तीनों को लिख लीजिए — इनमें से हर एक आपको प्रयोग के विषय में कुछ ऐसा बता रहा है जो अन्यथा छूट जाता। ये इधर-उधर की बातें नहीं, ये आँकड़े हैं।
| अवलोकन | यह क्या बता रहा है | क्या करना चाहिए |
|---|---|---|
| तेल के छींटे पड़े | खुला जल गरम तेल तक पहुँचा — गीली पूड़ी, गीले हाथ या गीले झारे से। 180 °C पर वह जल तुरंत भाप बनकर तेल को उछाल देता है | झारा पोंछकर सुखाइए; पूड़ी सूखे आटे की हल्की पलेथन से बेलिए |
| गंध आई | ऊष्मा से तेल का अपघटन हो रहा है, अथवा पिछली पूड़ियों के आटे के कण तेल में जल रहे हैं | जले हुए कण छानकर निकालिए; एक ही तेल को बार-बार मत गरम कीजिए |
| धुआँ निकला | तेल अपने धूम्र-बिंदु से ऊपर जा चुका है — वह अधिक गरम है। इसके आगे पूड़ी भीतर भाप बनने से पहले ही बाहर से भूरी हो जाती है, अतः वह फूल भी नहीं पाती | आँच तुरंत धीमी कीजिए और तेल को कुछ ठंडा होने दीजिए |