दीपकम् अध्याय 3 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
गुणी ....................... वेत्ति न वेत्ति निर्गुणः।
उत्तर

उत्तरम् — गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणः। (गुणवान् गुण को जानता है, गुणहीन नहीं जानता।)

चुनाव का आधार: ‘वेत्ति’ सकर्मक क्रिया है, इसे कर्म चाहिए। कर्म द्वितीया विभक्ति में आता है — मञ्जूषा में द्वितीया एकवचन का पद केवल गुणं है। श्लोक 2 से भी यही सिद्ध होता है।
प्र2.
भवन्ति नम्राः तरवः .......................।
उत्तर

उत्तरम् — भवन्ति नम्राः तरवः फलोद्गमैः(वृक्ष फलों के भार से झुक जाते हैं।)

चुनाव का आधार: ‘किस कारण से झुके?’ — कारण/साधन बताने के लिए तृतीया विभक्ति चाहिए। मञ्जूषा में तृतीया बहुवचन का पद फलोद्गमैः है (श्लोक 3)।
प्र3.
पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन, ......................., गुणेन, कर्मणा।
उत्तर

उत्तरम् — पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन, शीलेन, गुणेन, कर्मणा। (मनुष्य कुल, स्वभाव, गुण और कर्म से परखा जाता है।)

चुनाव का आधार: रिक्त स्थान के आगे-पीछे के तीनों पद (कुलेन, गुणेन, कर्मणा) तृतीया विभक्ति, एकवचन में हैं, इसलिए चौथा पद भी उसी रूप में होना चाहिए — शीलेन (श्लोक 4)। शीलम् = स्वभावः।
प्र4.
गुणाः पुरुषं दीपयन्ति – प्रज्ञा, कौल्यं, दमः, .......................।
उत्तर

उत्तरम् — गुणाः पुरुषं दीपयन्ति – प्रज्ञा, कौल्यं, दमः, श्रुतम्(गुण मनुष्य को चमकाते हैं — बुद्धि, कुलीनता, इन्द्रिय-संयम, शास्त्रज्ञान।)

चुनाव का आधार: श्लोक 5 का क्रम ही है — प्रज्ञा च कौल्यं च दमः श्रुतं च। अतः दमः के बाद श्रुतम् ही आएगा। श्रुतम् = शास्त्रज्ञानम्।
प्र5.
दानं यथाशक्ति ....................... च।
उत्तर

उत्तरम् — दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च। (सामर्थ्य के अनुसार दान और कृतज्ञता।)

चुनाव का आधार: श्लोक 5 का अन्तिम चरण — दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च। आठ गुणों की सूची का अन्तिम गुण कृतज्ञता ही है। कृतज्ञता = किए हुए उपकार को याद रखना।
प्र6.
एवं पुरुषकारेण विना दैवं न .......................।
उत्तर

उत्तरम् — एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति(इसी प्रकार पुरुषार्थ के बिना भाग्य सिद्ध नहीं होता।)

चुनाव का आधार: वाक्य में क्रिया ही नहीं है — मञ्जूषा में एकमात्र क्रियापद सिध्यति है (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन), और कर्ता ‘दैवम्’ भी एकवचन है, इसलिए क्रिया एकवचन में ही ठीक बैठती है (श्लोक 8)।
मञ्जूषा-अभ्यास की सामान्य विधि: पहले देखिए कि रिक्त स्थान पर क्रिया चाहिए या संज्ञा; यदि संज्ञा चाहिए तो आस-पास के पदों से विभक्ति पहचानिए। इन दो जाँचों से प्रायः एक ही विकल्प बचता है।
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