दीपकम् अध्याय 2 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
यदा केदारक्षेत्रम् आरोहन्तः आसन् किम् अभवत् ?
उत्तर

उत्तरम् — यदा ते श्रीकेदारक्षेत्रम् आरोहन्तः आसन् तदा लक्ष्यप्राप्तेः पूर्वं वेगेन वृष्टिः आरब्धा, सहसा सर्वत्र अन्धकारः प्रसृतः, नद्याः तीव्रजलवेगेन सेतुः भग्नः, पर्वतस्खलनं च सञ्जातम्

[हिन्दी — जब वे श्रीकेदारक्षेत्र चढ़ रहे थे, तब लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही तेज़ वर्षा शुरू हो गई, अचानक सब ओर अँधेरा छा गया, नदी के तीव्र जल-वेग से पुल टूट गया और पर्वत का स्खलन (भूस्खलन) हो गया।]

व्याकरणम्: ‘आरोहन्तः आसन्’ — शतृ-प्रत्ययान्त ‘आरोहन्’ के साथ ‘आसन्’ (लङ् लकार) का प्रयोग; यह अपूर्ण भूतकाल बताता है — ‘चढ़ रहे थे’। ‘भग्नः’, ‘प्रसृतः’, ‘सञ्जातम्’ — तीनों क्त-प्रत्ययान्त भूतकालिक कृदन्त हैं।
प्र2.
सर्वे उच्चस्वरेण किं प्रार्थयन्त ?
उत्तर

उत्तरम् — सर्वे उच्चस्वरेण अक्रन्दन् ईश्वरं प्रार्थयन्त च — ‘हे भगवन् ! रक्ष अस्मान् रक्ष’ इति ।

[हिन्दी — सब ऊँचे स्वर में रोने लगे और ईश्वर से प्रार्थना करने लगे — “हे भगवन्! हमारी रक्षा करो, रक्षा करो।”]

व्याकरणम्: ‘उच्चस्वरेण’ — तृतीया विभक्ति, एकवचन (साधन/प्रकार)। ‘रक्ष’ — रक्ष् धातु, लोट् लकार, मध्यमपुरुष एकवचन। ‘प्रार्थयन्त’ आत्मनेपदी लङ् लकार का प्रथमपुरुष बहुवचन रूप है।
प्र3.
असम्भवं कार्यं कथं कर्तुं शक्यते इति नायकः उक्तवान् ?
उत्तर

उत्तरम् — नायकः उक्तवान् — वयम् आत्मविश्वासबलेन इदम् असम्भवम् अपि कार्यं सम्भूय अवश्यं साधयितुं शक्नुमः

[हिन्दी — नायक ने कहा कि हम आत्मविश्वास के बल से मिलकर यह असम्भव काम भी अवश्य कर सकते हैं; उससे हमें लक्ष्य भी मिलेगा और प्राणों की रक्षा भी होगी।]

ऐसा क्यों: प्रश्न ‘कथम्’ (किस प्रकार) है, इसलिए उत्तर में साधन बताना आवश्यक है — और साधन दो हैं : ‘आत्मविश्वासबलेन’ (तृतीया विभक्ति = किससे) तथा ‘सम्भूय’ (ल्यबन्त = मिलकर)। यही दो शब्द पूरे पाठ की कुंजी हैं।
प्र4.
निर्जने वने तण्डुलकणान् दृष्ट्वा चित्रग्रीवः किं निरूपयति ?
उत्तर

उत्तरम् — चित्रग्रीवः निरूपयति — “कुतोऽत्र निर्जने वने तण्डुलकणानां सम्भवः ? तद् निरूप्यताम् । कश्चिद् व्याधोऽत्र भवेत् । सर्वथा अविचारितं कर्म न कर्तव्यम् ।”

[हिन्दी — चित्रग्रीव विचार करता है — “इस निर्जन वन में चावल के दाने कहाँ से आ सकते हैं? इस पर सोचा जाए। यहाँ कोई बहेलिया अवश्य होगा। बिना विचारे कोई काम कभी नहीं करना चाहिए।”]

