दीपकम् अध्याय 3 अभ्यासात् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
“गायन्ति देवाः किल गीतकानि” — इत्यस्य श्लोकस्य मुख्यविषयः कः ? (i) वसन्तस्य सौन्दर्यम् (ii) भारतभूमेः गौरवम् (iii) कर्मणां फलम् (iv) दानस्य प्रभावः
उत्तर

उत्तरम्(ii) भारतभूमेः गौरवम्। (भारतभूमि का गौरव।)

क्यों: पूरा श्लोक भारतभूमि की प्रशंसा में है — देवता गाते हैं कि यहाँ जन्म लेने वाले धन्य हैं, और स्वर्ग तथा मोक्ष का मार्ग बनी इस भूमि में देवता भी बार-बार मनुष्य बनकर जन्म लेना चाहते हैं। यह भारतभूमि के गौरव का ही वर्णन है।
अन्य विकल्प क्यों नहीं: ‘वसन्तस्य सौन्दर्यम्’ श्लोक 2 का प्रसंग है, ‘कर्मणां फलम्’ श्लोक 4/8 से जुड़ता है और ‘दानस्य प्रभावः’ श्लोक 5 का एक अंश-भर है — इनमें से कोई भी श्लोक 1 का मुख्य विषय नहीं।
प्र2.
“गुणी गुणं वेत्ति” — इत्यत्र कः गुणं न जानाति ? (i) गुणी (ii) निर्गुणः (iii) पिकः (iv) बली
उत्तर

उत्तरम्(ii) निर्गुणः। (गुणहीन व्यक्ति गुण को नहीं जानता।)

क्यों: श्लोक का पूरा वाक्य है — गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणः। ‘न वेत्ति’ का कर्ता निर्गुणः है। भावार्थ भी कहता है — गुणहीनः जनः अपरेषां सुगुणान् अवगन्तुं समर्थः न भवति।
अन्य विकल्प क्यों नहीं: ‘गुणी’ तो जानता ही है; ‘बली’ का सम्बन्ध बल से है, गुण से नहीं; और ‘पिकः’ वसन्त का गुण जानती है — वह ‘न जानने वाला’ पक्ष नहीं है।
प्र3.
“पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः” — इत्यस्य तात्पर्यं किम् ? (i) पिकः मधुरं गायति न वायसः (ii) सुजन एव गुणं जानाति (iii) वायसः अपि सरसं गानं करोति (iv) वसन्तः निर्गुणः अस्ति
उत्तर

उत्तरम्(ii) सुजन एव गुणं जानाति। (सज्जन ही गुण को पहचानता है।)

क्यों — ‘तात्पर्य’ और ‘अर्थ’ का अन्तर समझिए: प्रश्न अर्थ नहीं, तात्पर्य पूछ रहा है। अर्थ तो विकल्प (i) भी है — कोयल मधुर गाती है, कौआ नहीं। परन्तु कवि ने यह उदाहरण किसलिए दिया? पूरे श्लोक की सीख यह है कि योग्य ही योग्यता को पहचानता है। कोयल-कौआ तो केवल दृष्टान्त हैं। इसलिए तात्पर्य विकल्प (ii) है।
अन्य विकल्प क्यों नहीं: (iii) श्लोक के विरुद्ध है — कौआ मधुर नहीं गा सकता; (iv) तो श्लोक के अर्थ का ही उलटा है, क्योंकि वसन्त तो गुणों से भरा है, बस उसे पहचानने वाला चाहिए।
प्र4.
“भवन्ति नम्राः तरवः फलोद्गमैः” — इत्यस्य अर्थः कः ? (i) वृक्षाणां कठोरता (ii) सत्पुरुषाणाम् उन्नतिः (iii) फलयुक्ताः वृक्षाः नम्राः भवन्ति (iv) परोपकारिणां दुर्बलता
उत्तर

उत्तरम्(iii) फलयुक्ताः वृक्षाः नम्राः भवन्ति। (फलों से लदे वृक्ष झुक जाते हैं।)

क्यों: यहाँ प्रश्न सीधा अर्थ पूछ रहा है, तात्पर्य नहीं। पंक्ति का शब्दार्थ ठीक यही है — तरवः (वृक्ष) फलोद्गमैः (फलों के भार से) नम्राः (झुके हुए) भवन्ति।
अन्य विकल्प क्यों नहीं: (i) ‘कठोरता’ श्लोक के उलट है — यहाँ तो झुकना बताया गया है; (ii) ‘उन्नति’ की बात इस पंक्ति में नहीं; (iv) ‘दुर्बलता’ कहना बड़ी भूल होगी — झुकना दुर्बलता नहीं, सम्पन्नता और विनम्रता का चिह्न है।
प्र5.
“न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः” — इत्यत्र सभायाः महत्त्वं किम् ? (i) सभा मनोरञ्जनाय भवति (ii) सभा धनसम्पत्तिं प्रदातुं शक्नोति (iii) धर्मोपदेशाय ज्ञानवृद्धाः जनाः आवश्यकाः (iv) सभा केवलं राजकार्यार्थं भवति
उत्तर

उत्तरम्(iii) धर्मोपदेशाय ज्ञानवृद्धाः जनाः आवश्यकाः। (धर्म का उपदेश देने के लिए सभा में ज्ञानवृद्ध लोगों का होना आवश्यक है।)

क्यों: श्लोक कहता है कि जिस सभा में वृद्ध न हों वह सभा ही नहीं, और वृद्ध वही है जो धर्म की बात कहे। भावार्थ भी यही कहता है — सा एव सभा सफला भवति यत्र वयोवृद्धाः ज्ञानवृद्धाः च जनाः भवेयुः। पुनरपि ते ज्ञानवृद्धाः धर्मविषये वदेयुः।
अन्य विकल्प क्यों नहीं: (i) और (ii) सभा को मनोरंजन या धन का साधन बताते हैं — श्लोक का विषय ही नहीं; (iv) सभा को केवल राजकार्य तक सीमित कर देता है, जबकि श्लोक धर्म और सत्य की चर्चा की बात कर रहा है।
प्र6.
दुर्जनेन सह सख्यं किमर्थं न कार्यम् ? (i) सः मित्रं भवति (ii) सः धनं ददाति (iii) सः शिक्षां ददाति (iv) सः उष्णाङ्गारवद् हानिकरः भवति
उत्तर

उत्तरम्(iv) सः उष्णाङ्गारवद् हानिकरः भवति। (वह गरम अङ्गारे की तरह हानि पहुँचाने वाला होता है।)

क्यों: सप्तम श्लोक की उपमा यही है — उष्णो दहति चाङ्गारः शीतः कृष्णायते करम्। भावार्थ के अनुसार दुर्जन विश्वासयोग्यः न भवति और तस्य दुर्जनस्य मुखे माधुर्यं परं हृदये कपटता भवति। इसलिए विद्या से अलङ्कृत होने पर भी दुर्जन का त्याग करना चाहिए।
व्याकरण: उष्णाङ्गारवत् = उष्णाङ्गारः इव (‘वत्’ प्रत्यय ‘के समान’ के अर्थ में)। किमर्थम् = किसलिए, क्यों।
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