दीपकम् अध्याय 2 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
मित्राणि ग्रीष्मावकाशे कुत्र गच्छन्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — उत्तराखण्डम् । (देवभूमिम् उत्तराखण्डम्)

[हिन्दी — मित्र ग्रीष्मावकाश में उत्तराखण्ड जाते हैं — पाठ में उसे ‘पुण्यक्षेत्रदर्शनाय देवभूमिम् उत्तराखण्डम्’ कहा गया है।]

व्याकरणम्: ‘उत्तराखण्डम्’ — द्वितीया विभक्ति, एकवचन। प्रश्न ‘कुत्र’ का उत्तर यहाँ द्वितीया में है, क्योंकि ‘गच्छन्ति’ (गति-अर्थक क्रिया) का कर्म गन्तव्य स्थान ही होता है।
प्र2.
सर्वत्र कः प्रसृतः ?
उत्तर

उत्तरम् — अन्धकारः ।

[हिन्दी — सहसा सब ओर अन्धकार फैल गया — ‘सहसा सर्वत्र अन्धकारः प्रसृतः’।]

व्याकरणम्: ‘अन्धकारः’ — पुंलिङ्ग, प्रथमा विभक्ति, एकवचन। प्रश्नपद ‘कः’ भी प्रथमा एकवचन है, इसलिए उत्तर भी प्रथमा में ही रहेगा।
प्र3.
कः सर्वान् प्रेरयन् अवदत् ?
उत्तर

उत्तरम् — सुधीरः । (नायकः सुधीरः)

[हिन्दी — सबका अधैर्य देखकर नायक सुधीर ने सबको सान्त्वना देते और प्रेरित करते हुए कहा।]

व्याकरणम्: ‘प्रेरयन्’ — शतृ-प्रत्ययान्त (वर्तमानकालिक कृदन्त) रूप, पुंलिङ्ग प्रथमा एकवचन — ‘प्रेरित करता हुआ’। नाम का अर्थ भी ध्यान दीजिए : सुधीरः = सु + धीर, अर्थात् अत्यन्त धैर्यवान् — पात्र का नाम ही उसका चरित्र बता देता है।
प्र4.
कः हितोपदेशस्य कथां श्रावयति ?
उत्तर

उत्तरम् — नायकः । (सुधीरः)

[हिन्दी — नायक (सुधीर) हितोपदेश की कथा सुनाता है — “अस्मिन् प्रसङ्गे अहं हितोपदेशस्य एकां कथां श्रावयामि।”]

व्याकरणम्: ‘श्रावयति’ — णिजन्त (प्रेरणार्थक) क्रिया : ‘सुनाता है’। ‘शृणोति’ का अर्थ होता ‘सुनता है’ — दोनों में यही अन्तर है।
प्र5.
कपोतराजस्य नाम किम् ?
उत्तर

उत्तरम् — चित्रग्रीवः ।

[हिन्दी — कपोतराज का नाम चित्रग्रीव है — ‘चित्रग्रीवनामा कपोतराजः सपरिवारः आकाशमार्गे गच्छति स्म’।]

शब्दार्थः: चित्र (रंग-बिरंगी) + ग्रीवा (गर्दन) = जिसकी गर्दन रंग-बिरंगी हो। ‘चित्रग्रीवनामा’ का विग्रह है — चित्रग्रीवः नाम यस्य सः (बहुव्रीहि समास)।
प्र6.
व्याधः कान् विकीर्य जालं प्रसारितवान् ?
उत्तर

उत्तरम् — तण्डुलकणान् ।

[हिन्दी — बहेलिये ने चावल के दाने बिखेरकर जाल फैलाया — ‘व्याधः तण्डुलकणान् विकीर्य जालं विस्तीर्य च प्रच्छन्नो भूत्वा स्थितः’।]