सन्धिः: कुतः + अत्र = कुतोऽत्र ; व्याधः + अत्र = व्याधोऽत्र — दोनों विसर्गसन्धि के चौथे नियम (अः + अ = ओऽ) के उदाहरण हैं।
प्र5.
किं नीतिवचनं प्रसिद्धम् ?
उत्तर

उत्तरम् — “लघूनाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका भवति” इति नीतिवचनं लोकसिद्धं प्रसिद्धं च ।

[हिन्दी — “छोटी-छोटी वस्तुओं का भी संगठन काम पूरा कर देता है” — यही लोकप्रसिद्ध नीतिवचन है। यही वाक्य श्लोक-रूप में पाठ का शीर्षक बना है — अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका।]

ध्यातव्यम्: कथा में ‘लघूनाम्’ शब्द आया है और शीर्षक-श्लोक में ‘अल्पानाम्’। दोनों का अर्थ एक ही है — छोटा, दुर्बल। परीक्षा में जो शब्द पुस्तक के जिस स्थल से पूछा जाए, वही लिखिए।
प्र6.
व्याधात् रक्षां प्राप्तुं चित्रग्रीवः कम् आदेशं दत्तवान् ?
उत्तर

उत्तरम् — चित्रग्रीवः आदेशं दत्तवान् — “अतः अस्माभिः सर्वैः एकचित्तीभूय जालमादाय उड्डीयताम्” — इति । एवं विचार्य सर्वे पक्षिणः जालमादाय उत्पतिताः ।

[हिन्दी — चित्रग्रीव ने आदेश दिया — “अतः हम सबको एक चित्त होकर, जाल-सहित उड़ जाना चाहिए।” ऐसा विचार कर सब पक्षी जाल लेकर उड़ गए।]

ऐसा क्यों काम करता है: कोई एक कपोत अकेले जाल नहीं उठा सकता — पर सबकी शक्ति एक ही दिशा में एक ही क्षण में लगे तो जाल उठ जाता है। शर्त ‘बल’ नहीं, एकचित्तता है : अगर आधे ऊपर खींचें और आधे इधर-उधर, तो जाल टस से मस नहीं होगा। इसीलिए चित्रग्रीव ‘सर्वैः’ के साथ ‘एकचित्तीभूय’ भी कहता है।
प्र7.
हिरण्यकः किमर्थं तूष्णीं स्थितः ?
उत्तर

उत्तरम् — हिरण्यकः कपोतानाम् अवपातभयात् चकितः सन् तूष्णीं स्थितः । सः सर्वदा अनिष्टशङ्कया शतद्वारं विवरं कृत्वा निवसति स्म ।

[हिन्दी — हिरण्यक कपोतों के अचानक ऊपर से गिर पड़ने के भय से चकित होकर चुप बैठा रहा। वह सदा अनिष्ट की आशङ्का से सौ द्वारों वाला बिल बनाकर रहता था।]

शब्दार्थः: ‘अवपातः’ = ऊपर से गिरना; ‘अवपातभयात्’ = गिर पड़ने के भय से (पञ्चमी विभक्ति, कारण)। ‘तूष्णीम्’ = चुपचाप — यह अव्यय है।
ऐसा क्यों: हिरण्यक की सावधानी कोई कायरता नहीं — वह ‘शतद्वारं विवरम्’ बनाता है, अर्थात् सौ निकास वाला बिल। जो सबसे अधिक सहायता करने योग्य है, वह स्वयं भी सबसे अधिक सतर्क है — कथा यह चुपचाप कह देती है।
प्र8.
पुलकितः हिरण्यकः चित्रग्रीवं कथं प्रशंसति ?
उत्तर

