को देती है।]

प्रकृति-प्रत्ययः: निर्माति → निर् + मा + ल्यप् = निर्माय। ‘पुत्राय’ चतुर्थी विभक्ति में है, क्योंकि ‘दा’ धातु का सम्प्रदान चतुर्थी में आता है।
प्र4.
सुरेशः प्रातः उत्तिष्ठति । देवं नमति ।
उत्तर

उत्तरम् — सुरेशः प्रातः उत्थाय देवं नमति ।

[हिन्दी — सुरेश प्रातः उठकर देव को प्रणाम करता है।]

प्रकृति-प्रत्ययः: उत्तिष्ठति → उत् + स्था + ल्यप् = उत्थाय। ध्यान दें — ‘स्था’ का ‘स्’ उपसर्ग ‘उत्’ के साथ मिलकर ‘त्थ’ बन जाता है।
प्र5.
रमा पुस्तकं स्वीकरोति । विद्यालयं गच्छति ।
उत्तर

उत्तरम् — रमा पुस्तकं स्वीकृत्य विद्यालयं गच्छति ।

[हिन्दी — रमा पुस्तक लेकर विद्यालय जाती है।]

प्रकृति-प्रत्ययः: स्वीकरोति → स्वी + कृ + ल्यप् = स्वीकृत्य। ‘कृ’ धातु के ल्यबन्त रूप में ‘कृत्य’ ही आता है — उपकृत्य, परिष्कृत्य, अपकृत्य, स्वीकृत्य।
प्र6.
अहं गृहम् आगच्छामि । भोजनं करोमि ।
उत्तर

उत्तरम् — अहं गृहम् आगत्य भोजनं करोमि ।

[हिन्दी — मैं घर आकर भोजन करता/करती हूँ।]

ध्यातव्यम्: ल्यबन्त पद अव्यय है, इसलिए कर्ता चाहे उत्तमपुरुष (अहम्) हो या प्रथमपुरुष (सः), रूप ‘आगत्य’ ही रहेगा — बदलती केवल मुख्य क्रिया है (करोमि / करोति)।
प्र7.
तण्डुलकणान् विकिरति । जालं विस्तारयति ।
उत्तर

उत्तरम् — तण्डुलकणान् विकीर्य जालं विस्तारयति ।

[हिन्दी — (बहेलिया) चावल के दाने बिखेरकर जाल फैलाता है।]

प्रकृति-प्रत्ययः: विकिरति → वि + कॄ + ल्यप् = विकीर्य। ऋकारान्त धातुओं (कॄ, तॄ, स्तॄ) में ल्यप् से पहले ‘ईर्’ हो जाता है — विकीर्य, अवतीर्य, विस्तीर्य।
प्र8.
व्याधः तण्डुलकणान् अवलोकते । भूमौ अवतरति ।
उत्तर

उत्तरम् — व्याधः तण्डुलकणान् अवलोक्य भूमौ अवतरति ।

[हिन्दी — व्याध चावल के दाने देखकर भूमि पर उतरता है।]

प्रकृति-प्रत्ययः: अवलोकते → अव + लोक् + ल्यप् = अवलोक्य। ‘भूमौ’ सप्तमी विभक्ति, एकवचन (अधिकरण) है।
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