उत्तरम् — नायकस्य प्रेरकवचनैः उत्साहिताः सर्वेऽपि भयं शोकं सन्देहं च विहाय सेतुनिर्माणकार्ये संलग्नाः जाताः । भगीरथप्रयत्नैः सेतुनिर्माणं कृत्वा तैः स्वीयप्राणाः अन्येषां च प्राणाः संरक्षिताः ।
[हिन्दी — नायक के प्रेरक वचनों से उत्साहित होकर सब भय, शोक और सन्देह छोड़कर पुल बनाने के काम में जुट गए। भगीरथ जैसे प्रयत्न से पुल बनाकर उन्होंने अपने और दूसरों के भी प्राण बचा लिए।]
ऐसा क्यों: ध्यान दीजिए, कहानी उन्हें बचाई नहीं गई — उन्होंने स्वयं बचाया। कोई दैवी सहायता नहीं आती, कोई बचाव-दल नहीं आता। पाठ का अन्तिम शब्द ‘संरक्षिताः’ है और उसका कर्ता ‘तैः’ (उनके द्वारा) है। यही कपोत-कथा का पूरा उपयोग है : सुनी हुई नीति जब आचरण बन जाए, तभी वह नीति है।
व्याकरणम्: ‘विहाय’ = वि + हा + ल्यप् (छोड़कर)। ‘संरक्षिताः’ — कर्मवाच्य का क्त-प्रत्ययान्त रूप, इसलिए कर्ता ‘तैः’ तृतीया विभक्ति में आया है।