व्याकरणम्: ‘तण्डुलकणान्’ — पुंलिङ्ग, द्वितीया विभक्ति, बहुवचन। प्रश्न का ‘कान्’ भी द्वितीया बहुवचन है, इसलिए उत्तर भी उसी में।
प्र7.
विपत्काले विस्मयः कस्य लक्षणम् ?
उत्तर

उत्तरम् — कापुरुषस्य । (कापुरुषलक्षणम्)

[हिन्दी — विपत्ति के समय घबरा जाना कायर पुरुष का लक्षण है — ‘यतोहि विपत्काले विस्मयः एव कापुरुषलक्षणम्’।]

ऐसा क्यों: चित्रग्रीव यह बात तब कहता है जब सब कपोत उसी को दोष दे रहे हैं। उसका तर्क सीधा है — दोष ढूँढ़ने में समय लगाना भी एक तरह की घबराहट ही है; विपत्ति में बुद्धि का काम है उपाय खोजना, अपराधी नहीं।
व्याकरणम्: ‘कापुरुषस्य’ — षष्ठी विभक्ति, एकवचन; प्रश्नपद ‘कस्य’ भी षष्ठी एकवचन है। ‘कु’ उपसर्ग ‘पुरुष’ के साथ मिलकर ‘का’ हो जाता है — कु + पुरुषः = कापुरुषः (निन्दित पुरुष, कायर)।
प्र8.
चित्रग्रीवस्य मित्रं हिरण्यकः कुत्र निवसति ?
उत्तर

उत्तरम् — चित्रवने । (गण्डकीतीरे चित्रवने)

[हिन्दी — हिरण्यक गण्डकी नदी के तट पर स्थित चित्रवन में रहता है।]

व्याकरणम्: ‘चित्रवने’ — सप्तमी विभक्ति, एकवचन (अधिकरण)। प्रश्नपद ‘कुत्र’ स्थान पूछता है, इसलिए उत्तर सप्तमी में दिया जाता है। ‘गण्डकीतीरे’ भी सप्तमी एकवचन है।
प्र9.
चित्रग्रीवः हिरण्यकं कथं सम्बोधयति ?
उत्तर

उत्तरम् — ‘सखे’ इति । (सखे हिरण्यक !)

[हिन्दी — चित्रग्रीव हिरण्यक को ‘सखे’ (हे मित्र!) कहकर पुकारता है — “सखे हिरण्यक! किम् अस्माभिः सह न सम्भाषसे?”]

व्याकरणम्: ‘सखे’ — ‘सखि’ शब्द का सम्बोधन, एकवचन रूप। ‘सखि’ के रूप विशेष हैं : सखा (प्रथमा), सखायम् (द्वितीया), हे सखे (सम्बोधन)।
प्र10.
पूर्वं केषां पाशान् छिनत्तु इति चित्रग्रीवः वदति ?
उत्तर

उत्तरम् — मदाश्रितानाम् । (एतेषां कपोतानाम्)

[हिन्दी — चित्रग्रीव कहता है — “पहले मेरे आश्रित इन कपोतों के बन्धन काटो, बाद में मेरे।” — “पूर्वं मदाश्रितानाम् एतेषां पाशान् छिनत्तु, पश्चात् मम।”]

ऐसा क्यों: यही पूरे पाठ का नैतिक शिखर है। हिरण्यक स्वाभाविक रूप से पहले अपने मित्र का बन्धन काटने आता है, पर चित्रग्रीव रोक देता है — क्योंकि जो अपने अधीनों से पहले स्वयं को मुक्त कराता है, वह नायक नहीं रहता। हिरण्यक इसी को ‘आश्रितवात्सल्य’ कहकर उसे तीनों लोकों के स्वामित्व के योग्य बताता है।
सन्धिः तथा व्याकरणम्: ‘मदाश्रितानाम्’ = मद् + आश्रितानाम् (मम आश्रिताः = मेरे आश्रित); षष्ठी विभक्ति, बहुवचन। प्रश्न का ‘केषाम्’ भी षष्ठी बहुवचन है।
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