उत्तरम् — हिरण्यकः प्रहृष्टमनाः पुलकितः सन् अब्रवीत् — “साधु मित्र ! साधु । अनेन आश्रितवात्सल्येन त्वं त्रैलोक्यस्यापि स्वामित्वं प्राप्तुं योग्योऽसि ।”

[हिन्दी — प्रसन्न मन और रोमाञ्चित होकर हिरण्यक बोला — “धन्य हो मित्र, धन्य! इस आश्रितवात्सल्य के कारण तुम तीनों लोकों का स्वामित्व पाने के योग्य हो।”]

ऐसा क्यों: हिरण्यक चित्रग्रीव के बल, पंख या बुद्धि की प्रशंसा नहीं करता — केवल इस बात की करता है कि उसने अपने से पहले अपने आश्रितों को रखा। संस्कृत नीतिग्रन्थों में नेतृत्व की कसौटी यही मानी गई है : अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व
सन्धिः: योग्यः + असि = योग्योऽसि (विसर्गसन्धि, अः + अ = ओऽ)। ‘त्रैलोक्यस्य’ = त्रयाणां लोकानां समाहारः — तीनों लोक (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल)।
प्र9.
कपोताः कथं आत्मरक्षणं कृतवन्तः ?
उत्तर

उत्तरम् — आपद्ग्रस्ताः कपोताः बुद्धिबलेन संघटनसामर्थ्येन च आत्मसंरक्षणं कृतवन्तः

[हिन्दी — विपत्ति में फँसे कपोतों ने बुद्धि के बल और संगठन की सामर्थ्य से अपनी रक्षा की।]

दोनों क्यों आवश्यक थे: केवल संगठन होता तो सब मिलकर जाल-सहित उड़ जाते और थककर फिर गिर जाते — बन्धन तो बना ही रहता। केवल बुद्धि होती तो चित्रग्रीव अकेला हिरण्यक तक पहुँच जाता, बाकी बँधे रह जाते। बुद्धि ने दिशा दी, संगठन ने शक्ति — इसीलिए पाठ ‘संहतिः’ शब्द का प्रयोग करता है, ‘संख्या’ का नहीं।
व्याकरणम्: ‘बुद्धिबलेन’, ‘संघटनसामर्थ्येन’ — दोनों तृतीया विभक्ति, एकवचन; ‘कथम्’ प्रश्न का उत्तर करण-अर्थ में तृतीया से ही दिया जाता है।
प्र10.
नायकस्य प्रेरकवचनैः सर्वेऽपि किम् अकुर्वन् ?
उत्तर

उत्तरम् — नायकस्य प्रेरकवचनैः उत्साहिताः सर्वेऽपि भयं शोकं सन्देहं च विहाय सेतुनिर्माणकार्ये संलग्नाः जाताः । भगीरथप्रयत्नैः सेतुनिर्माणं कृत्वा तैः स्वीयप्राणाः अन्येषां च प्राणाः संरक्षिताः

[हिन्दी — नायक के प्रेरक वचनों से उत्साहित होकर सब भय, शोक और सन्देह छोड़कर पुल बनाने के काम में जुट गए। भगीरथ जैसे प्रयत्न से पुल बनाकर उन्होंने अपने और दूसरों के भी प्राण बचा लिए।]

ऐसा क्यों: ध्यान दीजिए, कहानी उन्हें बचाई नहीं गई — उन्होंने स्वयं बचाया। कोई दैवी सहायता नहीं आती, कोई बचाव-दल नहीं आता। पाठ का अन्तिम शब्द ‘संरक्षिताः’ है और उसका कर्ता ‘तैः’ (उनके द्वारा) है। यही कपोत-कथा का पूरा उपयोग है : सुनी हुई नीति जब आचरण बन जाए, तभी वह नीति है।
व्याकरणम्: ‘विहाय’ = वि + हा + ल्यप् (छोड़कर)। ‘संरक्षिताः’ — कर्मवाच्य का क्त-प्रत्ययान्त रूप, इसलिए कर्ता ‘तैः’ तृतीया विभक्ति में आया है।
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