प्र1.
ल्यप्-प्रत्ययः कदा भवति ? क्त्वा-प्रत्ययात् सः कथं भिन्नः ? उदाहरणैः स्पष्टीकुरुत ।
उत्तर
नियमः — जहाँ एक क्रिया समाप्त होने के बाद दूसरी क्रिया होती है, वहाँ पूर्वकालिक क्रिया में धातु से क्त्वा प्रत्यय होता है। किन्तु यदि उसी धातु से पहले कोई उपसर्ग लगा हो, तो क्त्वा के स्थान पर ल्यप् होता है और ल्यप् में केवल ‘य’ शेष रहता है।
गम् + क्त्वा = गत्वा (उपसर्ग नहीं)
आ + गम् + ल्यप् = आगत्य (उपसर्ग ‘आ’ लगते ही क्त्वा → ल्यप्)
कृ + क्त्वा = कृत्वा → उप + कृ + ल्यप् = उपकृत्य
लोक् + क्त्वा = लोकित्वा → अव + लोक् + ल्यप् = अवलोक्य
आ + गम् + ल्यप् = आगत्य (उपसर्ग ‘आ’ लगते ही क्त्वा → ल्यप्)
कृ + क्त्वा = कृत्वा → उप + कृ + ल्यप् = उपकृत्य
लोक् + क्त्वा = लोकित्वा → अव + लोक् + ल्यप् = अवलोक्य
पाठस्य उदाहरणे — तण्डुलकणान् अवलोक्य (अव + लोक् + ल्यप्) कपोतान् प्रति आह। धैर्यम् अवलम्ब्य (अव + लम्ब् + ल्यप्) प्रतीकारः चिन्त्यताम्।
ऐसा क्यों: क्त्वा और ल्यप् दोनों का अर्थ एक ही है — ‘करके’। भेद केवल रूप का है, और उसका कारण उपसर्ग है। इसीलिए दोनों का वाक्य में प्रयोग भी एक-सा होता है, और दोनों अव्यय हैं — अर्थात् लिङ्ग, वचन, विभक्ति से इनका रूप कभी नहीं बदलता। ‘बालकः आगत्य पठति’, ‘बालिका आगत्य पठति’, ‘बालकाः आगत्य पठन्ति’ — ‘आगत्य’ ज्यों-का-त्यों रहता है।
परीक्षोपयोगी सङ्केतः: प्रश्न में ‘क्त्वा-स्थाने ल्यप्’ पूछा जाए तो पहले धातु पहचानिए, फिर उचित उपसर्ग जोड़िए, फिर अन्त में ‘य’ लगाइए — स्था → उत् + स्था = उत्थाय, नम् → प्र + नम् = प्रणम्य।