प्र1.
पुस्तके प्रदत्तां ल्यप्-प्रत्ययान्तपदानां सारिणीं पठत, अवगच्छत च ।
उत्तर
पुस्तक की पूरी सारिणी नीचे दी है। पाँचवें स्तम्भ में वही वाक्य हैं जिनमें ल्यबन्त पद (लाल रंग में) प्रयुक्त हुआ है।
| लट्-लकारक्रिया | प्रकृति-प्रत्ययविभागः | ल्यबन्तरूपम् | विवरणार्थः | वाक्यम् |
|---|---|---|---|---|
| आगच्छति | आ + गम् + ल्यप् | आगत्य / आगम्य | आगमनं कृत्वा | छात्रः विद्यालयम् आगत्य संस्कृतं पठति। |
| आनयति | आ + नी + ल्यप् | आनीय | आनयनं कृत्वा | सः ग्रन्थालयात् ग्रन्थम् आनीय पठति। |
| उत्तिष्ठति | उत् + स्था + ल्यप् | उत्थाय | उत्थानं कृत्वा | सुरेशः प्रातः उत्थाय मातापितरौ नमति। |
| प्रणमति | प्र + नम् + ल्यप् | प्रणम्य / प्रणत्य | प्रणामं कृत्वा | शिष्यः गुरुं प्रणम्य ग्रन्थं पठति। |
| उपकरोति | उप + कृ + ल्यप् | उपकृत्य | उपकारं कृत्वा | सज्जनः दुःखितजनान् उपकृत्य मोदते। |
| निर्दिशति | निर् + दिश् + ल्यप् | निर्दिश्य | निर्देशं कृत्वा | अध्यापकः चित्रं निर्दिश्य पाठयति। |
| निश्चिनोति | निस् + चि + ल्यप् | निश्चित्य | निश्चयं कृत्वा | छात्रः ध्येयं निश्चित्य अध्ययनं करोति। |
| विस्मरति | वि + स्मृ + ल्यप् | विस्मृत्य | विस्मरणं कृत्वा | अहं पुस्तकं विस्मृत्य आगतवान्। |
| परिष्करोति | परि + कृ + ल्यप् | परिष्कृत्य | परिष्कारं कृत्वा | छात्रः व्याकरणेन भाषां परिष्कृत्य वदति। |
| आरभते | आ + रभ् + ल्यप् | आरभ्य | आरम्भं कृत्वा | श्वः आरभ्य अहं योगासनानि करिष्यामि। |
| स्वीकरोति | स्वी + कृ + ल्यप् | स्वीकृत्य | स्वीकारं कृत्वा | माता वस्तूनि स्वीकृत्य आगच्छति। |
| विलिखति | वि + लिख् + ल्यप् | विलिख्य | लेखनं कृत्वा | शिक्षकः सुधाखण्डेन श्लोकं विलिख्य पाठयति। |
| प्रक्षालयति | प्र + क्षल (क्षालि) + ल्यप् | प्रक्षाल्य | प्रक्षालनं कृत्वा | माता वस्त्रं प्रक्षाल्य आपणं गच्छति। |
| अपकरोति | अप + कृ + ल्यप् | अपकृत्य | अपकारं कृत्वा | दुर्जनः सज्जनम् अपकृत्य गच्छति। |
| अवलोकते | अव + लोक् + ल्यप् | अवलोक्य | अवलोकनं कृत्वा | कपोताः तण्डुलान् अवलोक्य आनन्दन्ति। |
| आशङ्कते | आ + शकि + ल्यप् | आशङ्क्य | आशङ्कां कृत्वा | मनुष्यः निन्दितकर्मणि पापम् आशङ्क्य सत्कर्म कुरुते। |
| विकिरति | वि + कॄ + ल्यप् | विकीर्य | विकरणं कृत्वा | व्याधः तण्डुलकणान् विकीर्य जालं विस्तारयति। |
| अवतरति | अव + तॄ + ल्यप् | अवतीर्य | अवतरणं कृत्वा | कपोताः भूमौ अवतीर्य तण्डुलान् भक्षयन्ति। |
| विस्तृणाति | वि + स्तॄ + ल्यप् | विस्तीर्य | विस्तृतं कृत्वा | व्याधः जालं विस्तीर्य प्रच्छन्नो भूत्वा स्थितः। |
| अवलम्बते | अव + लम्ब् + ल्यप् | अवलम्ब्य | अवलम्बनं कृत्वा | मर्कटः वृक्षशाखाम् अवलम्ब्य शयनं करोति। |
| निर्माति | निर् + मा + ल्यप् | निर्माय | निर्माणं कृत्वा | भक्तः मन्दिरं निर्माय देवम् अर्चति। |
सारिणी पढ़ने का ढंग: बाएँ से दाएँ चलिए — पहले लट् लकार की क्रिया (आगच्छति), फिर उसका विभाजन (आ + गम् + ल्यप्), फिर बना हुआ रूप (आगत्य), फिर उसका अर्थ (आगमनं कृत्वा), और अन्त में उसका वाक्य में प्रयोग। पाँचों स्तम्भ मिलकर एक ही बात कहते हैं : ल्यबन्त पद वाक्य की पहली, समाप्त हो चुकी क्रिया बताता है; मुख्य क्रिया वाक्य के अन्त में रहती है।
ध्यातव्यम्: कुछ धातुओं के दो रूप चलते हैं — आगत्य/आगम्य, प्रणम्य/प्रणत्य। दोनों शुद्ध हैं। ‘निश्चिनोति’ में ‘निस्’ का ‘स्’ ‘चि’ के प्रभाव से ‘श्’ बन जाता है — निश्चित्य; यह वही ष्टुत्व-जैसा परिवर्तन है जो ‘कश्चित्’ में दिखा।