दीपकम् अध्याय 3 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
तरवः कदा नम्राः भवन्ति ?
उत्तर

उत्तरम्तरवः फलोद्गमैः नम्राः भवन्ति। (वृक्ष तब झुकते हैं जब उन पर फल आ जाते हैं, अर्थात् फलों के भार से वे झुक जाते हैं।)

क्यों: तृतीय श्लोक की पहली पंक्ति ही यह कहती है — भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैः। भावार्थ में पुस्तक स्पष्ट करती है — समयानुसारं वृक्षेषु फलानि जायन्ते। फलभारेण ते वृक्षाः नम्राः भवन्ति। अर्थात् जब वृक्ष सम्पन्न होता है, तभी वह झुकता है — यही श्लोक का असली सन्देश है।
पूर्णवाक्य कैसे बनाएँ: प्रश्न में जो पद हैं (तरवः, नम्राः, भवन्ति) उन्हें उत्तर में रखिए और ‘कदा’ के स्थान पर कारण/समय बताने वाला पद (फलोद्गमैः) जोड़ दीजिए। इससे वाक्य स्वयं पूर्ण हो जाता है।
प्र2.
समृद्धिभिः के अनुद्धताः भवन्ति ?
उत्तर

उत्तरम्समृद्धिभिः सत्पुरुषाः अनुद्धताः भवन्ति। (बहुत धन-सम्पत्ति पाकर भी सज्जन पुरुष अभिमान नहीं करते।)

क्यों: तृतीय श्लोक — अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः। भावार्थ के अनुसार — स्वसमृद्धिकाले ते औद्धत्यं न प्रकटयन्ति। ते सहृदयाः विनम्राः च सन्तः सदैव परोपकाराय यत्नशीलाः भवन्ति। जैसे फल से लदा वृक्ष और जल से भरा बादल झुक जाते हैं, वैसे ही सम्पन्न सज्जन और अधिक विनम्र हो जाते हैं।
व्याकरण: समृद्धिभिः — तृतीया विभक्ति, बहुवचन (‘समृद्धियों से’)। अनुद्धताः = न + उद्धताः (नञ् तत्पुरुष समास) — घमण्ड से रहित।
प्र3.
सत्पुरुषाणां स्वभावः कीदृशः भवति ?
उत्तर

उत्तरम्सत्पुरुषाणां स्वभावः अनुद्धतः परोपकारी च भवति। (सज्जनों का स्वभाव अभिमान-रहित तथा परोपकार करने वाला होता है।)

श्लोक के शब्दों में — स्वभाव एवैष परोपकारिणाम् (परोपकारियों का यही स्वभाव होता है)।

विस्तार से: भावार्थ के अनुसार सज्जन —
  • अपनी समृद्धि के समय औद्धत्य प्रकट नहीं करते;
  • सहृदय तथा विनम्र होते हैं;
  • सदा परोपकार के लिए यत्नशील रहते हैं और परोपकार को व्रत की तरह धारण करते हैं।
इसीलिए व्यासमहर्षि का वचन उद्धृत किया गया है — परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्। (परोपकार पुण्य के लिए है और दूसरों को पीड़ा देना पाप के लिए।)
व्याकरण: सत्पुरुषाणाम् — षष्ठी विभक्ति, बहुवचन। कीदृशः — ‘कैसा’ — इसका उत्तर सदा विशेषण-रूप में आना चाहिए, इसलिए ‘अनुद्धतः’, ‘परोपकारी’ जैसे विशेषण लिखे गए।
प्र4.
सत्यम् कदा सत्यम् न भवति ?
उत्तर

उत्तरम्यत् सत्यं छलम् अभ्युपैति तत् सत्यं सत्यं न भवति। (जो सत्य छल से जुड़ जाता है, वह सत्य वास्तव में सत्य नहीं रह जाता।)

क्यों: षष्ठ श्लोक का अन्तिम चरण — सत्यं न तद्यच्छलमभ्युपैति। भावार्थ के अनुसार धर्म-सम्बन्धी चर्चा में सत्यम् एव वक्तव्यं यत् सत्यं तथ्ययुक्तं भवेत् न तु छलनायुक्तम् — बोला हुआ वचन तभी सत्य है जब वह तथ्य पर टिका हो, छल-कपट से जुड़ा न हो।
Class 8 के लिए विचार: यह श्लोक एक सूक्ष्म बात कहता है — शब्द तथ्यतः सही होते हुए भी वचन असत्य हो सकता है, यदि उसे किसी को ठगने की नीयत से कहा जाए। इसीलिए सत्य की कसौटी केवल शब्द नहीं, नीयत भी है।
व्याकरण: अभ्युपैति = अभि + उप + एति; अर्थ — प्राप्त करता है, साथ जुड़ता है। तद् … यद् — यत्-तत् नित्यसम्बन्धी सर्वनाम युग्म; संस्कृत में ‘यत्’ वाला उपवाक्य पहले और ‘तत्’ वाला बाद में आता है।
प्र5.
दैवं कदा न सिध्यति ?
उत्तर

उत्तरम्पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति। (पुरुषार्थ के बिना भाग्य सिद्ध नहीं होता, अर्थात् फल नहीं देता।)

क्यों: अष्टम श्लोक — एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति। भावार्थ के अनुसार भाग्ये स्थितेऽपि उद्योगेन एव फलं लभ्यते — भाग्य में लिखा हो तब भी फल परिश्रम से ही मिलता है। प्रयत्न और भाग्य मानव-रथ के दो पहिये हैं; एक पहिये से रथ नहीं चलता।
याद रखिए: पाठ में उद्धृत सूक्ति — उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः। (काम परिश्रम से सिद्ध होते हैं, केवल मन के इरादों से नहीं।)
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