प्र1.
हमने किसी वस्तु के वक्रित दर्पणों द्वारा बने प्रतिबिंबों का अन्वेषण किया। परंतु वक्रित पृष्ठों वाले पारदर्शी पदार्थों के माध्यम से देखने पर वस्तुएँ कैसी दिखाई पड़ती हैं?
उत्तर
वे आमाप में बदली हुई दिखती हैं, और यदि पृष्ठ पर्याप्त वक्रित हो तो उल्टी भी दिख सकती हैं — लगभग वैसे ही जैसे वक्रित दर्पण में, अंतर केवल इतना कि अब हम पदार्थ के माध्यम से देख रहे हैं, उसमें नहीं।
परिवर्तन होता ही क्यों है: प्रकाश वायु से काँच या जल में जाते समय और वापस बाहर आते समय मुड़ता है। समतल पृष्ठ पर किरणपुंज की हर किरण एक ही प्रकार मुड़ती है, इसलिए पुंज का आकार अपरिवर्तित रहता है और वस्तु सामान्य दिखती है। वक्रित पृष्ठ पर दोनों फलक हर बिंदु पर किरण से भिन्न ढाल बनाते हैं, इसलिए बाहरी किरणें भीतरी किरणों से अधिक मुड़ती हैं — पुंज सिमट या फैल जाता है, और वस्तु आवर्धित या लघुकृत दिखने लगती है।
स्वयं जाँचिए: जल से भरे काँच के गिलास के पार इस पंक्ति को पढ़िए। समतल किनारे से कुछ नहीं बदलता; वक्रित पार्श्व से अक्षर खिंच जाते हैं।